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अरुण जेटली जेपी से लेकर पीएम मोदी तक बदलाव की हर पटकथा में शामिल रहे

arun jaitley

अरुण जेटली जनता पार्टी से लेकर भाजपा तक के सफर में हर बदलाव की पटकथा में शामिल रहे। वे लोकनायक जयप्रकाश नारायण, वीपी सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सत्ता परिवर्तन में पर्दे के पीछे असीमित भूमिका में सक्रिय रहे। चुनावी जंग, संसद की रणनीति, अदालत के दांव पेंच के साथ खेल प्रशासन में अहम छाप छोड़ने वाले जेटली मीडिया और उद्योग जगत के भी करीब थे।उनके व्यक्तित्व का सबसे अहम पहलू यह था कि विरोधी दल कांग्रेस के रणनीतिकार अगर किसी से भयभीत रहते थे, तो वह जेटली थे। जेटली एकमात्र राजनेता थे जो 1977 से लेकर 2019 तक की कांग्रेस के सभी पराजय की पटकथा में शामिल रहे। 

सन 1974 में जेटली अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के बैनर तले दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनाव में कांग्रेस की रणनीति को पटखनी देकर अध्यक्ष बने। अगले ही साल देश में आपातकाल लगा और दिल्ली के नारायणा में अपने घर में सो रहे जेटली पीछे के दरवाजे से निकल कर दिल्ली विश्वविद्यालय में लगभग दो सौ छात्रों के साथ इंदिरा गांधी का पुतला जलाकर गिरफ्तार हुए। तिहाड़ जेल में तत्कालीन जनसंघ के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी आदि का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा और उनको लगा कि उनकी दिशा राजनीति की तरफ ही जा रही है। 

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हर रणनीति के अहम हिस्सा

1977 के ऐतिहासिक चुनाव में जयप्रकाश नारायण ने लोकतांत्रिक युवा मोर्चा बनाकर उसकी कमान जेटली को सौंपी। इस तरह वे चुनावी रणनीति का हिस्सा बने जिसमें कांग्रेस को पहली पराजय मिली। जेपी उनको चुनाव भी लड़ाना चाहते थे, लेकिन तब उनकी उम्र 25 साल से कम थी। जेटली विद्यार्थी परिषद से 1980 में भाजपा में आए और 1991 में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बने। वे 1989 में कांग्रेस की दूसरी पराजय की रणनीति में भी पर्दे के पीछे रहे। यही वजह है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने 1990 में उनको अतिरिक्त सोलीसीटर जनरल नियुक्त किया। भाजपा में रहते हुए भी वह वीपी सिंह के बेहद करीब रहे।

सियासत का सफर 

लालकृष्ण आडवाणी की केंद्रीय टीम में जब गोविंदाचार्य, प्रमोद महाजन और वेंकैया नायडू जैसे नेता राष्ट्रीय फलक पर उभर रहे थे, तब जेटली पार्टी के थिंक टैंक हिस्सा रहे। वे 1996 के चुनाव में कांग्रेस की तीसरी पराजय की रणनीति का हिस्सा बने। वे वाजपेयी सरकार में मंत्री बने। इसके बाद 1998 व 1999 में भाजपा की जीत व कांग्रेस की लगातार हार में हिस्सेदार रहे। इस दौरान कानूनी विशेषज्ञ के साथ गठबंधन की राजनीति, मीडिया प्रबंधन, घोषणापत्र तैयारी जैसे कामों को संभालते रहे। इस बीच कई राज्यों के चुनाव में वे प्रमुख रणनीतिकार बन कर उभरे। साल 2004 में भाजपा की पराजय के बाद भाजपा में नए नेतृत्व को आगे लाया गया। तब जेटली को राज्यसभा व सुषमा स्वराज को लोकसभा में नेता बनाया गया। 

मोदी के लिए बढ़ाए कदम 

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने में पार्टी के भीतर जेटली की सबसे अहम भूमिका रही। वह चुनावी रणनीति के केंद्र में भी थे। भाजपा की जीत और कांग्रेस की एक और हार में जेटली एक बार फिर सबसे अहम रहे। 2019 में खराब स्वास्थ्य के बावजूद वह भाजपा मुख्यालय में रणनीतिक टीम के साथ मौजूद रहते थे और लगातार लेखन से कांग्रेस पर प्रहार करते रहे। 

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विविध भूमिकाएं 

जेटली के व्यक्तित्व के विविध आयाम रहे। वह विभिन्न मोर्चों पर पार्टी के संकटमोचक थे। उन्होंने कार्यकर्ता, नेता, वकील, मंत्री, विपक्षी नेता, क्रिकेट प्रशासक जैसी भूमिकाओं में विशिष्ट छाप छोड़ी। संसद में उनकी भूमिका चाहे विपक्ष में हो या सरकार में, गठबंधन की राजनीति में विरोधी विचारधारा वाले नए साथियों को जोड़ना, अदालती मामलों में प्रभावी भूमिका के साथ खेल की राजनीति में भी वे प्रमुख भूमिका में रहे। उद्योग जगत हो या मीडिया उनके दोस्तों की कमी नहीं थी। 

बात संभाली भी और बदली भी

मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, बिहार, राजस्थान के प्रभारी रहते हुए उन्होंने अपनी संगठनात्मक क्षमता की छाप भी छोड़ी। मध्य प्रदेश में उमा भारती की जगह नेतृत्व परिवर्तन और कर्नाटक में विवादों में फंसे येदियुरप्पा को बदलना, जेटली की सलाह पर ही किया गया। हालांकि वह कुछ मामलों में अड़ते भी थे। असम में प्रभारी के मुद्दे पर उन्होंने तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष के फैसले का विरोध किया और राबर्ट वाड्रा के जमीन घोटाले के मामले में पार्टी के भीतर से उठाए गए सवालों पर राज्यसभा में विपक्ष के नेता से हटने की भी बात कही। 

राजनीति में भी रहे निजी रिश्ते

विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ उनके निजी रिश्ते कभी छुपे नहीं रहे। चाहे वह वीपी सिंह, नीतीश कुमार, अमर सिंह, सीताराम येचुरी, शरद यादव, ज्योतिरादित्य सिंधिया, नवीन पटनायक, चंद्रबाबू नायडू या राम विलास पासवान हों, सभी कहीं न कहीं निजी रूप से उनसे जुड़े रहे। अपनी जीवन शैली, मीडिया से दोस्ती और विदेश यात्राओं के किस्सों को वह खुलकर सुनाते थे। गोपाला के रसगुल्ले और क्वालिटी के छोले भटूरे उनकी पसंद थे। नीतीश कुमार के साथ उनकी दोस्ती में एक हिस्सा गोपाला के रसगुल्लों का भी था। 

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नौ अशोक रोड

जेटली सांसद और विपक्ष के नेता के नाते मिले 9 अशोक रोड के बंगले में कभी नहीं रहे। उसे भाजपा के संगठन के नेताओं को दे दिया था। 2004 से 2014 के दौरान इस बंगले में एक अलग कमरा बनाया गया जिसमें वह हमेशा आते थे। मीडिया, कार्यकताओं के साथ कई रणनीतिक मुलाकातें भी यहीं होती थीं। यहां पर उनकी ग्रीन टी सबसे चर्चित रही। गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के पहले इसी हिस्से में नरेंद्र मोदी भी काफी समय रहे थे। 

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  • Web Title:Arun Jaitley involved in every script of change from JP VP Atalji to PM Modi