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23 जनवरी, 2020|10:31|IST

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'Article 370 के प्रावधान खत्म करना असंवैधानिक, कश्मीर की जनता को नजरअंदाज किया गया'

kashmir   pti photo

उच्चतम न्यायालय में मंगलवार (10 दिसंबर) को दलील दी गयी कि संविधान के अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान खत्म करने का केन्द्र का फैसला 'असंवैधानिक' है क्योंकि ऐसा करते समय जम्मू कश्मीर की जनता को नजरअंदाज किया गया। सरकार के इस निर्णय को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से यह भी दलील दी गयी कि जम्मू कश्मीर की स्थिति में किसी भी प्रकार का बदलाव का प्रस्ताव वहां के नागिरकों की ओर से ही आना चाहिए।

न्यायमूर्ति एन वी रमण की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता ने दलील दी कि केन्द्र का निर्णय संविधान का उल्लंघन करता है क्योंकि इस बारे में आदेश जम्मू कश्मीर की जनता की सहमति को नजरअंदाज करते हुये जारी किये गये। संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी, न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति सूर्य कांत शामिल हैं।

केन्द्र सरकार ने जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने संबंधी संविधान के अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान पांच अगस्त को खत्म कर दिये गये थे। अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान खत्म करने के निर्णय और जम्मू कश्मीर को दो केन्द्र शासित प्रदेशों मे विभाजित करने संबंधी जम्मू कश्मीर पुनर्गठन कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुये शीर्ष अदालत में अनेक याचिकायें दायर की गयी हैं। याचिका दायर करने वालों में वकील, कार्यकर्ता, सामान्य नागरिक और नेशनल कांफ्रेंस, सज्जाद लोन के नेतृत्व वाली पीपुल्स कांफ्रेंस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता मोहम्मद यूसुफ तारिगामी आदि शामिल हैं।

नौकरशाही से राजनीति में आए शाह फैसल, शेहला राशिद और अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से बहस शुरू करते हुये वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचन्द्रन ने कहा कि जम्मू कश्मीर में 19 दिसंबर, 2018 से इस साल 31 अक्टूबर तक राष्ट्रपति शासन था और अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को समापत करने के लिये दी गयी सहमति में जनता की इच्छा शामिल नहीं थी। रामचन्द्रन ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत की गयी घोषणा के दौरान राष्ट्रपति और संसद के अधिकार 'अस्थाई' स्वरूप के हैं और इनका इस्तेमाल 'अपरिवर्तनीय' सांविधानिक बदलाव के लिये नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा, ''रिकॉर्ड से पता चलता है कि न तो राष्ट्रपति ने और न ही राज्यपाल ने आम जनता या फिर विधान परिषद के सदस्यों से किसी प्रकार का मशविरा नहीं किया।"

रामचन्द्रन ने बहस शुरू करते हुये पीठ को उन बिन्दुओं से अवगत कराया जिनके इर्द गिर्द उनकी बहस केन्द्रित रहेगी। उन्होंने कहा कि राज्यपाल संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत आपात उपायों के रूप मे निर्वाचित सरकार के स्थान पर काम कर रहे थे और उनके द्वारा दी गयी राज्य सरकार की सहमति में जनता की इच्छा का कोई जिक्र नहीं है। रामचन्द्रन ने संविधान के प्रावधानों का जिक्र करते हुये कहा कि राज्य के राष्ट्रपति शासन के अधीन होने के दौरान संसद द्वारा बनाया गया कानून 'परिवर्तनीय है और यदि निर्वाचित सरकार को लगता है कि यह सही नहीं है तो वह नया कानून बनाकर उसे समाप्त कर सकती है।

केन्द्र की ओर से अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने पीठ से कहा कि रामचन्द्रन ने यह 'असत्य बयान दिया है कि पुनर्गठन विधेयक लोकसभा के किसी भी सदस्य को नहीं दिखाया गया था और इसे पेश करने के बाद वितरित किया गया था। वेणुगोपालन ने कहा, 'वह कहते हैं कि विधेयक की प्रति लोकसभा सदस्यों को नहीं दिखायी गयी थी। वह इस तरह का गलत बयान नहीं दे सकते।' हालांकि, रामचन्द्रन ने कहा कि वह बुधवार (11 दिसंबर) को स्पष्टीकरण देंगे जब पीठ इस प्रकरण में आगे बहस सुनेगी।

इन याचिकाओं पर बहस शुरू करते हुये रामचन्द्रन ने कहा कि वह जम्मू कश्मीर के विलय पत्र, भारत के संविधान और जम्मू कश्मीर में उसका लागू होना तथा जम्मू कश्मीर के संविधान का पहले हवाला देंगे। रामचन्द्रन ने अपनी बहस के दौरान कश्मीर के शामिल होने के बारे में इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का हवाला दिया और पीठ से कहा कि किस तरह संधि पत्रों के माध्यम से अनेक रजवाड़ों को भारत में शामिल किया गया था। इस पर न्यायमूर्ति रमण ने टिप्पणी की, ''मेरे सहयोगी (न्यायमूर्ति कौल) का 500 वर्षों का वंश वृक्ष है।"

रामचन्द्रन ने कहा कि भारत में पंजाब और हरियाणा के सृजन के अलावा किसी भी राज्य का उस समय पुनर्गठन नही किया गया है जब वह राष्ट्रपति शासन के अधीन था। उन्होंने पुनर्गठन कानून 2019 का जिक्र करते हुये कहा कि यह संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन है क्योंकि किसी भी राज्य का पूर्ण स्वरूप ही दो केन्द्र शासित प्रदेश बनाकर खत्म नहीं किया जा सकता है।

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  • Web Title:Article 370 Abrogation of unconstitutional people of Jammu Kashmir bypassed Petitioners to Supreme Court