प्राचीन डीएनए खोलेगा मानव इतिहास के अनसुलझे राज
नालंदा विश्वविद्यालय में आयोजित बायोआर्कियोलॉजी कार्यशाला में विशेषज्ञों ने प्राचीन डीएनए और जीनोमिक्स का उपयोग कर मानव इतिहास की नई संभावनाओं पर चर्चा की। कार्यशाला में बताया गया कि आनुवंशिक और आइसोटोपिक विश्लेषण से प्राचीन आबादी, प्रवास और स्वास्थ्य की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

प्राचीन डीएनए खोलेगा मानव इतिहास के अनसुलझे राज
बायोआर्कियोलॉजी में शोधकर्ताओं की सहभागिता
नालंदा में बायोआर्कियोलॉजी पर देशभर के शीर्ष विशेषज्ञों का महामंथन, जीनोमिक्स-आइसोटोपिक विश्लेषण से प्राचीन आबादी, प्रवास और जैविक विविधता की कड़ियां जोड़ने पर जोर पुरातत्व को आधुनिक विज्ञान और अंतरविषयक शोध से जोड़ना समय की जरूरत : प्रो. सचिन चतुर्वेदी फोटो : एनयू वर्कशॉप : नालंदा विवि में मंगलवार को कार्यशाला में शामिल कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी व अन्य। राजगीर, निज संवाददाता। मानव इतिहास की वे कड़ियां, जिन्हें अब तक सिर्फ पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर समझने की कोशिश होती रही है, अब प्राचीन डीएनए, जीनोमिक्स और आइसोटोपिक विश्लेषण के जरिए वैज्ञानिक कसौटी पर परखी जाएंगी। नालंदा विश्वविद्यालय में बायोआर्कियोलॉजी पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में देशभर के शीर्ष पुरातत्वविदों, मानवविज्ञानियों और आर्कियोजेनेटिक्स विशेषज्ञों ने मानव अतीत के वैज्ञानिक पुनर्निर्माण की नई दिशा पर मंथन किया। विशेषज्ञों ने कहा कि हड्डियों और अन्य पुरातात्विक अवशेषों से मिले संकेतों को आनुवंशिक, जैविक और रासायनिक आंकड़ों से जोड़कर ही प्राचीन आबादी, मानव प्रवास, खान-पान, स्वास्थ्य और जैविक विविधता की ज्यादा सटीक तस्वीर सामने लाई जा सकती है। भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में नालंदा विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग की ओर से आयोजित कार्यशाला का उद्घाटन कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने किया। उन्होंने कहा कि मानव अतीत के सटीक पुनर्निर्माण के लिए पुरातत्व को आधुनिक विज्ञान और अंतरविषयक शोध से जोड़ना समय की जरूरत है। पुरातात्विक साक्ष्यों के साथ जीनोमिक इतिहास और वैज्ञानिक विश्लेषण को जोड़ने से अतीत की अधिक प्रामाणिक तस्वीर तैयार होगी।
प्राचीन डीएनए और जीनोमिक्स का अध्ययन
डीएनए बताएगा कौन कहां से आया, कैसे बदली आबादी : मुख्य प्लेनरी सत्र में प्राचीन डीएनए और जीनोमिक्स की मदद से दक्षिण एशियाई आबादी के इतिहास को समझने की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा हुई। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने कहा कि उन्नत जीनोमिक्स और प्राचीन डीएनए अनुसंधान से प्राचीन आबादी के आनुवंशिक संबंधों, उनके विकास और प्रवास की प्रक्रियाओं को समझने में नई संभावनाएं खुली हैं। कार्यशाला के आयोजन अध्यक्ष प्रो. वसंत शिंदे समेत विशेषज्ञों ने कहा कि पुरातत्व को केवल खुदाई और अवशेषों तक सीमित रखने के बजाय आनुवंशिक, आइसोटोपिक और मानवशास्त्रीय आंकड़ों का एकीकृत अध्ययन जरूरी है। खान-पान से प्रवास तक, विज्ञान बताएगा अतीत की कहानी : विशेषज्ञों के अनुसार आइसोटोपिक और जैविक विश्लेषण से प्राचीन लोगों के खान-पान, स्वास्थ्य, पर्यावरणीय अनुकूलन और उनकी गतिशीलता की जानकारी हासिल की जा सकती है। इससे यह समझने में भी मदद मिलेगी कि अलग-अलग आबादियों के बीच किस तरह के संबंध रहे और समय के साथ उनका स्वरूप कैसे बदला। भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण के निदेशक प्रो. बी.वी. शर्मा ने ऐतिहासिक समुदायों के अनुकूलन को समझने में जैविक मानवविज्ञान और स्वास्थ्य अध्ययन की भूमिका बताई।
नवीनतम तकनीकियों के साथ अनुसंधान की दिशा
नालंदा में अत्याधुनिक लैब, प्रयोगशाला आधारित शोध को रफ्तार : कुलपति ने डीएनए निष्कर्षण और शोधन, आइसोटोपिक विश्लेषण, कालानुक्रमिक पुनर्निर्माण और सांख्यिकीय तकनीकों के लिए अत्याधुनिक प्रयोगशाला सुविधाएं विकसित करने पर जोर दिया। उन्होंने मानव जीनोम अध्ययन में ऑस्ट्रेलियाई शोध दल के साथ चल रहे सहयोग का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि अंतरराष्ट्रीय और अंतरविषयक सहयोग से मानव जैविक विविधता, आबादी के इतिहास और प्रवास को नए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझा जा सकेगा। देशभर के विशेषज्ञों ने साझा किए शोध अनुभव : तकनीकी सत्रों में विश्वभारती शांतिनिकेतन की डॉ. अभिशिक्ता घोष रॉय, बीआरआईसी-सीडीएफडी हैदराबाद के डॉ. प्रज्ज्वल प्रताप सिंह, भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण की डॉ. मंजुलिका गौतम और डॉ. निंगोंबम समरजीत सिंह ने शोध अनुभव साझा किए। विदेश मंत्रालय के पूर्व सचिव जयदीप मजूमदार भी मौजूद रहे। ऐतिहासिक अध्ययन स्कूल के डीन प्रो. गोदाबरीश मिश्र ने शैक्षणिक योगदान दिया। पुरातत्व विभाग की समन्वयक एवं कार्यशाला संयोजक डॉ. एलोरा त्रिबेदी ने आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
विज्ञान और इतिहास का संगम
नालंदा से अतीत की वैज्ञानिक तस्वीर गढ़ने की तैयारी : कार्यशाला का संदेश स्पष्ट रहा कि पुरातत्व, आनुवंशिकी और आधुनिक विज्ञान को एक मंच पर लाकर ही मानव इतिहास की अधूरी कड़ियों को जोड़ा जा सकता है। नालंदा विश्वविद्यालय की यह पहल बायोआर्कियोलॉजी, आर्कियोजेनेटिक्स और वैज्ञानिक पुरातत्व में प्रयोगशाला आधारित, अंतरविषयक और सहयोगात्मक शोध को नई दिशा देने वाली मानी जा रही है।


