यहां रुके थे खुद महात्मा बुद्ध, फिर भी नक्शे से गायब है सुलतानपुर का यह ऐतिहासिक गांव
उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जिले में गोमती नदी के किनारे गढ़ा नामक ऐतिहासिक स्थल है, जहाँ महात्मा बुद्ध ने उपदेश दिए थे। पुरातत्व विभाग की खुदाई में बुद्ध की मूर्तियां और स्तूपों के अवशेष मिले हैं। समय-समय पर इसके विकास के लिए वादे किए गए, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
राकेश तिवारी,( कुड़वार), सुलतानपुर। उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जिले में गोमती नदी के किनारे एक ऐसा ऐतिहासिक स्थल मौजूद है जो सदियों से अपनी पहचान बचाने की जंग लड़ रहा है। महात्मा बुद्ध की उपदेश स्थली के रूप में बौद्ध ग्रंथों में दर्ज यह स्थान है गढ़ा, जो आज शासन और प्रशासन की अनदेखी का शिकार होकर धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों से मिटता जा रहा है। बुद्ध के चरणों से पवित्र हुई यह धरती
गढ़ा का महत्त्व
विकास खंड कुड़वार की ग्राम पंचायत ग्रेंट कुड़वार में गोमती नदी के पश्चिमी किनारे पर स्थित यह स्थान कुड़वार स्टेट के किले के नाम से जाना जाता है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार स्वयं महात्मा बुद्ध ने इस स्थान पर कुछ दिन रुककर बौद्ध भिक्षुओं को दीक्षा और उपदेश दिए थे। यही कारण है कि इस भूमि को बौद्ध धर्म में विशेष महत्व प्राप्त है। सुलतानपुर गजेटियर में भी इस स्थान का स्पष्ट उल्लेख मिलता है जो इसकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता को और पुख्ता करता है。
ह्वेनसांग का यात्रा वृत्तांत
इतिहास के पन्नों में दर्ज साक्ष्य बताते हैं कि सन 636 ईस्वी में चीनी यात्री ह्वेनसांग जब कन्नौज से प्रयागराज की यात्रा पर निकले तो गंगा पार कर उत्तर दिशा में बढ़ते हुए उन्हें काशेपुला नाम का एक समृद्ध नगर मिला। इस नगर में भव्य और विशाल स्तूप बने थे। इतिहासकारों का मानना है कि ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृत्तांत में जिस स्थान का वर्णन किया वह यही गढ़ा है। इस एक तथ्य से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि किसी जमाने में यह स्थान कितना वैभवशाली और धार्मिक दृष्टि से कितना महत्वपूर्ण रहा होगा।
खुदाई के अवशेष
पुरातत्व विभाग द्वारा इस क्षेत्र में की गई खुदाई में महात्मा बुद्ध की मूर्तियां और स्तूपों के भग्नावशेष मिले हैं। गढ़ा के चारों ओर आज भी लाखौरी ईंटों की दीवारें देखी जा सकती हैं जो यहां कभी खड़ी रही भव्य इमारतों की गवाही देती हैं। परिसर में स्थित एक प्राचीन कुआं भी इस स्थान के गौरवशाली इतिहास का मूक साक्षी है। इन तमाम प्रमाणों के बावजूद यह स्थान आज जानवरों के चरागाह में तब्दील हो चुका है और इसकी जमीन ऊबड़ खाबड़ पड़ी है।
अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन
1968 में हुआ था अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन। करीब छह दशक पहले सन 1968 में संत स्वामी मुक्तानंद ने इस ऐतिहासिक स्थल पर एक अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन का आयोजन किया था। इस सम्मेलन में बिहार के साथ साथ थाईलैंड, चीन और जापान से बौद्ध भिक्षु शामिल हुए थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस स्थान की पहचान और महत्ता रही है। लेकिन उसके बाद से यह स्थान फिर उपेक्षा की गर्त में चला गया।
कबीर पंथ का आश्रम
गढ़ा की पवित्र भूमि केवल बौद्ध धर्म की ही धरोहर नहीं है। यहां कबीर पंथियों का एक प्राचीन आश्रम भी स्थित है जो जौनपुर के कबीर विज्ञान आश्रम बड़ैया से जुड़ा हुआ है। रियासत के राजा प्रताप बहादुर सिंह ने यह 52 बीघा जमीन तत्कालीन संत गरीब दास जी को दान में दी थी। आश्रम के पास एक विशाल और प्राचीन बरगद का पेड़ है जिसके नीचे संत गरीब दास तपस्या किया करते थे। आज भी इस आश्रम में कबीर पंथी रहकर कबीर की वाणी का कीर्तन करते हैं। इसके अलावा आश्रम के बगल में सोतहा नाम का एक नाला है जिसमें हर समय पानी बहता रहता है और गोमती में जाकर मिलता है। इस पानी का स्रोत आज तक एक रहस्य बना हुआ है।
राजनीतिक उपेक्षा
नेताओं के वादे रहे कागजी, विकास की राह अब भी सूनी। समय समय पर चुनावों के दौरान इस स्थान को पर्यटन स्थल बनाने के बड़े बड़े वादे किए जाते रहे हैं लेकिन कोई भी वादा हकीकत में नहीं बदला। पूर्व-central मंत्री और सांसद संजय सिंह ने एक सोलर लाइट तथा सदर विधायक स्वर्गीय सूर्यभान सिंह ने एक हैंड पंप दिया जो यहां आने वाले बौद्ध भिक्षुओं, राहगीरों और चरवाहों के पानी पीने का एकमात्र सहारा है। इतने बड़े ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के स्थल के लिए यह सुविधाएं नाकाफी हैं।
आगे की संभावनाएं
स्थानीय जानकारों और इतिहासकारों का मानना है कि यदि सरकार इस स्थान की ओर गंभीरता से ध्यान दे और इसे विकसित करे तो गढ़ा देश के प्रमुख बौद्ध तीर्थ स्थलों जैसे बोधगया और सारनाथ की तरह अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर अपनी जगह बना सकता है। इससे न केवल इस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत सुरक्षित होगी बल्कि स्थानीय रोजगार और पर्यटन को भी बड़ा बढ़ावा मिलेगा। जरूरत है तो बस एक ठोस सरकारी इच्छाशक्ति की।


