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Hindi News देश...तो भविष्य में एक हो सकते हैं सभी वाम दल, दीपंकर भट्टाचार्य ने बताई वजह और जमीनी हकीकत

...तो भविष्य में एक हो सकते हैं सभी वाम दल, दीपंकर भट्टाचार्य ने बताई वजह और जमीनी हकीकत

Left Parties Merger: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की स्थापना 26 दिसंबर, 1925 को हुई थी। 1964 में यह विभाजित हो गई और सीपीआई मार्क्सवादी CPI (M)) का गठन हुआ। इसके बाद फिर कई विभाजन हुए।

...तो भविष्य में एक हो सकते हैं सभी वाम दल, दीपंकर भट्टाचार्य ने बताई वजह और जमीनी हकीकत
Pramod KumarPTI,नई दिल्लीFri, 21 Jun 2024 08:00 PM
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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा है कि भविष्य में किसी भी समय वाम दलों के विलय से इनकार नहीं किया जा सकता है लेकिन फिलहाल ऐसी कोई तत्काल संभावना नहीं दिख रही है। उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले दिनों में, जैसे ही जलवायु संकट एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बन जाएगा, वामपंथी फिर से फोकस में होंगे। PTI को दिए एक इंटरव्यू में भट्टाचार्य ने कहा कि विभिन्न वामपंथी दलों के बीच मतभेद बने हुए हैं, लेकिन आज भी भारत को एक मजबूत वामपंथी संगठन की जरूरत है।

वाम दलों के विलय की संभावना के बारे में पूछे जाने पर भट्टाचार्य ने कहा, "मैं इसे खारिज नहीं करूंगा, लेकिन मुझे वास्तव में कोई तत्काल संभावना नहीं दिख रही है।" उन्होंने कहा, "भारत में 1964 तक एक ही कम्युनिस्ट पार्टी थी। इतिहास में ऐसा होता आया है कि मतभेद होते रहे हैं और मतभेदों के कारण अलग-अलग पार्टियां बनती रही हैं।" उन्होंने ये भी कहा कि वाम दलों के बीच भी राजनीतिक और वैचारिक मतभेद हैं लेकिन जब तक मतभेद दूर नहीं हो जाते, पूर्ण एकीकरण की उम्मीद करना मुश्किल है। 

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI), जिसकी स्थापना 26 दिसंबर, 1925 को हुई थी, 1964 में विभाजित हो गई और सीपीआई मार्क्सवादी CPI (M)) का गठन हुआ। पार्टियों के पुनर्मिलन को लेकर चर्चाएँ समय-समय पर सामने आती रही हैं। हालाँकि, अब तक कोई समझौता नहीं हुआ है। इस बीच सीपीआई (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) (CPI-ML) की उत्पत्ति 1964 के नक्सलबाड़ी आंदोलन से हुई और इसकी स्थापना 1969 में हुई। इसके बाद सीपीआई (एमएल) लिबरेशन का गठन 1974 में पार्टी में एक और विभाजन के बाद हुआ था।

भट्टाचार्य ने कहा कि वाम दलों के बीच नीतियों के साथ-साथ अभिव्यक्ति के मामले में भी मतभेद बने हुए हैं। उन्होंने कहा, "राजनीति के संदर्भ में, हमारी राजनीति अधिक जनोन्मुख, अधिक संघर्षोन्मुख है। यदि आप अधिक संघर्षोन्मुखी हैं, यदि आप हर मुद्दे पर अधिक सुसंगत रहने की कोशिश कर रहे हैं, तो हम यथासंभव सुसंगत रहने का प्रयास करते हैं।" उन्होंने कहा कि समझौते के क्षेत्र अब शायद अधिक हैं और यह एक अच्छा संकेत है क्योंकि समझौते का क्षेत्र बढ़ रहा है जहां वे ज्यादातर साथ मिलकर काम कर सकते हैं।

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