Airtel Jio Vodafone Idea Mobile call internet costly by 50 percent from Dec 3 - मोबाइल पर सस्ती बातचीत का दौर खत्म; 50 फीसद तक महंगी हो जाएंगी एयरटेल, वोडाफोन और जियो की दरें DA Image
15 दिसंबर, 2019|5:45|IST

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मोबाइल पर सस्ती बातचीत का दौर खत्म; 50 फीसद तक महंगी हो जाएंगी एयरटेल, वोडाफोन और जियो की दरें

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वित्तीय संकट से उबरने के लिए दूरसंचार कंपनियों ने रविवार को मोबाइल कॉल और डेटा की दरें बढ़ाने की घोषणा की। वोडाफोन-आइडिया और एयरटेल की दरें पोस्टपेड उपभोक्ताओं के लिए तीन दिसंबर से महंगी हो जाएगी। वहीं, रिलायंस जियो छह दिसंबर को नई दरें की घोषणा करेगी। दूरसंचार कंपनियों का कहना है कि भारी घाटे के बाद दरों में बढ़ोतरी करना जरूरी हो गया था।

इस बढ़ोतरी पर प्रतिक्रिया देते हुए दूरसंचार विशेषज्ञों ने कहा कि दूरसंचार क्षेत्र में लंबे समय से चला आ रहा सस्ती कॉल और डेटा का दौर खत्म हो गया है। भारी कर्ज में डूबी कंपनियों के पास दरें बढ़ाने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं था क्योंकि हाल ही में समायोजित सकल आय (एजीआर) पर सु्प्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया पर वित्तीय दबाव बढ़ा है। गौरतलब है कि शीर्ष अदालत दूरसंचार कंपनियों पर पुरानी वैधानिक देनदारियों के रूप में सरकार का 1.47 लाख करोड़ रुपये का बकाया चुकाने का आदेश दिया है। 

* 2016 में जियो के आने के बाद से सस्ते कॉल और डेटा का दौर शुरू हुआ।
* 13 में सिर्फ चार दूरसंचार कंपनियां रह गई रिलायंस जियो के सामने कीमतों की लड़ाई में।
* 1.47 लाख करोड़ करोड़ देने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने कंपनियों को दिया।

कंपनियों को नुकसान के दो बड़े कारण
1.  एक अरब से अधिक मोबाइल ग्राहकों के साथ भारत दुनिया के सबसे बड़े दूरसंचार बाजारों में से एक है। इसके बावजूद कंपनियों को नुकसान के दो कारण हैं। पहला यह कि जियो के आने के बाद दूरसंचार बाजार में प्रतिस्पर्धा तेजी से बढ़ी। इससे कॉल की दरें तेजी से गिरी। वहीं, कंपनियों के लिए डेटा की कीमतें लगातार ऊंची बनी रही। इससे भारत डेटा के मामले में दुनिया का सबसे सस्ता देश बन गया। लेकिन, कंपनियों को नुकसान बढ़ता चला गया।

2. दूसरा कारण एजीआर है। यह है समायोजित सकल आय (एजीआर) का मामला। इसका मतलब है कि दूरसंचार कंपनियों को अपनी कमाई का एक हिस्सा सरकार के दूरसंचार विभाग के साथ साझा करना होगा। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए दूरसंचार कंपनियों को 1.47 लाख करोड़ चुकाने का आदेश दिया। इस फैसले का कंपनियों पर गहरा असर पड़ा है। इसकी वजह से भी दूरसंचार कंपनियों पर कर्ज का बोझ बढ़ा है। 

दूरसंचार क्षेत्र पर 7.88 लाख करोड़ का कर्ज
दूरसंचार क्षेत्र पर 7.88 लाख करोड़ रुपये का भारी भरकम कर्ज है और यह 31 अगस्त 2017 के आंकड़ों के अनुसार है। संसद में (20 नवंबर) को यह जानकारी दी गई। 31 अगस्त 2017 की अंतर-मंत्रालयी समूह की रिपोर्ट के अनुसार दूरसंचार उद्योग का कुल कर्ज 7.88 लाख करोड़ रुपये है। इसमें से भारतीय कर्ज कुल 1.77 लाख करोड़ रुपये, विदेशी कर्ज 83,918 करोड़ रुपये और कुल बैंक/एफआई कर्ज 2.61 लाख करोड़ रुपये है। 

राहत पर एक साथ सीआईआई, फिक्की
दूरसंचार कंपनियों के समायोजित सकल आय (एजीआर) को लेकर उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद इस क्षेत्र की वित्तीय स्थिति को लेकर परस्पर विरोधी तर्क-वितर्क के बीच उद्योगमंडल सीआईआई और फिक्की ने वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण से इस क्षेत्र के लिए राहत की मांग की  है। सीआईआई के अध्यक्ष विक्रम किर्लोस्कर ने वित्तमंत्री को लिखे पत्र में राजस्व साझा करने की मौजूदा व्यवस्था पर पुनर्विचार कर पारदर्शी व्यवस्था लागू करने की मांग की। 

डेटा सस्ता लेकिन लागत बढ़ी
ट्राई के मुताबिक, जून 2016 से दिसंबर, 2017 के बीच देश में मोबाइल डेटा की दरों में 95% की तेज गिरावट दर्ज की गई है।  मोबाइल डेटा 11.78 रुपए प्रति गीगाबाइट (जीबी) के औसत दाम में उपलब्ध है। मोबाइल कॉल की दरें भी 60 फीसदी गिरकर करीब 19 पैसे प्रति मिनट हो गई। वहीं, इस दौरान लागत बढ़ी।

नुकसान भरपाई की कोशिश
विश्लेषकों का मानना है कि दूरसंचार क्षेत्र में प्राइस वार की वजह से नुकसान झेल चुकी कंपनियों को कॉल और डाटा की दरें बढ़ाने से नुकसान की भरपाई करने का मौका मिल सकता है। सिटी रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कंपनियों द्वारा दरें बढ़ाना एक टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है। इससे गलाकट प्रतिस्पर्धा पर रोक लगेगी। हालांकि, दरें बढ़ाने से नुकसान की कितनी भरपाई हो पाएगी यह कहना अभी जल्दबाजी होगा।

बीएसएनएल भी खस्ताहाल
जियो के बाजार में आने के बाद सिर्फ निजी दूरसंचार कंपनियों की ही हालत खराब नहीं हुई है। देश की सबसे प्रतिष्ठित टेलीकॉम कंपनी रही बीएसएनएल भी आर्थिक संकट के दौर से गुजर है। दूरसंचार कंपनियों में सबसे अधिक 1.76 लाख कर्मचारी वाली इस सरकारी की हालात बहुत खराब है। सरकार की ओर से इसे उबारने के लिए वीआरएस स्कीम शुरू की गई है। इसके तहत करीब एक लाख कर्मचारी वीआरएस लेंगे।

सिर्फ चार कंपनियां रह गई
साल 2016 के बाद देश के दूरसंचार क्षेत्र में बड़ा बदलाव आया। वित्तीय वर्ष 2008-10 में देश में 13 दूरसंचार कंपनियां अपनी सेवा दे रही थी, जिनकी संख्या अब घटकर मात्र चार पर आ गई है। जियो के आने से बाजार से आरकॉम, टाटा इंडिकॉम, एयरसेल, डाटाकॉम (वीडियोकॉन), लूप मोबाइल (पूर्व बीपीएल), युनिटेक वायरलेस, स्वान टेलिकॉम, वर्जिन मोबाइल इंडिया जैसी कंपनियां बाजार से बाहर हो गई।

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