धान की रोपाई से कीट नियंत्रण तक, किसानों को मिली वैज्ञानिक सलाह
जलालगढ़ के बेगमपुर गांव में कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा आयोजित कार्यक्रम में वैज्ञानिकों ने किसानों को धान की वैज्ञानिक खेती, फसल प्रबंधन और उर्वरक के प्रयोग के उपाय बताए। वैज्ञानिकों ने 15 किसानों को खेतों में नमी बनाए रखने और कीट नियंत्रण के लिए उचित सलाह दी। किसानों ने इस पहल का स्वागत किया।

जलालगढ़, एक संवाददाता। कृषि विज्ञान केंद्र जलालगढ़ द्वारा संचालित कृषि सलाह सेवा कार्यक्रम के तहत वैज्ञानिकों की टीम ने शुक्रवार को जलालगढ़ प्रखंड के बेगमपुर गांव पहुंचकर किसानों को धान की वैज्ञानिक खेती एवं फसल प्रबंधन की जानकारी दी। कार्यक्रम में 15 पुरुष एवं महिला किसान शामिल थे। केवीके के वरीय वैज्ञानिक एवं प्रधान डॉ. के. एम. सिंह के निर्देश पर गठित वैज्ञानिक दल में डॉ. गोविंद कुमार, डॉ. संतोष कुमार एवं श्रीमती अनामिका कुमारी शामिल थीं। वैज्ञानिकों ने किसानों के खेतों का निरीक्षण कर धान की रोपाई कतारबद्ध तरीके से करने की सलाह दी। उन्होंने दो कतारों के बीच 20 सेंटीमीटर तथा पौधों के बीच 15 सेंटीमीटर की दूरी रखने की अनुशंसा की, ताकि प्रति वर्ग मीटर 35 से 50 पौधों की पर्याप्त संख्या सुनिश्चित हो सके। वैज्ञानिकों ने किसानों को संतुलित उर्वरक के उपयोग पर जोर देते हुए खैरा रोग की रोकथाम के लिए प्रति एकड़ 6 से 7 किलोग्राम जिंक सल्फेट का प्रयोग करने की सलाह दी। निरीक्षण के दौरान अधिकांश खेतों में नमी की कमी और खरपतवार की समस्या पाई गई। इसके समाधान के लिए खेतों में पर्याप्त जल प्रबंधन करने तथा रासायनिक खरपतवार नियंत्रण के तहत बिस्पिरिबैक सोडियम 80 मिलीलीटर और पिराजोसल्फ्यूरॉन 80 ग्राम प्रति एकड़ की दर से घोल बनाकर रोपाई के 20 से 25 दिन बाद छिड़काव करने की सलाह दी गई。
धान के खेतों में बनाए रखें नमी:
किसानों ने वैज्ञानिकों को बताया कि धान की फसल में रोपाई के लगभग 45 दिनों बाद तना छेदक कीट का प्रकोप देखा जाता है। इस पर वैज्ञानिकों ने फिप्रोनिल 8 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से पर्याप्त नमी की अवस्था में खेतों में प्रयोग करने की सलाह दी। इसके अलावा रोपाई के 15 से 20 दिन बाद यूरिया की दूसरी किस्त 20 से 25 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से देने तथा धान के खेतों में नमी बनाए रखने पर विशेष ध्यान देने की सलाह भी किसानों को दी गई। कृषि विज्ञान केंद्र की इस पहल का किसानों ने स्वागत किया और इसे खेती की उत्पादकता बढ़ाने में उपयोगी बताया।


