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देशबंगाल के बाद अब भाजपा की नजर ओडिशा से लेकर केरल तक, स्थानीय नेताओं को पार्टी जोड़ने की तैयारी

रामनारायण श्रीवास्तव, हिन्दुस्तान,नई दिल्ली।Published By: Himanshu Jha
Sat, 15 May 2021 06:46 AM
बंगाल के बाद अब भाजपा की नजर ओडिशा से लेकर केरल तक, स्थानीय नेताओं को पार्टी जोड़ने की तैयारी

पश्चिम बंगाल में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराने के बाद भाजपा की नजर अब ओडिशा से लेकर केरल तक के तटवर्ती राज्यों पर है, जहां वह कमजोर है। पार्टी ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल के लिए नई रणनीति की तैयारी कर रही है, जिसमें दूसरे दलों के प्रमुख नेताओं को अपने साथ लाना शामिल है।

भाजपा ने बीते छह सालों में देश के अधिकांश राज्यों में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराई है, लेकिन अभी भी वह ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल में काफी कमजोर है। ऐसे में पार्टी का अगला लक्ष्य इन राज्यों में अपनी चुनावी जमीन मजबूत करना है और वहां की विधानसभाओं में प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराना है। ओडिशा और तेलंगाना के लिए पार्टी की रणनीति ज्यादा आक्रामक रह सकती है और वहां पर वह सत्ता की दावेदारी भी ठोक सकती है।

भाजपा के इस कोरोमंडल मिशन में 2024 के लोकसभा चुनाव की तैयारी भी शामिल रहेगी। पार्टी के एक प्रमुख नेता ने कहा है कि भाजपा अपनी विचारधारा में विश्वास व्यक्त करने वाले हर नेता को साथ लाने के लिए तैयार है। इन राज्यों के दूसरे दलों में ऐसे कई नेता हैं जो भाजपा और केंद्र सरकार को पसंद करते हैं। ऐसे नेता उसके साथ जल्द जुड़ सकते हैं।

सूत्रों का कहना है कि तेलंगाना में टीआरएस और कांग्रेस जबकि आंध्र प्रदेश में तेलुगूदेशम के कई मजबूत स्थानीय नेता भाजपा के साथ जुड़ सकते हैं। इनके साथ पार्टी के बड़े नेता भी संपर्क में हैं। हाल में भाजपा ने तेलंगाना में कुछ अहम सफलता भी हासिल की है और उसका मानना है कि राज्य में टीआरएस के मुकाबले वही प्रमुख विरोधी दल की स्थिति में है।

आंध्र प्रदेश में अभी भी वाईएसआर कांग्रेस और तेलुगुदेशम दो बड़े दल हैं। ऐसे में भाजपा को अपनी जगह बनाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। लेकिन तेलुगुदेशम के कमजोर होने पर उसे फायदा मिल सकता है। तमिलनाडु और केरल के लिए पार्टी को अब नई रणनीति पर काम करना होगा। तमिलनाडु में दो प्रमुख क्षेत्रीय दलों और केरल में दो प्रमुख गठबंधन में भाजपा अपने लिए जगह नहीं बना पा रही है। इन दोनों राज्यों में एक दल या एक गठबंधन के कमजोर पड़ने पर ही भाजपा को मौका मिल सकता है। ऐसे में पार्टी धीरे-धीरे कर दूसरे दलों के स्थानीय नेताओं को अपने साथ जोड़ेगी और अपनी ताकत बढ़ाएगी।

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