After Ayodhya Big Challenge For BJP To Set New Agenda - 'अयोध्या पर फैसले के बाद भाजपा के सामने अब नया एजेंडा तय करने की चुनौती' DA Image
15 दिसंबर, 2019|4:14|IST

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'अयोध्या पर फैसले के बाद भाजपा के सामने अब नया एजेंडा तय करने की चुनौती'

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भाजपा के लिए नए लक्ष्य का समअयोध्या में राम मंदिर का निर्माण लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी का एक मुख्य मुद्दा रहा है। आज यह पार्टी जो कुछ भी है, इसी मुद्दे की वजह से ही है। जहां एक तरफ सुप्रीम कोर्ट का फैसला भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों को कुछ समय तक प्रसन्नता देगा, वहीं पार्टी के सामने अब चुनौती होगी अपनी आगे की यात्रा के लिए नया एजेंडा तय करने की।

यह मुद्दा लंबे समय तक लंबित रहा था, जिसने पार्टी को अपना आधार बनाने और समर्थकों को संगठित रखने में पार्टी की खासी मदद की, लेकिन अब यह मील का पत्थर पार होते ही सबकुछ पीछे छूट जाएगा, तब यह सोचना पड़ेगा कि इसके आगे क्या?

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यह भी सच है कि 2014 में भाजपा विकास के वादे के साथ सत्ता में आई थी। हमें यह नहीं पता कि 2024 के अगले आम चुनाव तक इसका कामकाज कैसा रहेगा। मुझे लगता है कि पार्टी की जरूरत अब यह है कि वह अब किसी ऐसे बड़े मुद्दे को पहचाने और अपनाए, जो उसे सीधे लोगों से जोड़ता हो।

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जरूरी नहीं है कि पार्टी का नया एजेंडा किसी आस्था या किसी तरह धर्म से जुड़ा हुआ ही हो। मुद्दा, दरअसल ऐसा होना चाहिए जो लोगों को यह संदेश देने में कामयाब रहे कि पार्टी अपने मतदाताओं और समर्थकों का वास्तव में पूरा खयाल रखती है। यह मुद्दा विकास से जुड़ा हुआ भी हो सकता है। फिलहाल यह घोषणा कठिन है कि लोग 2024 तक किन मुद्दों को पसंद करेंगे।

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सुप्रीम कोर्ट के शनिवार के फैसले पर कुछ लोग अपना अति-उत्साह प्रदर्शित करने के लिए बढ़-चढ़कर आगे आ सकते हैं। ये ऐसे लोग हो सकते हैं, जो यह चाहेंगे कि भावनाएं भड़कें। अगर ऐसा हुआ, तो इस समय सरकार पर रोजगार के नए अवसर तैयार करने का जो दबाव बन रहा है, वह कुछ समय के लिए हल्का पड़ सकता है।

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देश की सर्वोच्च अदालत को जो फैसला आया है, उसमें सरकार की अपनी कोई भूमिका नहीं है, लेकिन इस फैसले ने सरकार को कुछ राहत तो दी ही है। खासकर आर्थिक मसलों पर सरकार के ऊपर जो दबाव बना था, वह इससे कुछ कम तो हुआ ही है, लेकिन यह एक अलग मसला है। हमें जो फैसला मिला है, वह देश के सर्वोच्च न्यायालय का फैसला है, जिसने दशकों पुरानी एक समस्या को समाधान तक पहंुचाने की कोशिश की है। किसी भी तरह से इसके जरिये विभिन्न धर्मों के धर्मावलंबियों के बीच तनाव फैलाने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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