Advocate Rajeev Dhawan who appeared for Sunni Waqf Board and other Muslim parties in Ayodhya case Just been sacked from Babri case - राजीव धवन को जमीयत ने अयोध्या केस से हटाया, फेसबुक पोस्ट पर बयां किया दर्द DA Image
11 दिसंबर, 2019|11:41|IST

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राजीव धवन को जमीयत ने अयोध्या केस से हटाया, फेसबुक पोस्ट पर बयां किया दर्द

rajeev dhawan

अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद में मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन को केस से हटा दिया गया है। इसकी जानकारी खुद राजीव धवन ने फेसबुक पोस्ट के जरिए दी है। वहीं इस मामले में सोमवार को जमीयत- उलेमा-ए-हिन्द की ओर से पुनर्विचार याचिका दायर की गई। सोमवार को दायर याचिका में मांग की गई कि संविधान पीठ के आदेश पर रोक लगाई जाए। यह पुनर्विचार याचिका इस विवाद में मूल वादकारियों में शामिल एम. सिद्दीकी के कानूनी वारिस मौलाना सैयद अशहद रशीदी ने दायर की है। रशीदी जमीयत-उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष हैं।

राजीव धवन ने फेसबुक पोस्ट पर लिखा कि मुझे बताया गया कि मुझे केस से हटा दिया गया है, क्योंकि मेरी तबियत ठीक नहीं है। जो बिल्कुल बकवास बात है। जमीयत को ये हक है कि वो मुझे केस से हटा सकते हैं लेकिन जो वजह दी गई है वह गलत है। 

 

आपको बता दें कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से अपने फैसले में अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूमि रामलला को सौंपने और मस्जिद निर्माण के लिए उप्र सुन्नी वक्फ बोर्ड को पांच एकड़ का भूखंड आवंटित करने का केंद्र को निर्देश दिया था। हालांकि, संविधान पीठ के इस फैसले को उप्र सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड ने चुनौती नहीं देने का निर्णय लिया लेकिन इस प्रकरण के मूल वादकारों में शामिल एम सिद्दीक के कानूनी वारिस और उप्र जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष मौलाना सैयद अशहाद रशीदी ने 14 बिन्दुओं पर शीर्ष अदालत के निर्णय पर पुनर्विचार के लिए याचिका दायर की है।

दायर पुनर्विचार याचिका में 09 नवंबर के निर्णय पर अंतरिम रोक लगाने का आग्रह किया गया है। पांच जजों की पीठ के इस सर्वसम्मत फैसले में कोर्ट ने मंदिर निर्माण के लिए तीन महीने में एक ट्रस्ट गठित करने का निर्देश केंद्र को दिया है। रशीदी ने अयोध्या में प्रमुख स्थान पर मस्जिद के लिए अयोध्या में पांच एकड़ का भूखंड आवंटित करने के लिए केंद्र और उप्र सरकार को न्यायालय के निर्देश पर भी सवाल उठाया है। उनका तर्क है कि मुस्लिम पक्षकारों ने इस तरह का कोई भी आग्रह कभी नहीं किया।

याचिका में दलील दी गयी है कि विवादित स्थल पर मस्जिद गिराने सहित हिन्दू पक्षकारों द्वारा अनेक अवैधताओं का संज्ञान लेने के बावजूद शीर्ष अदालत ने उन्हें माफ कर दिया और भूमि भी उनको दे दी। इस फैसले के माध्यम से न्यायालय ने बाबरी मस्जिद नष्ट करने और उसके स्थान पर वहां भगवान राम के मंदिर के निर्माण का परमादेश दे दिया है। याचिका में कहा गया है कि फैसले में न्यायालय ने हिन्दू पक्षकारों की अनेक अवैधताओं, विशेषकर 1934 में (बाबरी मस्जिद के गुंबदों को नुकसान पहुंचाना) 1949 (बाबरी मस्जिद को अपवित्र करना) और 1992 (बाबरी मस्जिद को गिराना) का संज्ञान लिया, फिर भी उसने इन गैरकानूनी कृत्यों को माफ करने और विवादित स्थल को उसी पक्ष को सौंप दिया जिसने अनेक गैरकानूनी कृत्यों के आधार पर अपना दावा किया था।

हालांकि, रशीदी ने याचिका में कहा है कि वह पूरे फैसले और अनेक नतीजों पर पुनर्विचार का अनुरोध नहीं कर रहे हैं और उनकी याचिका हिन्दुओं के नाम भूमि करने जैसी त्रुटियों तक सीमित है क्योंकि यह एक तरह से बाबरी मस्जिद को नष्ट करने के परमादेश जैसा है और हिन्दू पक्षकारों को इसका अधिकार देते समय कोई भी व्यक्ति इस तरह की अवैधता से लाभ हासिल नहीं कर सकता है। 

याचिका में कहा गया है कि फैसले ने कानून के इस प्रतिपादित सिद्धांत को नजरअंदाज किया कि वाद के लिए दागी कार्रवाई के आधार पर दीवानी मामले में डिक्री नहीं की जा सकती या फिर यह टिक नहीं सकती। रशीदी ने 93 पेज की अपनी पुनर्विचार याचिका में यह भी दलील दी है कि संविधान पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 का गलत तरीके से इस्तेमाल करके गलती की है क्योंकि पूर्ण न्याय करने या फिर अवैधता को सही करने के लिए सिर्फ बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण का निर्देश दिया जा सकता है।

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