पांच करोड़ से विश्वविद्यालय में बनेगी अत्याधुनिक एयर क्वालिटी लैब
महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय को विश्व बैंक से वित्तपोषित यूपी कैंप परियोजना मिली है। इसके तहत वायु गुणवत्ता लैब स्थापित की जाएगी, जो प्रदूषण के स्रोतों की पहचान करेगी। परियोजना का लक्ष्य अगले पांच वर्षों में वायु प्रदूषण को 40 फीसदी तक कम करना है।

अंकित शुक्ला, बरेली। वायु प्रदूषण के असली कारणों की पहचान अब वैज्ञानिक तरीके से की जाएगी। महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय को विश्व बैंक से वित्तपोषित यूपी कैंप परियोजना मिली है। इसके तहत विश्वविद्यालय में करीब पांच करोड़ रुपये की लागत से अत्याधुनिक एयर क्वालिटी लैब स्थापित की जाएगी। लैब में जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर यह पता लगाया जाएगा कि प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में प्रदूषण के लिए कौन-कौन से स्रोत कितने जिम्मेदार हैं। परियोजना का लक्ष्य अगले पांच वर्षों में वायु प्रदूषण को करीब 40 फीसदी तक कम करने में योगदान देना है। परियोजना के प्रधान अन्वेषक प्रो. उपेंद्र कुमार हैं। वह पादप विज्ञान विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष और कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संकाय के डीन हैं। उनके कृषि और पादत विज्ञान के लंबे शोध अनुभव का लाभ परियोजना में कृषि एवं वायु प्रदूषण के संबंधों के अध्ययन में मिलेगा। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अनिल कुमार राय ने शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता जताते हुए प्रो. उपेंद्र कुमार और परियोजना टीम को बधाई दी। विश्वविद्यालय को उम्मीद है कि यह लैब उसे वायु प्रदूषण, कृषि और पर्यावरण अनुसंधान के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित करने में मदद करेगी。
इन स्रोतों पर रहेगा फोकस
परियोजना में वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार मानवजनित और प्राकृतिक स्रोतों का अध्ययन किया जाएगा। कृषि गतिविधियां, फसल अवशेष और पराली जलाना, औद्योगिक इकाइयां, वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण कार्य और घरेलू ईंधन प्रमुख रूप से अध्ययन के दायरे में होंगे। वैज्ञानिक तकनीकों और डेटा विश्लेषण से अलग-अलग क्षेत्रों में प्रदूषण में प्रत्येक स्रोत के योगदान का आकलन किया जाएगा।
हॉटस्पॉट और प्रदूषण के असली कारण तलाशे जाएंगे
प्रस्तावित एयर क्वालिटी लैब में वायु गुणवत्ता से जुड़े आंकड़ों को जुटाने और उनका विश्लेषण करने की सुविधा होगी। यहां विभिन्न प्रदूषकों का अध्ययन, सोर्स अप्वाइंटमेंट, प्रदूषण हॉटस्पॉट की पहचान और क्षेत्र के हिसाब से नियंत्रण रणनीति तैयार करने में मदद मिलेगी। आंकड़ों से यह तय करने का प्रयास होगा कि किस क्षेत्र में प्रदूषण का कौन सा स्रोत अधिक प्रभावी है और उसे नियंत्रित करने से सबसे ज्यादा फायदा मिल सकता है।
पराली से लेकर नीति तक, जमीनी समाधान पर जोर
यूपी कृषि प्रधान राज्य है, इसलिए पराली और कृषि अवशेषों से होने वाले प्रदूषण पर विशेष ध्यान रहेगा। किसानों के लिए ऐसे पराली प्रबंधन और अवशेषों के वैकल्पिक उपयोग के उपाय तलाशे जाएंगे, जो पर्यावरण के साथ आर्थिक रूप से भी फायदेमंद हों। परियोजना से पर्यावरण विज्ञान, कृषि, पादत विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी और डेटा विश्लेषण जैसे विषयों को जोड़कर अंतरविषयक शोध को बढ़ावा मिलेगा। विद्यार्थियों और शोधार्थियों को आधुनिक उपकरणों से काम करने का अवसर मिलेगा।
शोध का लाभ जमीन तक पहुंचाने की तैयारी
प्रो. उपेंद्र कुमार ने कहा कि वायु प्रदूषण का असर मानव स्वास्थ्य के साथ कृषि, अर्थव्यवस्था और सतत विकास पर भी पड़ता है। पहले प्रदूषण के वास्तविक स्रोतों की पहचान की जाएगी और फिर उनके नियंत्रण के व्यावहारिक उपाय विकसित किए जाएंगे। वैज्ञानिक शोध, आधुनिक तकनीक, विश्वसनीय आंकड़ों और विभिन्न विभागों व हितधारकों के सहयोग से 40 फीसदी कमी के लक्ष्य की दिशा में काम होगा। शोध परिणामों को केवल शोध पत्रों तक सीमित न रखकर जमीन पर लागू होने वाली तकनीकों और रणनीतियों में बदलने का प्रयास किया जाएगा।


