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'दरवाजा तोड़ घर में घुस गई थी भीड़, पलंग पर ही पति को जला दिया जिंदा': सिख दंगा पीड़ित

-जगदीश कौर, दंगा पीड़ित

मेरे पति केहर सिंह भारतीय सेना के इंजीनियरिंग कोर में थे। 18 साल का बेटा गुरप्रीत, चार साल का बेटा व तीन बेटियां भी थीं। गुरप्रीत उस वक्त बीएससी ऑनर्स का छात्र था। हमारा परिवार दिल्ली कैंट के राजनगर में रहता था। 1 नवंबर 1984 सुबह का वक्त था। पूरे क्षेत्र में शांति छाई हुई थी। पता करने पर दिल्ली में हो रहे कत्लेआम की जानकारी मिली। 

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थोड़ी देर बाद मेरे पति व बेटे को जानकारी मिली की भीड़ ने उनके किसी जानकार को गाड़ी से उतार कर आग के हवाले कर दिया। यह सुनते ही पूरा परिवार सहम सा गया। इसके बाद छोटे बेटे व तीन बेटियों को हमने सुरक्षित जगह पर भेज दिया। मैं, मेरे पति व बेटा घर पर ही छिपे रहे। साथ में मामा के बेटे का परिवार भी था। 

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दोपहर को अचानक किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी और देखते ही देखते भीड़ दरवाजा तोड़ कर घर के अंदर घुस गई। उन्होंने घर के अंदर पलंग पर ही मेरे पति को जिंदा जला दिया। थोड़ी दूर खड़े मेरे बेटे और मामा के तीन बेटों समेत घर को आग के हवाले कर दिया। इसके बाद एक तरफ जहां मेरे साथ तीन बच्चे थे तो दूसरी तरफ जले हुए घर पर मेरे पति व मेरे बेटे का शव अंतिम संस्कार का इंतजार कर था। उनके अंतिम संस्कार के लिए मेरे पास ना लोग थे और ना ही संसाधन है।

आखिर में तीसरे दिन जब इंदिरा गांधी की अंतिम क्रियाएं पूरी हुई तो मैंने हार कर घर के खिड़की, दरवाजों से लकड़ी पर्दे निकालकर व फर्नीचर तोड़कर अपने पति व बेटे के अधजले शरीर के अंतिम संस्कार के लिए प्रबंध किया। उसके बाद मेरे परिवार को मजबूरन दिल्ली छोड़ना पड़ा और हम अमृतसर चले गए, तब से न्याय के लिए मेरा संघर्ष जारी है।

-जगदीश कौर, दंगा पीड़ित

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