हथियारों से बड़ा गन के पीछे खड़ा जवान; पूर्व आर्मी चीफ ने बताई ऑपरेशन सिंदूर की सीक्रेट
तकनीकी प्रगति और आधुनिक हथियारों की सराहना करने के बावजूद, पूर्व सेना प्रमुख ने मानवीय इच्छाशक्ति और सैनिकों के मनोबल को युद्ध का सबसे बड़ा कारक बताया।

Indian Army: 1999 के कारगिल युद्ध के 27 साल बाद भारत की सैन्य क्षमताओं में एक अभूतपूर्व बदलाव आया है। कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना का सफल नेतृत्व करने वाले पूर्व सेना प्रमुख जनरल वेद प्रकाश मलिक (रिटायर) ने कारगिल विजय दिवस की 27वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर कहा कि कारगिल युद्ध से मिले कड़वे सबक ने भारत की सेना और उसकी तैयारिकों को पूरी तरह बदलकर रख दिया। टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए एक इंटरव्यू के दौरान जनरल मलिक भारतीय सेना की क्षमता के बारे में विस्तार से बताया।
जनरल मलिक के अनुसार, ऐतिहासिक सबकों और दो दशकों की तैयारियों का नतीजा था कि भारतीय सेना ने पिछले वर्ष 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान सीमा पार किए बिना ही पाकिस्तानी हवाई अड्डों और रडार स्टेशनों पर सटीक और विनाशकारी प्रहार किए। 1999 के युद्ध के दौरान सामने आई चुनौतियों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे आज के आधुनिक सेना पूरी तरह से बदल गई है।
उन्होंने कहा, "कारगिल युद्ध से हमें जो सबसे बड़ी सबक मिली वह यह थी कि खुफिया तंत्र को मजबूत करना, निगरानी क्षमताओं को बढ़ाना और सैन्य उपकरणों में आत्मनिर्भरता हासिल करना। इन प्राथमिकताओं ने अगले दो दशकों में भारत की सैन्य तैयारी की दिशा तय की।" उन्होंने 'ऑपरेशन सिंदूर' का उदाहरण देते हुए बताया कि आज भारतीय सशस्त्र बल निगरानी और सटीक हमलों के लिए छोटी व लंबी दूरी के ड्रोन, उन्नत रॉकेट प्रणालियों और लंबी दूरी की मिसाइलों पर तेजी से निर्भर हो रहे हैं।
उन्होंने कहा, "कारगिल के समय स्थितियां अलग थीं, लेकिन हालिया ऑपरेशन में हमें पाकिस्तानी क्षेत्र में दाखिल भी नहीं होना पड़ा और हमने दुश्मन के एयरफील्ड्स और रडार स्टेशनों को भारी नुकसान पहुंचाया।" जनरल मलिक ने आगे बताया कि ब्रह्मोस, आकाश मिसाइल सिस्टम और S-400 जैसी स्वदेशी और आयातित रक्षा प्रणालियों का अब वास्तविक युद्ध स्थितियों में परीक्षण हो चुका है। इसके साथ ही चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) के तहत एकीकृत त्रि-सेवा कमान के गठन ने भारत की रक्षा क्षमता को कई गुना मजबूत किया है।
गन के पीछे खड़ा जवान ही सबसे महत्वपूर्ण
तकनीकी प्रगति और आधुनिक हथियारों की सराहना करने के बावजूद, पूर्व सेना प्रमुख ने मानवीय इच्छाशक्ति और सैनिकों के मनोबल को युद्ध का सबसे बड़ा कारक बताया। कारगिल युद्ध के दिनों को याद करते हुए जनरल मलिक ने कहा, "युद्ध केवल तकनीक से नहीं जीते जाते। गन के पीछे खड़ा इंसान हमेशा सबसे महत्वपूर्ण होता है और हमें उनकी हर जरूरत का ध्यान रखना चाहिए। कारगिल युद्ध के दौरान मैं हर छह दिन में जम्मू-कश्मीर में अग्रिम मोर्चों का दौरा करता था। जहां दिल्ली में कभी-कभी चिंता या अनिश्चितता का माहौल होता था, वहीं सीमा पर तैनात एक भी जवान ने मुझसे यह नहीं कहा कि काम मुश्किल है। जवानों से मिलने वाली हर मुलाकात ने मेरे अपने मनोबल को नई ऊर्जा दी।"
युद्ध के बाद किए गए सुधारों पर प्रकाश डालते हुए जनरल मलिक ने बताया कि तत्कालीन सरकार ने कारगिल समीक्षा समिति का गठन किया था। इस समिति की सबसे प्रमुख सिफारिशों में से एक चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) के पद का सृजन था, जिसका मुख्य उद्देश्य सेना के तीनों अंगों के बीच बेहतर तालमेल को स्थापित करना था।
सेना एक ऑर्केस्ट्रा की तरह करती है काम
जनरल मलिक ने कहा कि हालांकि शीर्ष स्तर पर रणनीतिक योजना बनाई जाती है, लेकिन जीत का वास्तविक श्रेय उन युवा अधिकारियों और जवानों को जाता है जिन्होंने अत्यधिक विषम और दुर्गम ऊंचाइयों पर जाकर दुश्मन से लोहा लिया। इसके साथ ही उन्होंने सर्पोटिंग आर्म्स और सर्विसेज जैसे कि रसद, संचार और इंजीनियरिंग विंग की भूमिका को भी रेखांकित किया।
श्रीमदभगवद गीता का संदेश पढ़ते हुए उन्होंने कहा, "लोग अक्सर सहायक सेवाओं को भूल जाते हैं, लेकिन युद्ध के दौरान सेना एक 'ऑर्केस्ट्रा' की तरह काम करती है। जब हर अंग पूर्ण सामंजस्य के साथ काम करता है तभी विजय प्राप्त होती है। श्रीमदभगवद गीता में भी कहा गया है कि किसी भी योजना की वास्तविक परीक्षा उसके क्रियान्वयन में निहित है। ज्ञान से श्रेष्ठ कर्म है। हमारे युवा सैनिकों ने उसी कर्म के बल पर जीत हासिल की।"


