क्राइम कथा: अपने ही घर में जिंदा दफना दी गई राजघराने की वारिस! 3 साल बाद खुला राज, हिल गया पूरा देश
तीन सालों तक यह झूठ बिकता रहा। लेकिन शकीरे की बेटी एस्मेथ खलीली को दिल ही दिल में कुछ गलत होने का शक था। उनकी जिद और पुलिस की क्राइम ब्रांच की जांच जब आगे बढ़ी, तो बैंगलोर के उस आलीशान बंगले के आंगन में खुदाई शुरू हुई।

बैंगलोर (अब बेंगलुरु) का रिचमंड रोड। 28 अप्रैल 1991 की सुबह एक बहुत बड़े शाही घराने की वारिस अचानक गायब हो गई। नाम था शकीरे खलीली- सूर के पूर्व दीवान सर मिर्जा इस्माइल की पोती। करोड़ों की हवेली, बेशकीमती जमीनें और शाही रुतबा रखने वाली शकीरे अचानक ऐसे गायब हुईं कि पूरे शहर में हड़कंप मच गया। उनके पति और स्वघोषित गॉडमैन स्वामी श्रद्धानंद उर्फ मुरली मनोहर मिश्रा ने सबको यही कहानी सुनाई कि शकीरे किसी जरूरी काम से विदेश गई हैं।
तीन सालों तक यह झूठ बिकता रहा। लेकिन शकीरे की बेटी एस्मेथ खलीली को दिल ही दिल में कुछ गलत होने का शक था। उनकी जिद और पुलिस की क्राइम ब्रांच की जांच जब आगे बढ़ी, तो बैंगलोर के उस आलीशान बंगले के आंगन में खुदाई शुरू हुई।
मई 1994 में जब जमीन के नीचे से लकड़ी का एक बड़ा ताबूत बाहर निकला, तो पुलिस अधिकारियों के रोंगटे खड़े हो गए। उस ताबूत के भीतर गद्दे पर सोई हुई हालत में शकीरे का कंकाल पड़ा था। उनके शरीर के साथ-साथ उनके वे कपड़े और तकिया भी सुरक्षित थे, जो उस काली रात की खौफनाक दास्तान बयां कर रहे थे।
रामपुर के क्लर्क से लेकर करोड़ों की संपत्ति का कातिल स्वामी
मुरली मनोहर मिश्रा उर्फ स्वामी श्रद्धानंद कोई साधु या संन्यासी नहीं था। वह मध्य प्रदेश के रामपुर का रहने वाला एक मामूली क्लर्क था, जो शाही घरानों की संपत्तियों की देखरेख और तंत्र-मंत्र के बहाने लोगों के करीब आता था। शकीरे की पहली शादी पूर्व आईएफएस (IFS) अफसर अकबर खलीली से हुई थी। लेकिन जब रामपुर रियासत के काम के सिलसिले में श्रद्धानंद का शकीरे के घर आना-जाना बढ़ा, तो उसने शकीरे को अपनी बातों के जाल में फंसा लिया।
1985 में शकीरे ने अपने पहले पति को तलाक दे दिया और श्रद्धानंद से शादी कर ली। शादी के बाद ही ढोंगी बाबा की नीयत साफ होने लगी। उसकी नजर शकीरे के नाम दर्ज बैंगलोर, ऊटी और मध्य प्रदेश की 600 करोड़ रुपए से ज्यादा की बेहिसाब संपत्ति पर थी। उसने शकीरे के पावर ऑफ अटॉर्नी हासिल करने की कोशिशें शुरू कर दीं, लेकिन जब शकीरे ने संपत्ति अपने नियंत्रण में रखी, तो श्रद्धानंद ने उन्हें रास्ते से हटाने की साजिश रच डाली।
जिंदा दफनाने की खौफनाक साजिश और फोरेंसिक सबूत
28 अप्रैल 1991 की रात, श्रद्धानंद ने शकीरे की चाय में नींद की हाई डोज (सडेटिव्स) मिला दी। जब शकीरे गहरी बेहोशी में चली गईं, तो उसने बढ़ई से पहले से ही बनवाकर रखे गए लकड़ी के एक बड़े ताबूत को तैयार किया। उसने शकीरे को उनके ही गद्दे समेत उठाकर उस ताबूत में बंद कर दिया।
इसके बाद बंगले के आंगन में पहले से खोदे गए 8 फीट गहरे गड्ढे में उस ताबूत को उतार दिया गया और ऊपर से कंक्रीट डाल दिया गया। फोरेंसिक जांच में जब शव की हड्डियां मिलीं, तो पता चला कि शकीरे के हाथों की उंगलियां गद्दे के धागों और ताबूत की लकड़ी को खरोंच रही थीं। यानी जब उन्हें मिट्टी में दबाया जा रहा था, तब भी उनकी सांसें चल रही थीं- उन्हें जिंदा दफनाया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कायम की नई नजीर
मई 1994 में गिरफ्तारी के बाद श्रद्धानंद का झूठ ताश के पत्तों की तरह ढह गया। ट्रायल कोर्ट और कर्नाटक हाई कोर्ट दोनों ने इस बर्बरता के लिए श्रद्धानंद को फांसी की सजा सुनाई।
लेकिन 2008 में जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो शीर्ष अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। जस्टिस बी.एन. अग्रवाल की बेंच ने श्रद्धानंद की फांसी की सजा को 'ताउम्र जेल' में बदल दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई मामलों में फांसी और साधारण उम्रकैद, जिसमें 14 साल बाद रिहाई मिल जाती है, के बीच एक तीसरे विकल्प की जरूरत है- यानी अपराधी अपनी आखिरी सांस तक सलाखों के पीछे ही रहेगा और उसे कभी पैरोल नहीं मिलेगी।
यह भारतीय कानूनी इतिहास का पहला ऐसा मामला बना जहां 'ताउम्र बिना रिहाई' के नियम को इतनी सख्ती से लागू किया गया।
शीर्ष अदालत ने कहा, "उसने न सिर्फ अपनी पत्नी की हत्या की, बल्कि उसे जिंदा मिट्टी में दबा दिया ताकि वह उसकी अकूत संपत्ति का इकलौता मालिक बन सके। ऐसे व्यक्ति का कभी जेल से बाहर आना समाज के लिए खतरा है।"
अनसुलझे सवाल और आज की स्थिति
शकीरे खलीली की हत्या ने भारत के अमीर और शाही घरानों के भीतर छिपे लालच और ढोंगी बाबाओं के भयानक प्रभाव को नंगा कर दिया। 30 साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका है, और स्वामी श्रद्धानंद आज भी मध्य प्रदेश की जेल में अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है। उसने कई बार बीमारी और उम्र का हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट से रिहाई की गुहार लगाई, लेकिन अदालत ने हर बार उसकी अर्जी खारिज कर दी।
बैंगलोर का वह आलीशान बंगला आज भी उस काली रात की खामोश गवाही देता है, जहां एक खूबसूरत जिंदगी को लालच के हाथों जिंदा दफना दिया गया था।


