क्रिएटिव फ्रीडम की आड़ में...सतलुज फिल्म विवाद पर मोदी सरकार के मंत्री ने कही बड़ी बात, क्या बोले
सतलुज फिल्म विवाद अब मोदी सरकार के मंत्री का भी बयान है। केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने रविवार को कहाकि क्रिएटिव फ्रीडम की आड़ लेकर विवादित तथ्यों को इतिहास की तरह नहीं स्थापित किया जा सकता।

सतलुज फिल्म विवाद अब मोदी सरकार के मंत्री का भी बयान है। केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने रविवार को कहाकि क्रिएटिव फ्रीडम की आड़ लेकर विवादित तथ्यों को इतिहास की तरह नहीं स्थापित किया जा सकता। दिलजीत दोसांझ की फिल्म पर टिप्पणी करते हुए बिट्टू ने कहाकि पंजाब का दर्दनाक अतीत कोई ऐसी पटकथा नहीं है जिसे किसी विमर्श के हिसाब से चुनिंदा ढंग से पेश कर दिया जाए। गौरतलब है कि हनी त्रेहन के निर्देशन में बनी फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की जिंदगी पर आधारित है। उन्होंने 1984 और 1994 के बीच पंजाब में हजारों अज्ञात शवों के गैर-कानूनी ढंग से किए गए अंतिम संस्कार की जांच की थी। सितंबर 1995 में अमृतसर में खालड़ा का उनके घर के सामने से अपहरण कर लिया गया था। बाद में पता चला कि उनकी हत्या कर दी गई थी, लेकिन उनका शव कभी नहीं मिला।
टाइटल बदलकर किया गया रिलीज
शुरू में इस फिल्म का शीर्षक ‘पंजाब 95’ था, जिसे बदलकर ‘सतलुज’ कर दिया गया। इस फिल्म को तीन जुलाई को रिलीज होने के दो दिन बाद ही भारत में ओटीटी मंच ‘जी 5’ से हटा दिया गया था, क्योंकि सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने सुरक्षा संबंधी चिंताएं जताई थीं। रेलवे और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री बिट्टू ने एक बयान में कहाकि मैं ‘सतलुज’ फिल्म के निर्माता और निर्देशक को चुनौती देता हूं कि वे पंजाब के लोगों के सामने वे सभी दस्तावेजी सबूत, सरकारी रिकॉर्ड, न्यायिक निष्कर्ष और प्रमाणित डेटा रखें, जिनसे 25,000 लोगों के लापता होने या उन्हें गैर-कानूनी तरीके से अंतिम संस्कार किए जाने की बात स्थापित हो जैसा कि फिल्म में दर्शाया गया है। बिट्ट ने पूछा कि अगर यह आंकड़ा सिर्फ एक अनुमान या आरोप है, तो इसे एक स्थापित ऐतिहासिक तथ्य के तौर पर क्यों पेश किया गया? दर्शकों को यह क्यों नहीं बताया गया कि यह संख्या किसी अंतिम न्यायिक फैसले से पक्के तौर पर साबित नहीं हुई है?
बेअंत सिंह के पोते हैं बिट्टू
बिट्टू, पंजाब के मौजूदा मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते हैं। बेअंत सिंह की 31 अगस्त, 1995 को चंडीगढ़ में उच्च सुरक्षा वाले सचिवालय में हत्या कर दी गई थी। केंद्रीय मंत्री ने आगे कहाकि मैं ‘सतलुज’ के निर्माताओं से अपील करता हूं कि वे 25,000 के आंकड़े के पीछे के दस्तावेज़ी आधार को उचित समय के भीतर सार्वजनिक करें। अगर वे विश्वसनीय और सत्यापन योग्य सबूतों के साथ अपने दावे को साबित नहीं कर पाते हैं, तो उन्हें पंजाब के लोगों को यह स्पष्टीकरण देना चाहिए कि यह आंकड़ा आधिकारिक तौर पर सत्यापन योग्य आंकड़ा नहीं है। उन्होंने कहाकि हम यह सुनिश्चित करने के लिए सभी उचित कानूनी और संवैधानिक उपायों पर विचार करेंगे कि देश के सामने ऐतिहासिक तथ्यों को गलत तरीके से पेश न किया जाए। उन्होंने कहाकि पंजाब के इतिहास को चुनिंदा कहानियों के जरिए फिर से नहीं लिखा जा सकता। दुष्प्रचार पर सच, कल्पना पर तथ्य और भावनाओं पर सबूतों की जीत होनी चाहिए।
सिख संगठनों का आया है बयान
बिट्टू का यह बयान ऐसे समय में आया जब शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) और शिरोमणि अकाली दल (शिअद) समेत पंजाब के कई सिख संगठनों और राजनीतिक दलों ने ‘जी5’ मंच से ‘सतलुज’ फिल्म को हटाए जाने की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहाकि यह फिल्म भारत को सरकार के ‘सबसे काले अध्यायों’ में से एक का सामना करने के लिए मजबूर करती है। ‘इतिहास का सामना ईमानदारी से किया जाना चाहिए, न कि सेंसरशिप के जरिए उसे दबाया जाना चाहिए।’ हालांकि, बिट्टू ने कहाकि पंजाब के लोग उतनी ही परेशान करने वाली बातों को छोड़ दिए जाने और पंजाब के सबसे काले दौर को चुनिंदा तरीके से दिखाये जाने को लेकर जवाब पाने के हकदार हैं।
बिट्टू ने यह सवाल भी पूछा
लुधियाना के सांसद बिट्टू ने पूछाकि आतंकवाद से लोहा लेते हुए वीरगति को प्राप्त हुए पंजाब पुलिस के जवानों, सुरक्षा बलों और अनगिनत बहादुर नागरिकों के भारी बलिदान को कम करके क्यों दिखाया गया? आतंकवादी हिंसा से बर्बाद हुए हजारों परिवार इस कहानी से लगभग गायब क्यों रहे? बिट्टू ने यह भी कहाकि किसी भी जिम्मेदार फिल्म निर्माता को यह अधिकार नहीं है कि वह विवादित आंकड़े को निर्विवाद सच के तौर पर पेश करके इतिहास को तोड़े-मरोड़े।
वैसे नवंबर 2005 में एक विशेष सीबीआई अदालत ने खालड़ा के अपहरण और हत्या के मामले में पूर्व डीएसपी जसपाल सिंह और सहायक उपनिरीक्षक अमरजीत सिंह को उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी, जबकि चार अन्य पुलिसकर्मियों को सात-सात साल की जेल की सजा दी गई थी। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने 2007 में अमरजीत सिंह को बरी कर दिया और बाकी चार दोषियों की सजा बढ़ाकर उम्रकैद कर दी। शीर्ष अदालत ने 2011 में इस फैसले को बरकरार रखा।


