सरकार को मोहन भागवत से नसीहत, जेन-जी के साथ खुलकर खड़ा हुआ आरएसएस
विश्लेषण: आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने साफ कर दिया है कि उनको अगर किसी पर आंख मूंदकर भरोसा करना है तो वे जेन-जी पर ही करेंगे।

विश्लेषण- रामनारायण श्रीवास्तव
जेन-जी आंदोलन को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने पहली बार अपने सीधे संवाद में साफ कर दिया है कि उनको अगर किसी पर आंख मूंदकर भरोसा करना है तो वे जेन-जी पर ही करेंगे।यह एक वाक्य जेन-जी को लेकर संघ की दूरगामी रणनीति के संकेतों को साफ करने के लिए काफी है। इससे भागवत ने आहत जेन-जी की भावनाओं को सहलाने के साथ उसको अपने साथ जोड़ने का भरोसा दिया है। एक तरह से वादा किया है कि संघ उनके साथ हर हाल में पूरी तरह खड़ा है। सरकार को भी संघ प्रमुख से अपनी आलोचना में भविष्य का लाभ दिखता है, जो जेन-जी की नाराजगी से उसके पेशानी पर लगातार बल बनाए हुए थी। राजनीतिक रूप से भाजपा के लिए भी संघ प्रमुख का यह संवाद लाभ ही देगा और उसे आगे के लिए पथ प्रदर्शन का काम भी करेगा।
सरकार और भाजपा को लेकर जेन-जी में जो भी गुस्सा है, वह भी इससे कम होगा। चूंकि जेन-जी भी जानती है कि भाजपा और संघ में अंतर नहीं है और अगर संघ उसके साथ खड़ा है तो भाजपा का ज्यादा मतलब नहीं रहता है। यही वजह है कि जेन-जी के गुस्से, उसकी आकांक्षाओं, भावनाओं, सोच, नाराजगी, महत्वाकांक्षाओं को भागवत ने पूरी तरह से स्वीकार करते हुए नए पंख दिए हैं, जो कहीं न कहीं उसे अराजकता की तरफ जाने के बजाय भविष्य के भारत से जोड़ती है। इसमें विपक्ष को जेन-जी की इस नाराजगी का लाभ न मिलने का भाव भी कहीं न कहीं अंतर्निहित है।
संघ देख रहा भविष्य की ताकत
कहीं न कहीं जेन-जी के आंदोलन ने सरकार और भाजपा पर ही नहीं, संघ पर भी सवाल खड़े किए थे। इसलिए भी मोहन भागवत का उनको लेकर संदेश, स्वीकारोक्ति, संकल्प और समर्थन के काफी ज्यादा मायने हैं। इसमें संघ अपनी भविष्य की ताकत भी देख रहा है। अपने संवाद के जरिये भागवत न केवल उनके के साथ खड़े नजर आए, बल्कि आंदोलन से निपटने के सरकार के तरीकों पर सवाल खड़े कर गए। साफ है कि संघ यह बताने की कोशिश कर रहा है कि वह देश की इस नई पीढ़ी को न केवल करीब से समझ रहा है, बल्कि उसकी आकांक्षाओं को पंख देने के लिए भी पूरी तरह से तैयार है। संघ ने साफ कर दिया कि वह बदलाव के साथ खड़ा है और सरकार को इसका समर्थन करना चाहिए। भागवत ने इसमें समाज की अहम भूमिका जोड़कर यह भी साफ किया है कि इसके लिए समाज को भी नए बदलावों के लिए तैयार रहना चाहिए।
दरअसल, संघ मिशन मोड में काम करता है। उसकी कार्ययोजनाएं दीर्घकालिक और जमीनी बदलाव से जुड़ी होती हैं। जेन-जी को लेकर संघ के सर संघचालक का संवाद इसी दिशा में एक कदम है, जिसमें उन्होंने समाज में जेन-जी और जेन अल्फा की भूमिका को न केवल अहम माना है, बल्कि उसके साथ आगे बढ़ने का माद्दा भी दिखाया है। संघ की सोच सामाजिक होती है, लेकिन वह राजनीतिक बदलाव भी लिए होती है। ऐसे में उनका जेन-जी से संवाद सरकार को तो नसीहत है ही, साथ ही भविष्य के एक दृष्टिकोण को भी परिलक्षित करता है।
बुर्जुआ सोच के आरोपों को खारिज किया
भागवत के इस संवाद पर संघ के एक वरिष्ठ प्रचारक ने इसे सामाजिक दृष्टि से दादा-पोता की बांडिंग जैसा बताया है। उनका मानना है कि संघ लगातार युवाओं को अपने बौद्धिक कार्यक्रमों के जरिये जोड़ने की कोशिश करता रहता है। इसलिए जेन-जी से भागवत का संवाद कोई नया कदम नहीं है, हालांकि नई परिस्थितियों में नए स्वरूप में संघ को इस पीढ़ी से रूबरू कराना है। इसमें संघ पर लगने वाले बुर्जुआ सोच के आरोपों को भी खारिज किया गया है।
सरकार से जोड़ने की कोशिश
संवाद में सरकार की भूमिका पर कई सवाल खड़े किए गए और उसके तौर-तरीकों को गलत माना गया। एक तरफ से संघ प्रमुख ने राजहठ पर सवाल खड़े किए और बाल हठ को उसके परिपेक्ष्य में सही माना है। दरअसल संघ का व्यक्ति, समाज और राष्ट्र निर्माण का जो आंदोलन है, उसके लिए यह संवाद और उसमें संघ प्रमुख की स्पष्टवादिता देश की इस नई पीढ़ी के लिए नया संदेश भी है। सरकार की आलोचना के साथ उन्होंने कई मौकों पर सरकार को सही बताते हुए जेन-जी को उसके साथ जोड़ने और भरोसा करने की सीख भी दी है।


