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रोहिंग्याओं पर क्या बोल गए CJI सूर्यकांत, बनने लगे 'निशाना'; समर्थन में आए 44 रिटायर्ड जज

रोहिंग्याओं पर क्या बोल गए CJI सूर्यकांत, बनने लगे 'निशाना'; समर्थन में आए 44 रिटायर्ड जज

संक्षेप:

न्यायाधीशों ने उन रिपोर्टों पर चिंता व्यक्त की जिनमें दावा किया गया है कि कुछ विदेशी नागरिकों ने अवैध रूप से भारतीय पहचान और कल्याणकारी दस्तावेज हासिल किए हैं। जानिए क्या है मामला और क्यों निशाने पर आए CJI?

Dec 10, 2025 08:48 am ISTAmit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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भारतीय न्यायालयों के पूर्व न्यायाधीशों के एक समूह ने रोहिंग्या प्रवासियों से संबंधित मामले में हालिया सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणियों को लेकर उनके खिलाफ चलाए जा रहे 'अभियान' की कड़ी निंदा की है। सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने एक सार्वजनिक बयान जारी करते हुए कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का अपमान अस्वीकार्य है। यह बयान 5 दिसंबर को जारी एक खुले पत्र के जवाब में आया है, जिसमें न्यायिक पूछताछ को पूर्वाग्रह के रूप में बताया गया था और न्यायपालिका को अवैध ठहराने का प्रयास किया गया था।

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अब 44 पूर्व जजों ने एक संयुक्त बयान में कहा, 'पांच दिसंबर को कुछ पूर्व न्यायाधीशों, वकीलों और न्यायिक जवाबदेही एवं सुधार अभियान (सीजेएआर) द्वारा एक खुला पत्र जारी किया गया था। इसमें भारत में रोहिंग्या शरणार्थियों के हिरासत में लापता होने का आरोप लगाने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही उच्चतम न्यायालय की पीठ द्वारा दो दिसंबर को रोहिंग्या शरणार्थियों के बारे में की गई कुछ टिप्पणियों को लेकर गहरी चिंता जताई गई थी।'

‘न्यायालय की अवमानना ​​अस्वीकार्य’

बयान में इस बात का भी जिक्र किया गया कि ‘उच्चतम न्यायालय की अवमानना ​​अस्वीकार्य है’। इसमें कहा गया है कि न्यायिक कार्यवाही केवल निष्पक्ष और तर्कसंगत आलोचना के अधीन होनी चाहिए। इसमें कहा गया है, ‘हालांकि, हम जो देख रहे हैं, वह सैद्धांतिक असहमति नहीं है, बल्कि एक नियमित अदालती कार्यवाही को पूर्वाग्रह से प्रेरित कृत्य बताकर न्यायपालिका को अवैध ठहराने का प्रयास है।’

बयान में कहा गया है- प्रधान न्यायाधीश को सबसे बुनियादी कानूनी सवाल पूछने के लिए निशाना जा रहा है: अधिकारों या हकों पर कोई भी निर्णय तब तक आगे नहीं बढ़ सकता जब तक इस प्रारंभिक प्रश्न का समाधान न किया जाए। उन्होंने आगे कहा कि प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ अभियान में सुनवाई के दौरान पीठ की स्पष्ट पुष्टि को नजरअंदाज कर दिया गया कि भारतीय धरती पर किसी भी व्यक्ति, चाहे वह नागरिक हो या विदेशी, को यातना या अमानवीय व्यवहार का सामना नहीं करना पड़ेगा तथा प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा का सम्मान किया जाना चाहिए।

बयान पर 40 से अधिक न्यायाधीशों के हस्ताक्षर हैं। इसमें कहा गया है- इसलिए हम उच्चतम न्यायालय और प्रधान न्यायाधीश में अपना पूरा विश्वास व्यक्त करते हैं, न्यायालय की टिप्पणियों को विकृत करने और असहमति को व्यक्तिगत न्यायाधीशों पर हमले के रूप में प्रस्तुत करने के लक्षित प्रयासों की निंदा करते हैं। देश की संवैधानिक व्यवस्था के लिए मानवता और सतर्कता दोनों की आवश्यकता है।

रोहिंग्याओं का मामला क्या है?

यह विवाद रोहिंग्या प्रवासियों की भारत में स्थिति पर सर्वोच्च न्यायालय में चल रही कार्यवाही से जुड़ा है। रोहिंग्या मुसलमान मुख्य रूप से म्यांमार के रखाइन प्रांत से विस्थापित होकर भारत पहुंचे हैं। भारत 1951 के संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी सम्मेलन या उसके 1967 प्रोटोकॉल का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, इसलिए देश में शरणार्थियों के लिए कोई वैधानिक सुरक्षा ढांचा यहां उपलब्ध नहीं है। जो भी कानूनी दायित्व हैं वे भारतीय संविधान, घरेलू आव्रजन कानूनों और सामान्य मानवाधिकार मानदंडों से उत्पन्न होते हैं।

हालिया सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने रोहिंग्या प्रवासियों द्वारा दावा किए जा रहे दर्जे पर एक मूलभूत कानूनी प्रश्न उठाया। उन्होंने कहा था- कानून में किसने वह दर्जा प्रदान किया जो अदालत के समक्ष दावा किया जा रहा है?

क्या घुसपैठियों के स्वागत के लिए ‘रेड कार्पेट’ बिछाना चाहिए- SC

सुप्रीम कोर्ट ने भारत में रह रहे रोहिंग्या के कानूनी दर्जे पर तीखा सवाल किया था और पूछा था कि क्या घुसपैठियों के स्वागत के लिए रेड कार्पेट बिछाना चाहिए जबकि देश के अपने नागरिक गरीबी से जूझ रहे हैं। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मानवाधिकार कार्यकर्ता रीता मनचंदा द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए तीखी टिप्पणियां कीं। इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि यहां अधिकारियों की हिरासत से कुछ रोहिंग्या लापता हो गए हैं।

वकील ने आरोप लगाया कि मई में दिल्ली पुलिस ने कुछ रोहिंग्या को पकड़ा था और वे कहां हैं, इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। प्रधान न्यायाधीश ने पूछा- यदि उनके पास भारत में रहने का कानूनी दर्जा नहीं है तो वे घुसपैठिए हैं। उत्तर भारत में हमारी सीमा बहुत संवेदनशील है। यदि कोई घुसपैठिया आता है, तो क्या हम उनका यह कहकर स्वागत करेंगे कि हम आपको सभी सुविधाएं देना चाहते हैं? अदालत ने कहा- उन्हें वापस भेजने में क्या समस्या है? पीठ ने कहा- भारत ऐसा देश है जहां बहुत से गरीब लोग हैं, और हमें उन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

प्रधान न्यायाधीश ने पूछा- पहले आप प्रवेश करते हैं, आप अवैध रूप से सीमा पार करते हैं। आपने सुरंग खोदी या बाड़ पार की और अवैध रूप से भारत में दाखिल हुए। फिर आप कहते हैं, अब जब मैं प्रवेश कर गया हूं, तो आपके कानून मुझ पर लागू होने चाहिए और मैं भोजन का हकदार हूं, मैं आश्रय का हकदार हूं, मेरे बच्चे शिक्षा के हकदार हैं। क्या हम कानून को इस तरह से खींचना चाहते हैं।

याचिकाकर्ता ने 2020 के उच्चतम न्यायालय के आदेश का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि रोहिंग्या को केवल प्रक्रिया के अनुसार ही निर्वासित किया जाना चाहिए। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने पूछा- हमारे देश में भी गरीब लोग हैं। वे नागरिक हैं। क्या वे कुछ लाभों और सुविधाओं के हकदार नहीं हैं? उन पर ध्यान क्यों नहीं दिया जाता? यह सच है, अगर कोई अवैध रूप से प्रवेश भी कर गया है, तो हमें उन पर थर्ड-डिग्री का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए...आप उन्हें वापस लाने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का अनुरोध कर रहे हैं।

संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर करने वाले 44 जज

  1. जस्टिस अनिल दवे, भारत के सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज
  2. जस्टिस हेमंत गुप्ता, भारत के सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज
  3. जस्टिस अनिल देव सिंह, राजस्थान हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस
  4. जस्टिस बी. सी. पटेल, जम्मू और कश्मीर हाई कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस
  5. जस्टिस पी. बी. बाजनथ्री, पटना हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस
  6. जस्टिस सुभ्रो कमल मुखर्जी, कर्नाटक हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस
  7. जस्टिस परमोद कोहली, सिक्किम हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस और सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल के पूर्व चेयरमैन
  8. जस्टिस एस. एम. सोनी, गुजरात हाई कोर्ट के पूर्व जज और गुजरात राज्य के पूर्व लोकायुक्त
  9. जस्टिस के. श्रीधर राव, गुवाहाटी हाई कोर्ट के पूर्व एक्टिंग चीफ जस्टिस
  10. जस्टिस विष्णु एस. कोकजे, मध्य प्रदेश और राजस्थान हाई कोर्ट के पूर्व जज
  11. जस्टिस अंबादास जोशी, बॉम्बे हाई कोर्ट के पूर्व जज और गोवा राज्य के पूर्व लोकायुक्त
  12. जस्टिस एस. एन. ढींगरा, दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज
  13. जस्टिस आर. के. गौबा, दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज
  14. जस्टिस विनोद गोयल, दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज
  15. जस्टिस ज्ञान प्रकाश मित्तल, दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज
  16. जस्टिस विद्या भूषण गुप्ता, दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज
  17. जस्टिस रमेश कुमार मेराठिया, झारखंड हाई कोर्ट के पूर्व जज
  18. जस्टिस करम चंद पुरी, पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के पूर्व जज
  19. जस्टिस आर. एस. राठौर, राजस्थान हाई कोर्ट के पूर्व जज और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के पूर्व सदस्य
  20. जस्टिस राकेश सक्सेना, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के पूर्व जज
  21. जस्टिस के. के. त्रिवेदी, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के पूर्व जज
  22. जस्टिस एच. पी. सिंह, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के पूर्व जज
  23. जस्टिस डी. के. पालीवाल, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के पूर्व जज
  24. जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता, पूर्व न्यायाधीश, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट
  25. जस्टिस डॉ. शिव शंकर राव, पूर्व जज, तेलंगाना हाई कोर्ट
  26. जस्टिस प्रत्युष कुमार, पूर्व जज, इलाहाबाद हाई कोर्ट
  27. जस्टिस सुरेंद्र विक्रम सिंह राठौर, पूर्व जज, इलाहाबाद हाई कोर्ट
  28. जस्टिस विजय लक्ष्मी, पूर्व जज, इलाहाबाद हाई कोर्ट
  29. जस्टिस एस. के. त्रिपाठी, पूर्व जज, इलाहाबाद हाई कोर्ट
  30. जस्टिस डी. के. अरोड़ा, पूर्व जज, इलाहाबाद हाई कोर्ट
  31. जस्टिस राजेश कुमार, पूर्व जज, इलाहाबाद हाई कोर्ट
  32. जस्टिस एस. एन. श्रीवास्तव, पूर्व जज, इलाहाबाद हाई कोर्ट
  33. जस्टिस विनीत कोठारी, पूर्व जज, गुजरात हाई कोर्ट
  34. जस्टिस रविकुमार रामेश्वरदयाल त्रिपाठी, पूर्व जज, गुजरात हाई कोर्ट
  35. जस्टिस के. ए. पूज, पूर्व जज, गुजरात हाई कोर्ट
  36. जस्टिस पी. एन. रविंद्रन, पूर्व जज, केरल हाई कोर्ट
  37. जस्टिस हरिहरन नायर, पूर्व जज, केरल हाई कोर्ट
  38. जस्टिस वी. चितंबरेश, पूर्व जज, केरल हाई कोर्ट
  39. जस्टिस एन. के. बालकृष्णन, पूर्व जज, केरल हाई कोर्ट
  40. जस्टिस सुभाष चंद, पूर्व जज, इलाहाबाद हाई कोर्ट और उत्तराखंड हाई कोर्ट
  41. जस्टिस लोकपाल सिंह, पूर्व जज, उत्तराखंड हाई कोर्ट
  42. जस्टिस विवेक शर्मा, पूर्व जज, उत्तराखंड हाई कोर्ट
  43. जस्टिस नरेंद्र कुमार, पूर्व चेयरमैन, NCMEI
  44. जस्टिस राजीव लोचन, पूर्व जज, इलाहाबाद हाई कोर्ट

(इनपुट एजेंसी)

Amit Kumar

लेखक के बारे में

Amit Kumar
अमित कुमार एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें मीडिया इंडस्ट्री में नौ वर्षों से अधिक का अनुभव है। वर्तमान में वह लाइव हिन्दुस्तान में डिप्टी चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं। हिन्दुस्तान डिजिटल के साथ जुड़ने से पहले अमित ने कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम किया है। अमित ने अपने करियर की शुरुआत अमर उजाला (डिजिटल) से की। इसके अलावा उन्होंने वन इंडिया, इंडिया टीवी और जी न्यूज जैसे मीडिया हाउस में काम किया है, जहां उन्होंने न्यूज रिपोर्टिंग व कंटेंट क्रिएशन में अपनी स्किल्स को निखारा। अमित ने भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी जर्नलिज्म में पीजी डिप्लोमा और गुरु जंभेश्वर यूनिवर्सिटी, हिसार से मास कम्युनिकेशन में मास्टर (MA) किया है। अपने पूरे करियर के दौरान, अमित ने डिजिटल मीडिया में विभिन्न बीट्स पर काम किया है। अमित की एक्सपर्टीज पॉलिटिक्स, इंटरनेशनल, स्पोर्ट्स जर्नलिज्म, इंटरनेट रिपोर्टिंग और मल्टीमीडिया स्टोरीटेलिंग सहित विभिन्न क्षेत्रों में फैली हुई है। अमित नई मीडिया तकनीकों और पत्रकारिता पर उनके प्रभाव को लेकर काफी जुनूनी हैं। और पढ़ें
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