चीन हो या पाकिस्तान? किसी से भी हो जंग, कम नहीं पड़ेंगी मिसाइलें; रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का बड़ा प्लान
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब भारत के पड़ोस में मिसाइल क्षमताओं को बड़े सर्विलांस, कम्युनिकेशन और प्रिसिजन-स्ट्राइक नेटवर्क के साथ तेज़ी से जोड़ा जा रहा है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक अहम फैसला लेते हुए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित सभी पारंपरिक मिसाइल प्रणालियों की तकनीक भारतीय रक्षा उद्योग से जुड़ी कंपनियों को हस्तांतरित करने को मंजूरी दे दी है, ताकि देश में ही इनका उत्पादन किया जा सके और मिसाइलों की कमी दूर की जा सके। रक्षा मंत्रालय ने यह घोषणा करते हुए कहा कि यह कदम रक्षा क्षेत्र में घरेलू उद्योगों की अधिक भागीदारी को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। पहले ये तकनीकें मुख्य रूप से सरकारी संस्थानों तक सीमित थीं। अब इस तकनीक के हस्तांतरण से निजी कंपनियां भी मिसाइलों का निर्माण कर सकेंगी।
यह कदम न सिर्फ रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत के विजन को मजबूत करने वाला है बल्कि रक्षा निर्यात की दिशा में भी एक क्रांतिकारी कदम है। इसके साथ ही दुश्मन देशों (पाकिस्तान और चीन) के लिए भी एक बड़ा संदेश है कि जंग के सूरत-ए-हाल में भारत की मिसाइलें कम नहीं पड़ने वाली हैं। हालांकि, पाकिस्तान को चार दिनों की जंग के लिए भी चीन और दूसरे देशों से मिसाइल मंगानी पड़ती है। पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पूरी दुनिया ने यह देख लिया है, जिसमें भारतीय वायु सेना ने चीनी मिसाइलों को पुस्स कर दिया था।
इस कदम का मकसद क्या?
बहरहाल, मंत्रालय ने कहा, ''यह प्रावधान मिसाइल प्रणालियों के विकास से औद्योगिक उत्पादन तक सफलतापूर्वक पहुंचने में मदद करेगा। यह उन्नत रक्षा प्रणालियों के विकास और निर्माण में भारतीय उद्योग की क्षमताओं का लाभ उठाने के लिए डीआरडीओ के लगातार किए जा रहे प्रयासों को दर्शाता है।'' मंत्रालय ने कहा कि इस कदम का उद्देश्य देश में विनिर्माण क्षमता बढ़ाना, रक्षा औद्योगिक आधार को मजबूत करना और भारतीय एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों) तथा अन्य तकनीकी साझेदारों के लिए रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में भागीदारी के अवसर पैदा करना है।
'आत्मनिर्भर भारत' की दिशा में बड़ा कदम
बता दें कि हमारे सहयोगी अखबार हिन्दुस्तान टाइम्स ने सबसे पहले अक्टूबर 2025 में ही यह रिपोर्ट दी थी कि रक्षा मंत्रालय ने मिसाइल, आर्टिलरी शेल, गोला-बारूद और आयुध के डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग को प्राइवेट सेक्टर के लिए खोल दिया है। इस फैसले को रक्षा क्षेत्र में सरकार के 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान की दिशा में एक अहम कदम के तौर पर देखा जा रहा है। मंत्रालय ने कहा कि इससे मिसाइल सिस्टम को डेवलपमेंट स्टेज से इंडस्ट्रियल-स्केल प्रोडक्शन तक ले जाने में मदद मिलेगी और साथ ही भारत का घरेलू डिफेंस इंडस्ट्रियल बेस भी मजबूत होगा।
टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के फैसले की टाइमिंग अहम
यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब भारत के पड़ोस में मिसाइल क्षमताओं को बड़े सर्विलांस, कम्युनिकेशन और प्रिसिजन-स्ट्राइक नेटवर्क के साथ तेज़ी से जोड़ा जा रहा है। सेंटर फॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रेटेजिक स्टडीज़ (CAPSS) के जुलाई के एक एनालिसिस में पाकिस्तान की स्पेस क्षमताओं के तेजी से विस्तार पर जोर दिया गया, खासकर चीन के साथ उसके सहयोग के ज़रिए। एनालिसिस में कहा गया कि पाकिस्तान के स्पेस एंड अपर एटमॉस्फियर रिसर्च कमीशन (SUPARCO) ने दशकों की धीमी प्रगति के बाद 16 महीनों में छह सैटेलाइट लॉन्च किए। इसमें यह भी बताया गया कि पाकिस्तान अपनी ऑटोनॉमस स्पेस-बेस्ड सर्विलांस क्षमताओं को मज़बूत करने और सैटेलाइट इंटेलिजेंस को ज़मीनी कम्युनिकेशन सिस्टम के साथ जोड़ने की कोशिश कर रहा है।
पाकिस्तान की क्षमताओं पर एनालिसिस
CAPSS के एनालिसिस में कहा गया कि पाकिस्तान की स्पेस क्षमताओं के विस्तार का भारत की डिफेंस स्ट्रैटेजी पर असर पड़ सकता है, खासकर इसलिए क्योंकि आधुनिक मिलिट्री ऑपरेशन में सैटेलाइट-बेस्ड इंटेलिजेंस, नेविगेशन और कम्युनिकेशन तेज़ी से महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। इसमें पाकिस्तान के सैटेलाइट लॉन्च, टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट और अंतरिक्ष यात्रियों की ट्रेनिंग में चीन की भूमिका की ओर भी इशारा किया गया। इस माहौल में, मिसाइल सिस्टम बनाने की भारत की घरेलू क्षमता को बढ़ाने से देश की अहम हथियारों के प्रोडक्शन को बनाए रखने और उसे बढ़ाने की ताकत मज़बूत हो सकती है, जिससे विदेशी सप्लायर्स पर निर्भरता कम होगी।


