अगर पास हो जाता उनका यह बिल, तो AAP को नहीं तोड़ पाते राघव चड्ढा; छिन जाती सांसदी!

लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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राघव चड्ढा ने 6 सांसदों के साथ AAP छोड़ BJP का दामन थाम लिया है। जानिए कैसे अगर उनका अपना 4 साल पुराना 'दल-बदल विरोधी बिल' आज कानून होता, तो न सिर्फ उनकी सांसदी छिन जाती, बल्कि उन पर 6 साल का चुनाव बैन भी लग जाता।

अगर पास हो जाता उनका यह बिल, तो AAP को नहीं तोड़ पाते राघव चड्ढा; छिन जाती सांसदी!

आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता रहे राघव चड्ढा ने हाल ही में राज्यसभा के 6 अन्य सदस्यों के साथ पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने का ऐलान किया। लेकिन इस पूरी घटना में एक बड़ा विरोधाभास छिपा है। अगर 4 साल पहले राज्यसभा के सबसे युवा सदस्य के रूप में राघव चड्ढा द्वारा पेश किया गया पहला विधेयक आज कानून बन चुका होता, तो वह और उनके साथी इस तरह से पाला नहीं बदल पाते।

क्या है पूरा मामला?

हाल ही में राघव चड्ढा ने यह घोषणा की कि वह आम आदमी पार्टी के 6 अन्य राज्यसभा सांसदों के साथ मिलकर BJP में विलय कर रहे हैं। उन्होंने इसके लिए 'दो-तिहाई (2/3) बहुमत' के नियम का हवाला दिया। वर्तमान में राज्यसभा में AAP के 10 सांसद हैं, और 7 सांसदों (चड्ढा सहित) का एक साथ जाना मौजूदा दल-बदल विरोधी कानून के तहत 2/3 के आंकड़े को पार कर जाता है, जिससे उनकी सांसदी सुरक्षित रहती है।

खुद के ही बिल में फंस जाते चड्ढा

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह एक बड़ी विडंबना है कि 5 अगस्त 2022 को राज्यसभा में प्रवेश करने के मात्र तीन महीने बाद ही, राघव चड्ढा ने एक 'प्राइवेट मेंबर बिल' पेश किया था। उस समय अरविंद केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में गिने जाने वाले चड्ढा ने इस बिल के जरिए दल-बदल विरोधी कानून को और अधिक सख्त बनाने की मांग की थी। अगर यह प्रस्तावित बिल पास होकर कानून बन गया होता, तो:

  • पाला बदलने के लिए उन्हें अपनी पार्टी के छह नहीं, बल्कि सात अन्य सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होती।
  • पार्टी तोड़ने या दल-बदल करने पर इस पूरी टीम के छह साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लग जाती।

राघव चड्ढा के 2022 के बिल के मुख्य प्रावधान

चड्ढा के इस 'संविधान (संशोधन) विधेयक' का उद्देश्य "विधायकों द्वारा मतदाताओं की लोकतांत्रिक इच्छाओं की पूर्ण अनदेखी करते हुए किए जाने वाले नापाक दल-बदल" को रोकना था।

बिल में ये सख्त नियम सुझाए गए थे:

विलय की सीमा 2/3 से बढ़ाकर 3/4 करना: दसवीं अनुसूची में संशोधन करके किसी भी राजनीतिक दल के विलय को तभी वैध मानने का प्रस्ताव था, जब उस दल के कम से कम तीन-चौथाई (3/4) विधायक या सांसद इस विलय के लिए सहमत हों। वर्तमान में यह सीमा दो-तिहाई यानी 2/3 है।

6 साल का चुनाव बैन: अगर कोई सांसद या विधायक चुनाव जीतने के बाद अपनी पार्टी बदलता है, तो उसके अगले 6 वर्षों तक कोई भी चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए।

'रिसॉर्ट पॉलिटिक्स' पर लगाम: विधायकों की खरीद-फरोख्त और उन्हें होटलों/रिसॉर्ट्स में छिपाने की राजनीति को रोकने के लिए यह प्रस्ताव था कि- सरकार से समर्थन वापस लेने के 7 दिनों के भीतर ऐसे जनप्रतिनिधियों को अनिवार्य रूप से सदन के अध्यक्ष के समक्ष उपस्थित होना होगा। ऐसा न करने पर उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा।

संविधान के किन अनुच्छेदों में बदलाव की थी मांग?

इस बिल के जरिए चड्ढा ने लोकतंत्र को मजबूत करने और "जनप्रतिनिधियों को राजनीतिक दल के कार्यकर्ता के बजाय जागरूक कानून निर्माता बनाने" के उद्देश्य से संविधान के अनुच्छेद 102 और 191 के साथ-साथ दसवीं अनुसूची में बदलाव की मांग की थी।

अनुच्छेद 102 (2) और 191 (2): ये अनुच्छेद क्रमशः संसद (सांसदों) और राज्य विधानसभाओं (विधायकों) के सदस्यों को दसवीं अनुसूची (दल-बदल कानून) के तहत अयोग्य ठहराए जाने से संबंधित हैं।

वर्तमान स्थिति

उस समय राघव चड्ढा ने अपने बिल में तर्क दिया था कि दल-बदल कानून होने के बावजूद सांसदों/विधायकों की हॉर्स-ट्रेडिंग (खरीद-फरोख्त) की समस्या बड़े पैमाने पर फैली हुई है और यह हमारे लोकतंत्र पर एक धब्बा है।

विडंबना यह है कि आज वह खुद उसी दो-तिहाई वाले नियम का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसे वह बदलना चाहते थे। राज्यसभा के रिकॉर्ड के अनुसार चड्ढा का वह बिल आज भी लंबित है।

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Amit Kumar

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डिजिटल पत्रकारिता की बदलती लहरों के बीच समाचारों की तह तक जाने की ललक अमित कुमार को इस क्षेत्र में खींच लाई। समकालीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर पैनी नजर रखने के साथ-साथ अमित को जटिल विषयों के गूढ़ विश्लेषण में गहरी रुचि है। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के रहने वाले अमित को मीडिया जगत में एक दशक का अनुभव है। वे पिछले 4 वर्षों से लाइव हिन्दुस्तान में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।


अमित न केवल समाचारों के त्वरित प्रकाशन में माहिर हैं, बल्कि वे खबरों के पीछे छिपे 'क्यों' और 'कैसे' को विस्तार से समझाने वाले एक्सप्लेनर लिखने में भी विशेष रुचि रखते हैं। डिजिटल पत्रकारिता के नए आयामों, जैसे कि कीवर्ड रिसर्च, ट्रेंड एनालिसिस और एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन को वे बखूबी समझते हैं। उनकी पत्रकारिता की नींव 'फैक्ट-चेकिंग' और सत्यापन पर टिकी है। एक मल्टीमीडिया पत्रकार के तौर पर अमित का सफर देश के प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ रहा है। उन्होंने अमर उजाला, वन इंडिया, इंडिया टीवी और जी न्यूज जैसे बड़े मीडिया घरानों के साथ काम किया है।


अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।

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