जिम्मेदारी सिर्फ मां की क्यों? पितृत्व अवकाश को बनाया जाए कानूनी अधिकार, राज्यसभा में उठी मांग
Paternity Leave: चड्ढा ने कई देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां कर्मियों को लंबा अवकाश मिलता है। उन्होंने कहा कि भारत में भी सोच में बदलाव लाने की जरूरत है क्योंकि बच्चों के लालन-पोषण की जिम्मेदारी सिर्फ मां की ही नहीं, बल्कि यह साझा जिम्मेदारी है।

Paternity Leave: संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा में सोमवार को देश में पितृत्व अवकाश को कानूनी अधिकार का दर्जा दिए जाने की मांग की गई। आम आदमी पार्टी (आप) के सांसद राघव चड्ढा ने इसकी मांग करते हुए कहा कि बच्चों के लालन-पोषण की जिम्मेदारी सिर्फ मां की ही नहीं, बल्कि यह साझा दायित्व है। उच्च सदन में विशेष उल्लेख के जरिए यह मुद्दा उठाते हुए आप सांसद ने कहा कि अभी केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए 15 दिनों के (पितृत्व) अवकाश का प्रावधान है लेकिन निजी क्षेत्र में नहीं है। उन्होंने कहा कि देश के कुल कार्यबल का करीब 90 फीसदी यानी बडा हिस्सा निजी क्षेत्र में काम करता है। इसलिए उन्हें भी यह अधिकार मिलना चाहिए।
चड्ढा ने कई देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां कर्मियों को लंबा अवकाश मिलता है। उन्होंने कहा कि भारत में भी सोच में बदलाव लाने की जरूरत है क्योंकि बच्चों के लालन-पोषण की जिम्मेदारी सिर्फ मां की ही नहीं, बल्कि यह साझा जिम्मेदारी है। बाद में उन्होंने सोशल मीडिया पर अपने भाषण की एक वीडियो क्लिप साझा करते हुए लिखा, “मैंने संसद में यह मांग की कि भारत में 'पैटर्निटी लीव' (पितृत्व अवकाश) एक कानूनी अधिकार होना चाहिए।”
माता-पिता दोनों को बधाई दी जाती है
उन्होंने आगे लिखा, जब किसी बच्चे का जन्म होता है, तो माता-पिता दोनों को बधाई दी जाती है। लेकिन बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी किसी एक पर ही यानी सिर्फ माँ पर क्यों आती है। एक पिता को अपने नवजात बच्चे की देखभाल करने और अपनी नौकरी बचाने के बीच किसी एक को चुनने की मजबूरी नहीं होनी चाहिए। और एक माँ को भी, बच्चे के जन्म और उसके बाद ठीक होने की प्रक्रिया से, अपने पति के सहारे के बिना नहीं गुजरना चाहिए।"
बच्चे की देखभाल एक साझा जिम्मेदारी
चड्ढा ने कहा कि बच्चे के जन्म के ठीक बाद, महिला को अपने पति की मौजूदगी की सबसे ज़्यादा जरूरत होती है। अपनी पत्नी के प्रति पति की देखभाल की ज़िम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने लिखा, “मैंने संसद में यह मुद्दा इसलिए उठाया, क्योंकि बच्चे की देखभाल एक साझा जिम्मेदारी है। हमारे कानूनों में भी यह बात झलकनी चाहिए।”
लेखक के बारे में
Pramod Praveenप्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।
अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।


