आपदा में भी अवसर! सोनारपुर हमला अभिषेक बनर्जी के लिए कैसे साबित हो सकता है गेम चेंचर? समझें

Pramod Praveen भाषा, कोलकाता
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अभिषेक बनर्जी का सियासी सफर काफी अलग रहा है। शायद बदलते हालात का एकमात्र संकेत मई 2023 में झाड़ग्राम जिले में कुडमी आंदोलन के दौरान सामने आया, जब प्रदर्शनकारियों ने उनके काफिले को रोक दिया था लेकिन तब वह इसे समझ नहीं पाए।

आपदा में भी अवसर! सोनारपुर हमला अभिषेक बनर्जी के लिए कैसे साबित हो सकता है गेम चेंचर? समझें

पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों सियासी भूचाल आया हुआ है। विपक्षी तृणमूल कांग्रेस (TMC) का ग्राफ तेजी से गिरता जा रहा है। उसके दूसरे सबसे बड़े नेता और पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी पर पिछले दिनों पश्चिम बंगाल के दक्षिणी 24 परगना जिले के सोनारपुर में हुआ हमला इस बात की तस्दीक करता है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अभिषेक बनर्जी पर हुआ हमला उनके राजनीतिक करियर का निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है, जिससे यह तय होगा कि उन्हें सिर्फ एक राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी माना जाएगा या वह अपने दम पर जन नेता के रूप में उभरेंगे।

अपने अब तक के राजनीतिक करियर के दौरान, अभिषेक बनर्जी ने सत्तारूढ़ दल के नेता के तौर पर काम किया है, क्योंकि उनकी बुआ एवं TMC प्रमुख ममता बनर्जी, हाल तक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री थीं। अभिषेक को पार्टी में दूसरे सबसे बड़े नेता के रूप में देखा जाता है। उन्होंने इससे पहले कभी विपक्षी नेता की तरह जन विरोध का सामना नहीं किया था। पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के सोनारपुर कस्बे में शनिवार दोपहर को यह स्थिति बदल गई, जब लोगों ने डायमंड हार्बर सांसद पर पथराव किया और अंडे फेंके।

विश्लेषकों का कहना है कि ममता बनर्जी के विपरीत, जिनकी राजनीतिक पहचान विपक्ष की राजनीति की कसौटी पर गढ़ी गई थी, अभिषेक बनर्जी ने काफी हद तक सत्ताधारी पार्टी के ''सुरक्षात्मक आवरण'' के भीतर काम किया है। उन्होंने कहा कि चाहे कांग्रेस में अपने कार्यकाल के दौरान या बाद में वाम-विरोधी आंदोलन के चेहरे के रूप में, ममता ने राजनीतिक हमलों को सहकर और उन्हें जन सहानुभूति में परिवर्तित कर अपनी छवि बनाई। सड़कों पर वर्षों के संघर्ष के माध्यम से वह लोकप्रिय नेता के रूप में उभरीं।

विश्लेषकों के मुताबिक, अभिषेक बनर्जी की राजनीतिक यात्रा काफी अलग रही है। शायद बदलते हालात का एकमात्र संकेत मई 2023 में झाड़ग्राम जिले में कुडमी आंदोलन के दौरान सामने आया, जब प्रदर्शनकारियों ने उनके काफिले को रोक दिया और उन्हें उस आक्रोश का सामना करना पड़ा जिसे संगठनात्मक ताकत या प्रशासनिक अधिकार से नियंत्रित नहीं किया जा सकता था। नेता द्वारा उस आक्रोश को नजरअंदाज करने का परिणाम तब दिखा जब 2026 के विधानसभा चुनावों में कुडमी बहुल जिले में टीएमसी को चारों सीटों पर करारी हार का सामना करना पड़ा।

सोनारपुर की घटना को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह अनुभव परिवर्तनकारी साबित हो सकता है और आपदा में अवसर के समान हो सकता है। टीएमसी के पूर्व सांसद जवाहर सरकार ने कहा, ''अभिषेक बनर्जी के लिए यह वास्तविकता और कठिनाइयों का पहला अनुभव है, जिनसे ममता बनर्जी 1980 से जूझ रही हैं।'' राज्यसभा के पूर्व सदस्य ने कहा, ''अब अभिषेक बनर्जी ने जनता के आक्रोश का सामना किया है, चाहे वह स्वतःस्फूर्त हो या पूर्वनियोजित। यह उनकी अग्नि परीक्षा है, चाहे यह कितनी भी छोटी घटना क्यों न हो। देखते हैं कि वह इस संबंध में कैसे आगे बढ़ते हैं।'' अभिषेक पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि उनकी सत्ता मुख्य रूप से विरासत से प्राप्त हुई है, न कि संघर्ष से। सोनारपुर जैसी घटनाएं उन्हें इस धारणा को चुनौती देने का अवसर प्रदान करती हैं।

राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर मैदुल इस्लाम ने कहा, ''अगर वह लचीलापन प्रदर्शित कर सकते हैं, विरोधी निर्वाचन क्षेत्रों के साथ जुड़ाव जारी रख सकते हैं और राजनीतिक जोखिमों को उठाने की तत्परता दिखा सकते हैं, तो वह ऐसा गुण हासिल कर सकते हैं जो विरासत में नहीं मिल सकता और वह है आम जनमानस में जगह बनाना।''उन्होंने कहा कि अभिषेक बनर्जी के लिए खतरा यह है कि यह घटना एक व्यापक राजनीतिक परिवर्तन की शुरुआत के बजाय एक सामान्य घटना बनकर रह जाए। इस्लाम ने कहा, ''हमले का शिकार होने वाले नेता और हमले के बाद और भी मजबूत होकर उभरने वाले नेता के बीच का अंतर इस बात में निहित है कि वे बाद में किस तरह प्रभावी ढंग से विमर्श को आकार देते हैं।''

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Pramod Praveen

लेखक के बारे में

Pramod Praveen

प्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।

अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।

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