
मेरे एक कलीग फैसला सुनाना छोड़कर सारे काम करते थे, CJI बीआर गवई ने किस जज को किया याद
सभी जज अचानक आपस में बात करने लगे, तभी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा ,'काश मैंने लिप रीडिंग की क्लास ली होती। जब हम दलीलें दे रहे होते हैं और जज आपस में बात करते हैं, तो हम अनुमान लगाते रह जाते हैं।'
राष्ट्रपति संदर्भ पर 10 दिन तक दलीलें सुनने के बाद गुरुवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। दरअसल, राष्ट्रपति संदर्भ में पूछा गया था कि क्या एक संवैधानिक अदालत राज्य विधानसभाओं से पारित विधेयकों को मंजूरी देने के लिए राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए समयसीमा निर्धारित कर सकती है। इसके बाद जब 5 न्यायाधीशों की बेंच और वकीलों ने कुछ ब्रेक लिया, जिस दौरान CJI बीआर गवई ने अपने पुराने सहकर्मी को याद किया, जो फैसला सुनाने के अलावा सारे काम करते थे।

बेंच में सीजेआई गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रमनाथ, जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस ए एस चंदुरकर थे। सभी जज अचानक आपस में बात करने लगे, तभी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा ,'काश मैंने लिप रीडिंग की क्लास ली होती। जब हम दलीलें दे रहे होते हैं और जज आपस में बात करते हैं, तो हम अनुमान लगाते रह जाते हैं।'
इसपर सीजेआई ने जवाब दिया, 'हम उस बारे में बात नहीं कर रहे थे, जिसपर बीते 3 हफ्तों से सुनवाई हो रही है। यह हमारे बम्बई हाईकोर्ट के जज की तरह नहीं है, जो लंबी बहसों के दौरान ड्रॉइंग करते थे, लकड़ी में कलाकारी करते थे और फैसला सुनाना छोड़कर ना जाने क्या क्या करते थे।' इस दौरान सीजेआई ने वकीलों के पढ़ने की रफ्तार पर भी हैरानी जताई और कहा कि वह इसकी बराबरी नहीं कर सके हैं।
उन्होंने कहा, 'मैं साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट में जज बना था। 6 साल बाद भी मैं दिल्ली के वकीलों के साथ गति नहीं मिला पाता, जो पहला वाक्य पढ़ते हैं और फिर किसी और वाक्य पर जाने से पहले 10वां वाक्य पढ़ते हैं।' उन्होंने कहा, 'जस्टिस नरसिम्हा को छोड़कर बेंच में हम बाकी चार को सुप्रीम कोर्ट के वकीलों से रफ्तार मिलाना बड़ा मुश्किल होता है।'
उन्होंने कहा, 'कभी-कभी हम खो जाते हैं। हम दाखिल किए हुए पूरे दस्तावेज पढ़ते हैं, जिनमें 5000 से ज्यादा पन्ने होते हैं।' इस पर जस्टिस नरसिम्हा ने कहा, 'यह अगली पीढ़ी के वकीलों के लिए एक संदेश है, जिन्हें रीडिंग छोड़ने की आदत नहीं डालनी चाहिए।'
फैसला सुरक्षित
मई में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए शीर्ष अदालत से यह जानना चाहा था कि क्या राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर विचार करते समय राष्ट्रपति द्वारा विवेकाधिकार का प्रयोग करने के लिए न्यायिक आदेशों द्वारा समयसीमा निर्धारित की जा सकती है। राष्ट्रपति का यह संदर्भ तमिलनाडु सरकार द्वारा पारित विधेयकों से निपटने में राज्यपाल की शक्तियों पर उच्चतम न्यायालय के आठ अप्रैल के फैसले के बाद आया था।



