कभी थे सरकार समर्थक, आज उसी के खिलाफ अनशन; सोनम वांगचुक ने क्यों बदल ली राह
राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले हो रहे प्रदर्शन में जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर हैं। ये विरोध प्रदर्शन परिक्षाओं में कथित अनियमितता के विरोध में हो रहे हैं।

'प्रधानमंत्री आपका धन्यवाद, लद्दाख का पुराना सपना पूरा करने के लिए लद्दाख आपका धन्यवाद करता है। ठीक 30 साल पहले अगस्त 1989 में लद्दखी नेताओं ने यूटी के दर्जे के लिए आंदोलन की शुरुआत की थी। इस लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण में मदद करने के लिए सभी का धन्यवाद।'
जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने 5 अगस्त, 2019 को यह पोस्ट सोशल मीडिया पर किया था। तब भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 खत्म किया था और 2 केंद्र शासित प्रदेशों के रूप में जम्मू और कश्मीर का पुनर्गठन किया था। इसके बाद उन्होंने लद्दाख में 5 जिले बनाने के घोषणा के बाद भी सरकार का धन्यवाद किया था।
वही वांगचुक दिल्ली के जंतर मंतर में भूख हड़ताल पर बीते 17 दिनों से बैठे हुए हैं। शुरुआत में उन्होंने कहा था कि शिक्षा का उद्देश्य 'बच्चों का जीवन संवारना और राष्ट्र को सही दिशा देना होना चाहिए। सरकार ने संवेदनशीलता दिखाई होती, तो हमें यह सब नहीं झेलना पड़ता और न ही इतनी भीषण गर्मी में यहां बैठना पड़ता।'
लद्दाख में संवैधानिक सुरक्षा उपाय, राज्य का दर्जा और केंद्र शासित प्रदेश के लिए अधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग को लेकर लंबे समय से आंदोलन के बीच वांगचुक का यह नया अनशन शुरू हुआ है। केंद्र शासित प्रदेश की नागरिक संस्थाओं द्वारा लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत लाने की मांग प्रमुख मुद्दों में से एक रही है। चर्चाएं हैं कि आखिर सरकार का समर्थन करने वाले वांगचुक ने राह क्यों बदल ली।
लद्दाख में प्रदर्शन और मांगें
साल 2025 में वांगचुक ने लद्दाख की स्वायत्तता की मांग के साथ 21 दिनों के लिए भूख हड़ताल की थी। तब हजारों लोग उनके साथ जुड़े और आंदोलन मीडिया की सुर्खियां बन गया था। 2024 में ही वह भाजपा के चुनावी घोषणापत्र का जिक्र करते हुए भी देखे गए, जिसमें जिसमें लद्दाख को छठी अनुसूची का दर्जा देने का वादा किया गया था।
उस अनशन के 15वें दिन ही कुछ प्रदर्शनकारियों ने लेह में भाजपा ऑफिस में आग लगा दी थी। इसके बाद सुरक्षाबलों ने जवाबी कार्रवाई की थी। वहीं, प्रशासन ने कार्रवाई कर 80 लोगों को गिरफ्तार किया था। वहीं, वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था।
भाजपा से क्या नाराजगी
इंडिया टुडे से साल 2025 में बातचीत के दौरान वांगचुक ने भाजपा कार्यालयों पर हुए हमलों के मुद्दे पर बात की थी। उन्होंने कहा था, '2020 में उन्होंने अपने घोषणापत्र में पहले पॉइंट के तौर पर कहा था कि लद्दाख को छठी अनुसूची के तहत लाया जाएगा। उन्होंने पूरी तरह से यूटर्न ले लिया है।'
सरकार ने लगाए वांगचुक पर आरोप
25 सितंबर 2025 को सरकार ने वांगचुक को हिंसक प्रदर्शनों का जिम्मेदार बताया था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, तब सरकार ने कहा था कि अरब स्प्रिंग्स और नेपाल के जेन जेड प्रदर्शनों के बारे में बात करने के बाद भीड़ भड़की थी। केंद्र ने कहा था कि जलवायु कार्यकर्ता के भड़काऊ भाषणों ने भीड़ को उकसाया था, जिसने भाजपा और सरकारी दफ्तरों पर हमले किए।
केंद्र सरकार ने 24 सितंबर 2025 को कहा था, 'सोनम वांगचुक द्वारा 10-09-2025 को छठी अनुसूची और लद्दाख को राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर भूख हड़ताल शुरू की गई थी। यह सर्वविदित है कि भारत सरकार इन्हीं मुद्दों पर Apex Body Leh और Kargil Democratic Alliance के साथ सक्रिय रूप से बातचीत कर रही है। उच्चाधिकार प्राप्त समिति और उप-समितियों के औपचारिक माध्यम से और नेताओं के साथ कई अनौपचारिक बैठकों के माध्यम से उनके साथ कई बैठकें हुईं।'
आगे कहा गया, 'जिन मांगों को लेकर श्री वांगचुक भूख हड़ताल पर थे, वे एचपीसी में चर्चा का अभिन्न अंग हैं। कई नेताओं द्वारा भूख हड़ताल समाप्त करने का आग्रह करने के बावजूद, उन्होंने भूख हड़ताल जारी रखी और अरब स्प्रिंग शैली के विरोध प्रदर्शनों और नेपाल में Gen Z के विरोध प्रदर्शनों का भड़काऊ उल्लेख करके लोगों को गुमराह किया।'
सरकार ने कहा था, 'यह स्पष्ट है कि श्री सोनम वांगचुक ने अपने भड़काऊ बयानों के माध्यम से भीड़ को उकसाया था। संयोगवश, इस हिंसक घटनाक्रम के बीच, उन्होंने अपना उपवास तोड़ दिया और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कोई गंभीर प्रयास किए बिना एम्बुलेंस से अपने गांव चले गए।'
हिरासत और फिर रिहा
मार्च 2026 में 6 महीनों के बाद वांगचुक को रिहा किया गया था। उन्होंने 26 सितंबर 2025 को हिरासत में लिया गया था। उनकी पत्नी की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में रासुका को चुनौती देते हुए याचिका भी दाखिल की गईं थीं।
अब क्या हैं मांगें
28 जून को वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठ गए थे। पीटीआई भाषा के अनुसार, अपने इस विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के फैसले का कारण बताते हुए वांगचुक ने कहा कि पिछले 40 वर्षों से शिक्षा उनके दिल के बेहद करीब रही है और जब युवा शिक्षा व्यवस्था को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त कर रहे हों, तब वह चुप नहीं रह सकते।
उन्होंने कहा, 'मुझे मजबूरी में यहां बैठना पड़ा है, मैं यह सब खुशी-खुशी नहीं कर रहा हूं। मैं इन दोनों मुद्दों के समर्थन में अनशन पर बैठा हूं। बहुत से लोग मुझसे पूछते हैं कि आप लद्दाख में आंदोलन कर रहे थे, तो अब आप सीजेपी के साथ क्यों हैं? यहां जो मुद्दा शिक्षा का है, वह पिछले 40 वर्षों से मेरे दिल के बेहद करीब रहा है, जब से मैं एक छात्र था।'
लद्दाख का जिक्र
इसके अगले दिन उन्होंने कहा था कि उन्हें उम्मीद थी कि उन्हें दोबारा आंदोलन का रास्ता नहीं अपनाना पड़ेगा, लेकिन लद्दाख के लोगों से किए गए वादे पूरे न होने और केंद्र सरकार के साथ बातचीत रुक जाने के कारण उनके पास कोई और विकल्प नहीं बचा था।
वांगचुक ने कहा था, 'मुझे लगा था कि मुझे अनशन पर नहीं बैठना पड़ेगा। मुझे दुख है कि मुझे फिर से अनशन पर बैठना पड़ रहा है। मैं खुशी से ऐसा नहीं कर रहा हूं; यह आसान भी नहीं है। हो सकता है कि मेरी मौत भी हो जाए, लेकिन अगर मैं मर भी जाऊं, तो भी मैं पीछे नहीं हटूंगा।' सीजेपी के बैनर तले हो रहे इस प्रदर्शन में मुख्य रूप से शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की जा रही है।
लेखक के बारे में
Nisarg Dixitनिसर्ग दीक्षित न्यूजरूम में करीब एक दशक का अनुभव लिए निसर्ग दीक्षित शोर से ज़्यादा सार पर भरोसा करते हैं। पिछले 4 साल से वह लाइव हिनुस्तान में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं, जहां खबरों की योजना, लेखन, सत्यापन और प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं। इससे पहले दैनिक भास्कर और न्यूज़18 जैसे बड़े मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क तक की भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की, जिसने उनके काम करने के तरीके को व्यावहारिक और तथ्य आधारित बनाया। निसर्ग की खास रुचि खोजी रिपोर्टिंग, ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ स्टोरीज़ में है। वे जटिल मुद्दों को सरल भाषा और स्पष्ट तथ्यों के साथ प्रस्तुत करने में विश्वास रखते हैं। राजनीति और जांच पड़ताल से जुड़े विषयों पर उनकी मजबूत पकड़ है। निसर्ग लोकसभा चुनावों, कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और अहम घटनाओं को कवर कर चुके हैं। साथ ही संसदीय कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों को नियमित रूप से कवर करते हैं। गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी निसर्ग योगदान देते हैं।
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