SC-ST सदस्य का हर अपमान अत्याचार नहीं होता, हाईकोर्ट का बहुत बड़ा फैसला

Feb 13, 2026 07:38 am ISTNisarg Dixit लाइव हिन्दुस्तान
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जस्टिस चैताली चटर्जी दास याचिका पर सुनवाई कर रहीं थीं। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि आरोपों को अगर पूरी तरह सच भी मान लिया जाए, तो भी वे 1989 अधिनियम (SC/ST एक्ट) के तहत अपराध की आवश्यक शर्तों को पूरा नहीं करते हैं।

SC-ST सदस्य का हर अपमान अत्याचार नहीं होता, हाईकोर्ट का बहुत बड़ा फैसला

SC/ST Act की धारा 3(1)(r) के तहत अनुसूचित जाति के सदस्य के हर अपमान को अत्याचार नहीं माना जा सकता। कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा है कि जब तक सार्वजनिक रूप से धमकी या अपमान नहीं किया गया हो, तब तक मतभेद, प्रशासनिक विवाद या कार्यस्थल पर कथित तौर पर अपमान इस एक्ट के तहत अपराध नहीं हो जाता है।

क्या था मामला

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में याचिकाकर्ता संस्कृत में बीए, एमए और पीएचडी कर चुकी हैं। वह संस्कृत कॉलेज एंड यूनिवर्सिटी में विभाग प्रमुख हैं। वहीं, शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति से हैं और असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। असिस्टेंट प्रोफेसर ने याचिकाकर्ता पर जलन रखने और परेशान करने के आरोप लगाए थे।

उनका आरोप थे कि विभाग प्रमुख उन्हें विभाग के फैसलों में शामिल नहीं करतीं, क्लासेज रोक दीं, एग्जाम ड्यूटी नहीं करने दी और ऑनलाइन मीटिंग के दौरान अपमान किया। उन्होंने दावा किया है ये सब उनकी जाति पहचान को देखते हुए किया गया था, जिसके चलते उन्हें काफी मानसिक पीड़ा हुई है।

जस्टिस चैताली चटर्जी दास याचिका पर सुनवाई कर रहीं थीं। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि आरोपों को अगर पूरी तरह सच भी मान लिया जाए, तो भी वे 1989 अधिनियम (SC/ST एक्ट) के तहत अपराध की आवश्यक शर्तों को पूरा नहीं करते हैं।

जांच में क्या पता चला

जांच के बाद SC/ST Act की धारा 3(1)(r) के तहत चार्जशीट दाखिल की गई और समन जारी किए गए। इसके बाद याचिकाकर्ता ने कोर्ट का रुख किया। शिकायत और केस डायरी की जांच करने के बाद अदालत ने पाया कि आरोप मुख्य रूप से विभाग के भीतर प्रशासनिक और पेशेवर शिकायतों से संबंधित थे। कोर्ट ने नोट किया कि वर्णित किसी भी घटना में सार्वजनिक दृष्टि से किसी भी स्थान पर जाति-आधारित गाली-गलौज या अपमान शामिल नहीं था, जो कि इस अपराध के लिए एक अनिवार्य शर्त है। अदालत ने आगे कहा कि ऐसा कोई विशेष दावा नहीं किया गया था कि याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता को उसकी जाति के आधार पर जानबूझकर अपमानित किया या डराया-धमकाया था।

सुप्रीम कोर्ट के 'गोरीगे पेंटैया', 'हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य' और 'स्वर्ण सिंह बनाम राज्य' जैसे फैसलों का हवाला देते हुए बेंच ने दोहराया कि धारा 3(1)(r) के तहत अपराध होने के लिए ये शर्तें जरूरी हैं। आरोपी SC/ST समुदाय का सदस्य नहीं होना चाहिए, अपमान या डराने-धमकाने का इरादा जानबूझकर किया गया हो, अपमान करने का उद्देश्य जाति पर आधारित हो, घटना पब्लिक व्यू में हुई हो।

अदालत ने क्या कहा

अदालत ने पाया कि शिकायत में ऐसी कोई सामग्री नहीं थी, जिससे साफ हो सके कि जाति के कारण उन्हें निशाना बनाया गया था। साथ ही यह विवाद पेशेवर मतभेदों से जुड़ा हुआ था। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन को जारी रखना कानून का दुरुपयोग होगा। हाईकोर्ट ने चार्जशीट को रद्द कर दिया।

Nisarg Dixit

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Nisarg Dixit

निसर्ग दीक्षित न्यूजरूम में करीब एक दशक का अनुभव लिए निसर्ग दीक्षित शोर से ज़्यादा सार पर भरोसा करते हैं। पिछले 4 साल से वह लाइव हिनुस्तान में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं, जहां खबरों की योजना, लेखन, सत्यापन और प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं। इससे पहले दैनिक भास्कर और न्यूज़18 जैसे बड़े मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क तक की भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की, जिसने उनके काम करने के तरीके को व्यावहारिक और तथ्य आधारित बनाया। निसर्ग की खास रुचि खोजी रिपोर्टिंग, ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ स्टोरीज़ में है। वे जटिल मुद्दों को सरल भाषा और स्पष्ट तथ्यों के साथ प्रस्तुत करने में विश्वास रखते हैं। राजनीति और जांच पड़ताल से जुड़े विषयों पर उनकी मजबूत पकड़ है। निसर्ग लोकसभा चुनावों, कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और अहम घटनाओं को कवर कर चुके हैं। साथ ही संसदीय कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों को नियमित रूप से कवर करते हैं। गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी निसर्ग योगदान देते हैं।

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