स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की जरूरत नहीं, LPG की किल्लत भी होगी दूर; भारत ने बनाया 4000 करोड़ का प्लान
Strait of Hormuz: वर्तमान में खपत 190-195 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर है, जिसके 2030 तक बढ़कर 290-300 होने का अनुमान है। साल 2025 में भारत के LNG आयात का लगभग दो-तिहाई हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुजरा।
Strait of Hormuz: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में आए व्यवधानों के बीच भारत सरकार ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए एक महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम तेज कर दिया है। भारत अब खाड़ी देशों से गैस की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए समुद्र के नीचे से एक सीधी पाइपलाइन बिछाने की तैयारी में है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, ओमान से भारत तक प्रस्तावित इस मिडल ईस्ट-इंडिया डीप-वाटर पाइपलाइन (MEIDP) की अनुमानित लागत लगभग 40,000 करोड़ रुपये है। यदि इसे हरी झंडी मिल जाती है, तो इसके निर्माण में पांच से सात साल का समय लग सकता है। यह पाइपलाइन अरब सागर के नीचे 2,000 किलोमीटर लंबी होगी, जो ओमान को सीधे गुजरात तट से जोड़ेगी।
यह पाइपलाइन समुद्र में 3,450 मीटर की गहराई तक जा सकती है, जो इसे वैश्विक स्तर पर अब तक की सबसे गहरी समुद्री पाइपलाइनों में से एक बना देगी। इसके जरिए प्रतिदिन लगभग 31 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर प्राकृतिक गैस की आपूर्ति की जा सकेगी।
क्यों पड़ी इस पाइपलाइन की जरूरत?
भारत की प्राकृतिक गैस की मांग लगातार बढ़ रही है। वर्तमान में खपत 190-195 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर है, जिसके 2030 तक बढ़कर 290-300 होने का अनुमान है। साल 2025 में भारत के LNG आयात का लगभग दो-तिहाई हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुजरा। फरवरी में ईरान और अमेरिका-इजरायल संघर्ष के कारण जब यह मार्ग बाधित हुआ, तो वैश्विक LNG आपूर्ति 20% गिर गई और कीमतें आसमान छूने लगीं। सामान्य समय में जो गैस 10-12 प्रति MMBtu मिलती थी, संकट के दौरान उसकी कीमत 24-25 तक पहुंच गई है।
एक अधिकारी ने कहा, "भारत को अब LNG स्पॉट मार्केट की निर्भरता से आगे बढ़ना होगा। एक समर्पित पाइपलाइन हमें किसी भी मध्यस्थ देश या समुद्री चोक पॉइंट जैसे कि होर्मुज पर निर्भर हुए बिना स्थिर और सस्ती गैस प्रदान करेगी।"
चीन से कैसा मुकाबला?
यह परियोजना भारत और उसके प्रतिस्पर्धी चीन के बीच ऊर्जा सुरक्षा के अंतर को भी दर्शाती है। चीन ने पिछले दो दशकों में रूस और मध्य एशिया से कई ओवरलैंड पाइपलाइन कॉरिडोर बनाए हैं, जिससे वह समुद्री संकटों से सुरक्षित रहता है। रूस की 'पावर ऑफ साइबेरिया' पाइपलाइन सालाना 38 BCM गैस देती है। इसके अलावा मध्य एशिया से चीन के पास तीन समानांतर पाइपलाइनें हैं। चीन की गैस भंडारण क्षमता 2026 तक 80 BCM पहुंचने की उम्मीद है, जबकि भारत के पास फिलहाल कोई रणनीतिक गैस रिजर्व नहीं है। भारत के पास मौजूदा क्षमता केवल 10-12 दिनों की खपत के बराबर है।
पेट्रोलियम मंत्रालय अब सार्वजनिक क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों GAIL, इंजीनियर्स इंडिया (EIL) और इंडियन ऑयल (IOC) को एक विस्तृत रिपोर्ट (DFR) तैयार करने का निर्देश देने वाला है।
SAGE की रिपोर्ट पर आधारित
यह योजना 'द साउथ एशिया गैस एंटरप्राइज' (SAGE) द्वारा प्रस्तुत एक प्री-फीसिबिलिटी अध्ययन पर आधारित है। SAGE ने पहले ही समुद्री तल की स्थिति का अध्ययन करने के लिए लगभग 25 करोड़ रुपये की लागत से मार्ग पर 3,000 मीटर की परीक्षण पाइपलाइन बिछाई है। नई तकनीक ने गहरे समुद्र में पाइप बिछाने और मरम्मत को अब संभव बना दिया है।
यह पाइपलाइन न केवल ओमान, बल्कि भविष्य में संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब, ईरान, तुर्कमेनिस्तान और कतर जैसे देशों से गैस प्राप्त करने का मार्ग भी प्रशस्त कर सकती है। इस क्षेत्र में लगभग 2,500 ट्रिलियन क्यूबिक फीट गैस भंडार मौजूद है।
लेखक के बारे में
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