नीतीश कुमार तो दिल्ली चले जाएंगे, पर पटना में कैसे जम पाएगी भाजपा; दो बड़े चैलेंज
कुर्मी समेत अति पिछड़ा समाज का वोट जेडीयू के पक्ष में लामबंद है तो वहीं मुसलमान, यादव और कुछ पिछड़ा समाज आरजेडी के साथ भी जाता रहा है। यहां बात इन दलों के बेस वोट की हो रही है। मजबूत या कमजोर दिखने पर अलग-अलग सीटों पर अन्य समाजों का वोट छिटकता या जुड़ता भी रहा है।
नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री पद से जल्दी ही विदा हो जाएंगे। उन्होंने राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया है। उच्च सदन में उनका कार्यकाल अप्रैल में शुरू होना है। तब तक वह पद पर रह सकते हैं, लेकिन फिर उनका विकल्प तलाशना ही होगा। नीतीश कुमार के पटना से एग्जिट को भाजपा के लिए राज्य में अवसर के तौर पर देखा जा रहा है। नीतीश कुमार 2005 से ही सत्ता की धुरी रहे हैं। छोटे से अंतराल के लिए जेडीयू से ही जीतनराम मांझी सीएम बने थे। उन्हें छोड़ दें तो करीब 20 साल नीतीश कुमार ही सत्ता में रहे। ऐसे में अब उनका दिल्ली जाना भाजपा के लिए अवसर तो है, लेकिन यह मौका चुनौतियों के साथ आया है।
पहली चुनौती यही है कि भाजपा की तमाम कोशिशों के बाद भी पिछड़े और दलितों का एक बड़ा वर्ग उसे अगड़ों की ही पार्टी मानता है। बिहार के हालात यूपी जैसे नहीं हैं, जहां बसपा कमजोर है और सपा के अलावा कोई अन्य दल बहुत मजबूत नहीं है। बिहार में लोजपा पासवानों के वोट ले रही है तो वहीं जीतनराम मांझी मुसहरों में स्थापित हैं। इसके अलावा कुर्मी समेत अति पिछड़ा समाज का वोट जेडीयू के पक्ष में लामबंद है तो वहीं मुसलमान, यादव और कुछ पिछड़ा समाज आरजेडी के साथ भी जाता रहा है। यहां बात इन दलों के बेस वोट की हो रही है। मजबूत या कमजोर दिखने पर अलग-अलग सीटों पर अन्य समाजों का वोट छिटकता या जुड़ता भी रहा है।
भाजपा को इस चुनौती से निपटना होगा। उसने सम्राट चौधरी जैसे नेता का कद बढ़ाया है, लेकिन फिर भी बड़ा वर्ग उससे अलग है। ऐसी स्थिति में किसी और ओबीसी नेता को तवज्जो देकर कुछ आधार मजबूत हो सकता है या नहीं, इस पर भी विचार करना होगा। यादव और मुसलमान मतदाता के अलावा कुछ पिछड़ा वोटर तेजस्वी के साथ भी ताकत से जुड़ा दिखता है। इसके अलावा नीतीश कुमार की गैर-मौजूदगी और भाजपा की बढ़ती ताकत को वह कैसे देखता है, यह भी अहम होगा। क्या वह नीतीश के कमजोर दिखने के बाद भी एनडीए को वोट देगा? यह अहम सवाल रहेगा, जिसका जवाब तलाशना भाजपा के लिए जरूरी है।
करिश्माई नेता की खलेगी कमी, नीतीश के बाद कौन?
अब दूसरी चुनौती की बात करें तो वह करिश्माई व्यक्तित्व की है। राज्य में नीतीश कुमार एक चुंबकीय प्रभाव वाले नेता रहे हैं। उनका जलवा ऐसा रहा है कि 20 साल के कार्यकाल के बाद भी आरजेडी की ओर से उन्हें थैंक्यू के अलावा कुछ नहीं कहा गया। ऐसे किसी नेता को तैयार करना रातोंरात का काम नहीं है, लेकिन किसी ऐसे शख्स को कमान देने पर विचार करना होगा, जो सर्वस्वीकार्य हो। भाजपा के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती है। नए सीएम को लेकर कयासों का दौर जारी है, लेकिन अब तक किसी नेता के नाम को तय नहीं माना जा सकता। फिर भी बिहार का सीएम कौन होगा? फिलहाल यह सबसे दिलचस्प सवाल बना हुआ है।
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