बंगाल विधानसभा में पहली बार... CM शुभेंदु अधिकारी ने ऐसा क्या किया ऐलान? TMC MLA भी हो गए मुरीद
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सोमवार को असेंबली में एक बड़े फैसले का ऐलान किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि असेंबली के रेफरेंस फेज के दौरान असेंबली के सदस्य जो कुछ भी कहें, वह सात दिनों के अंदर ऑफिस पहुंच जाना चाहिए।

पश्चिम बंगाल विधानसभा के इतिहास में सोमवार (20 जुलाई) का दिन एक बड़े बदलाव का गवाह बना। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने विधायकों के अधिकारों और जनता की समस्याओं के समाधान को लेकर एक ऐसी घोषणा की, जिसने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को हैरान कर दिया है। मुख्यमंत्री के इस कदम की सराहना करते हुए वरिष्ठ विपक्षी नेता फिरहाद हकीम ने इसे 'लोकतंत्र की जीत' और 'विधायकों का सम्मान' करार दिया है।
दरअसल, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सदन में घोषणा की कि अब से विधानसभा के रेफरेंस फेज (Mention Hour) के दौरान विधायक जो भी मुद्दे उठाएंगे, उन्हें 7 दिनों के भीतर संबंधित विभागों तक पहुँचाना अनिवार्य होगा। उन्होंने सख्त निर्देश दिए हैं कि मंत्रियों को इन मुद्दों पर जवाब देना ही होगा और अगर कोई काम संभव है, तो उसे करना होगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि अगर कोई काम संभव नहीं है या उसके लिए समय चाहिए, तो उसकी भी स्पष्ट जानकारी सदन में मंत्री को देनी होगी। इतना ही नहीं, मुख्यमंत्री ने पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कहा कि इन मांगों की सूची सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) भेजी जाएगी और वह खुद हर 3 महीने में इस पर हुई कार्रवाई की रिपोर्ट सदन को देंगे।
फिरहाद हकीम ने की जमकर तारीफ
विपक्षी नेता तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक और कोलकाता के पूर्व मेयर फिरहाद हकीम ने मुख्यमंत्री के इस फैसले पर उनकी जमकर प्रशंसा की। फिरहाद हकीम ने कहा, "आज मुख्यमंत्री अधिकारी ने एक नया उदाहरण पेश किया है। विधानसभा के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। उन्होंने विधायकों को जो सम्मान दिया है, वह अद्भुत है।" फिरहाद ने कहा कि वह लंबे समय से विधायक रहे हैं, लेकिन लोकतंत्र के प्रति ऐसा नजरिया उन्होंने पहले कभी नहीं देखा।
21 जुलाई की रिपोर्ट होगी सार्वजनिक
प्रशासनिक सुधारों के साथ-साथ मुख्यमंत्री ने एक और बड़ा ऐलान किया। उन्होंने बताया कि पिछली सरकार द्वारा गठित 21 जुलाई समिति (जस्टिस सुशांत चटर्जी कमीशन) की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि 1993 में युवा कांग्रेस की रैली पर पुलिस की गोलीबारी में 13 लोगों की मौत की जांच के लिए गठित जस्टिस (सेवानिवृत्त) सुशांत चटर्जी आयोग की रिपोर्ट सोमवार को सार्वजनिक की जाएगी। विधानसभा की कार्यवाही शुरू होने पर यह घोषणा करते हुए अधिकारी ने अध्यक्ष से आयोग की रिपोर्ट सदन में पेश करने की अनुमति मांगी।
रिपोर्ट क्यों अहम?
राजनीतिक मायने राजनीतिक गलियारों में शुभेंदु अधिकारी के इस रुख को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह रिपोर्ट 21 जुलाई को आयोजित होने वाले 'शहीद दिवस' कार्यक्रमों से एक दिन पहले सार्वजनिक की जा रही है। मंगलवार को तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के दो प्रतिद्वंद्वी गुट अलग-अलग 'शहीद दिवस' रैलियां आयोजित करेंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि वह यह भी बताएंगे कि आयोग की किन सिफारिशों को पिछली टीएमसी सरकार के 15 वर्ष के कार्यकाल में लागू किया गया और किन पर अमल नहीं हुआ। विपक्षी सदस्यों की ओर मुखातिब होते हुए उन्होंने कहा, ''आप कल 21 जुलाई को 'शहीद दिवस' मनाएंगे, लेकिन आपकी सरकार ने उस आयोग की रिपोर्ट कभी सार्वजनिक नहीं की, जिसका गठन उसी ने किया था।''
ममता ने 2011 में बनाया था आयोग
एक सदस्यीय इस आयोग का गठन वर्ष 2011 में ममता बनर्जी सरकार ने किया था। आयोग को 21 जुलाई, 1993 को तत्कालीन राज्य सचिवालय 'राइटर्स बिल्डिंग' की ओर मार्च कर रहे युवा कांग्रेस समर्थकों पर पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी की घटना की जांच का जिम्मा सौंपा गया था। इस घटना में 13 लोगों की मौत हो गई थी। उस समय ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल युवा कांग्रेस की अध्यक्ष थीं। उन्होंने 1998 में कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था। आयोग ने 300 से अधिक गवाहों के बयान दर्ज करने के बाद वर्ष 2024 में अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी थी। सरकारी सूत्रों के अनुसार, आयोग ने तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार के दौरान सेवा में रहे कई भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की है।


