Supreme Court of India: न हिंदुओं को और न मुस्लिमों को रास आया SC का फॉर्मूला, अब ज्ञानवापी मामले में क्या होगा
Supreme Court of India: सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से आए इन तीनों मामलों को मध्यस्थता से सुलझाने का प्रस्ताव दिया था। हालांकि, अब खबर है कि हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पक्षों ने कानूनी लड़ाई जारी रखने का फैसला किया है।

ज्ञानवापी मस्जिद, श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह और संभल मस्जिद के मामले में हिंदू और मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। शीर्ष न्यायालय ने तीनों मामलों में मध्यस्थता का प्रस्ताव दिया था। दोनों पक्षों की ओर से कहा गया है कि इनपर अदालत में ही कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी। दरअसल, शीर्ष न्यायालय ने इन मामलों में मध्यस्थता के लिए पार्टियों की सहमति मांगी थी।
विवाद और दावे
वाराणसी में एक-दूसरे से सटे दो धार्मिक स्थलों को लेकर जारी विवाद, अयोध्या और मथुरा के साथ-साथ तीन सबसे चर्चित मामलों में से एक है। हिंदू पक्ष का दावा है कि मूल काशी विश्वनाथ मंदिर को औरंगजेब के शासनकाल के दौरान ध्वस्त कर दिया गया था और उसके ऊपर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण किया गया था। मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह विवाद उपासना स्थल अधिनियम के तहत वर्जित है, क्योंकि वे सदियों से लगातार मस्जिद में नमाज अदा करते आ रहे हैं।
वर्ष 2021 में पांच महिलाओं ने वाराणसी की एक अदालत में प्रार्थना करने की अनुमति मांगने के लिए मुकदमा दायर किया। बाद में किए गए सर्वेक्षण में वज़ूखाने के अंदर एक 'शिवलिंग' मिला, जिसे मुस्लिम पक्ष एक फव्वारे की व्यवस्था का हिस्सा बताता है।
वर्ष 2022 में शीर्ष अदालत ने उस स्थान को संरक्षित किया जहां 'शिवलिंग' मिला था और साथ ही यह निर्देश भी दिया कि मुस्लिम उपासकों को मस्जिद तक पहुंचने में कोई बाधा नहीं डाली जानी चाहिए।
इसने 2024 में वाराणसी अदालत के उस आदेश पर रोक लगाने से भी इनकार कर दिया था जिसमें मस्जिद के अंदर 'व्यास जी का तहखाना' में एक हिंदू पुजारी को दैनिक रूप से पूजा-अर्चना करने की अनुमति दी गई थी।
श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह
यह मामला मथुरा में स्थित 13.37 एकड़ के परिसर से संबंधित है, जिसमें भगवान कृष्ण का जन्मस्थान माना जाने वाला कृष्ण जन्मभूमि मंदिर परिसर और शाही ईदगाह मस्जिद शामिल हैं।
जहां एक ओर हिंदू समुदाय का दावा है कि शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण मुगल सम्राट औरंगजेब के शासनकाल में 17वीं शताब्दी के दौरान देवता के जन्मस्थान पर स्थित एक पुराने मंदिर के ऊपर किया गया था, वहीं मुस्लिम पक्ष ने उपासना स्थल अधिनियम, 1991 का हवाला दिया है।
देवता के 'अगले मित्र' कहे जाने वाले हिंदू उपासकों और संगठनों द्वारा जमीन पर कब्जा पाने और मंदिर को बहाल करने के लिए दायर किए गए 18 मुकदमे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंबित हैं।
उच्च न्यायालय ने 1 अगस्त, 2024 को मुस्लिम पक्ष की उन अर्जियों को खारिज कर दिया, जिनमें हिंदू उपासकों के मुकदमों की वैधता को चुनौती दी गई थी। इसी आदेश में अदालत ने यह भी कहा कि ये मुकदमे परिसीमा अधिनियम, वक्फ अधिनियम और उपासना स्थल अधिनियम, 1991 द्वारा वर्जित नहीं हैं।
शाही जामा मस्जिद, संभल, उत्तर प्रदेश
वर्ष 2024 में संभल जिला एक विवाद का केंद्र बन गया जब एक स्थानीय अदालत ने एक हिंदू श्रद्धालु द्वारा दायर मुकदमे पर शाही जामा मस्जिद का सर्वेक्षण करने का आदेश दिया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि यह एक प्राचीन हिंदू मंदिर के स्थल पर बनाई गई थी।
हिंदू पक्ष का दावा है कि शाही जामा मस्जिद का निर्माण मुगल सम्राट बाबर के शासनकाल के दौरान 1526 में भगवान विष्णु के अंतिम अवतार कल्कि को समर्पित हरिहर मंदिर को नष्ट करने के बाद किया गया था।
सर्वेक्षण के दूसरे दौर के दौरान, प्रदर्शनकारी स्थानीय लोगों की सुरक्षाकर्मियों के साथ झड़प हुई, जिसके परिणामस्वरूप चार लोगों की मौत हो गई और दर्जनों लोग घायल हो गए।
मुस्लिम पक्ष ने इस आधार पर सर्वेक्षण का विरोध किया कि इसे मस्जिद समिति की उचित सुनवाई किए बिना जल्दबाजी में कराया गया था। उसने उपासना स्थल अधिनियम के उल्लंघन का भी आरोप लगाया।
बाद में उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा सर्वेक्षण कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार किए जाने को चुनौती देने वाली विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई करते हुए विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया।
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Nisarg Dixitनिसर्ग दीक्षित न्यूजरूम में करीब एक दशक का अनुभव लिए निसर्ग दीक्षित शोर से ज़्यादा सार पर भरोसा करते हैं। पिछले 4 साल से वह लाइव हिनुस्तान में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं, जहां खबरों की योजना, लेखन, सत्यापन और प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं। इससे पहले दैनिक भास्कर और न्यूज़18 जैसे बड़े मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क तक की भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की, जिसने उनके काम करने के तरीके को व्यावहारिक और तथ्य आधारित बनाया। निसर्ग की खास रुचि खोजी रिपोर्टिंग, ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ स्टोरीज़ में है। वे जटिल मुद्दों को सरल भाषा और स्पष्ट तथ्यों के साथ प्रस्तुत करने में विश्वास रखते हैं। राजनीति और जांच पड़ताल से जुड़े विषयों पर उनकी मजबूत पकड़ है। निसर्ग लोकसभा चुनावों, कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और अहम घटनाओं को कवर कर चुके हैं। साथ ही संसदीय कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों को नियमित रूप से कवर करते हैं। गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी निसर्ग योगदान देते हैं।
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