न गांधी, न पेरियार... अन्नामलाई ने अब्दुल कलाम को ही क्यों चुना आइकॉन? जानें इनसाइड स्टोरी

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K Annamalai: अन्नामलाई के इस नए आंदोलन का नाम वी द लीडर (We The Leader) रखा गया है, जो उनके द्वारा कोयंबटूर में स्थापित किए जाने वाले एपीजे अब्दुल कलाम सेंटर फॉर एथिक्स एंड पॉलिटिक्स के तहत काम करेगा।

न गांधी, न पेरियार... अन्नामलाई ने अब्दुल कलाम को ही क्यों चुना आइकॉन? जानें इनसाइड स्टोरी

K Annamalai: तमिलनाडु की सियासत में उस समय बड़ा उलटफेर देखने को मिला जब भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व आईपीएस (IPS) अधिकारी के अन्नामलाई ने बीजेपी से अपना इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा मंजूर होने के तुरंत बाद उन्होंने एक नए राजनीतिक आंदोलन की घोषणा कर दी है। देश के राजनीतिक दलों में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अपना आइकॉन मानने की होड़ सी लगी रहती है। वहीं, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियां जय प्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया जैसे समाजवादी नेताओं को अपना आदर्श मानते हैं। अन्नामलाई ने पारंपरिक राजनीति से थोड़ा अलग हटकर मिसाइल मैन और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को अपना आइकॉन बनाया। उन्होंने कलाम साहब के विचारों पर आधारित कलाम स्कूल ऑफ आइडियोलॉजी के तहत अपने नए सफर की शुरुआत की है।

अन्नामलाई के इस नए आंदोलन का नाम वी द लीडर (We The Leader) रखा गया है, जो उनके द्वारा कोयंबटूर में स्थापित किए जाने वाले एपीजे अब्दुल कलाम सेंटर फॉर एथिक्स एंड पॉलिटिक्स के तहत काम करेगा। इस घोषणा के महज 10 घंटों के भीतर ही 10 लाख से अधिक लोग इस आंदोलन से जुड़ चुके हैं, जिसे राज्य की राजनीति में एक रिकॉर्ड माना जा रहा है।

कलाम कार्ड क्यों है मास्टरस्ट्रोक?

तमिलनाडु की राजनीति दशकों से पेरियार, सीएन अन्नादुराई, एम. करुणानिधि, एमजीआर और जयललिता जैसे पारंपरिक द्रविड़ नेताओं या उनकी पहचान आधारित राजनीति के इर्द-गिर्द घूमती रही है। ऐसे में अन्नामलाई द्वारा डॉ. कलाम को अपना वैचारिक प्रतीक चुनना एक बड़ा राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि डॉ. कलाम एक ऐसे अजातशत्रु नेता रहे हैं, जिन्हें द्रविड़ समर्थक, राष्ट्रवादी, अल्पसंख्यक, अगड़े-पिछड़े वर्ग और युवा वोटर समान रूप से सम्मान देते हैं। युवाओं में उनकी अलग ही पैठ है। रामेश्वरम के एक साधारण तमिल मुस्लिम परिवार में जन्मे कलाम ने कभी खुद को अल्पसंख्यक की तरह पेश नहीं किया, बल्कि शिक्षा और कड़ी मेहनत से देश के शीर्ष वैज्ञानिक और राष्ट्रपति बने।

क्या है कलाम स्कूल ऑफ आइडियोलॉजी?

अन्नामलाई के मुताबिक, उनका यह आंदोलन किसी खास जाति, धर्म या संप्रदाय को बढ़ावा देने के बजाय देश और राज्य के सामूहिक विकास पर केंद्रित होगा। अन्नामलाई का मानना है कि तमिल संस्कृति पर गर्व करना और देश के प्रति समर्पित रहना एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। यह आंदोलन राज्य में चल रही पारिवारिक राजनीति और नेता केंद्रित राजनीति का पुरजोर विरोध करेगा। डॉ. कलाम की तरह ही विज्ञान, तकनीक, शिक्षा और विकास आधारित गवर्नेंस को बढ़ावा दिया जाएगा। पारंपरिक वोट बैंक की राजनीति के बजाय सामाजिक सद्भाव और मनों के मिलन (Unity of Minds) पर जोर होगा।

2031 के विधानसभा चुनाव पर नजर

अन्नामलाई ने अपनी दीर्घकालिक योजना का खुलासा करते हुए कहा कि यह आंदोलन धीरे-धीरे एक राजनीतिक दल का रूप लेगा और साल 2031 का तमिलनाडु विधानसभा चुनाव लड़ेगा। अपने विजन को समझाते हुए उन्होंने कहा कि केवल एक मुख्यमंत्री, 234 विधायक या 39 सांसद मिलकर तमिलनाडु की मौजूदा व्यवस्था को नहीं बदल सकते। उन्होंने कहा, "अगर हमें पूरी व्यवस्था को बदलना है, तो हमें पंचायत स्तर से लेकर पार्षद, मेयर और शीर्ष पदों तक करीब 30,000 ईमानदार और नए लोगों को तैयार करना होगा। हमारी संस्था युवाओं को राजनीति में आने के लिए प्रशिक्षित करेगी।"

कैप्टन विजयकांत के साथ इंटर्नशिप ने बदला जीवन

अन्नामलाई ने अपने जीवन के एक पुराने अनुभव को साझा करते हुए बताया कि साल 2009 में जब वे आईआईएम (IIM) लखनऊ से एमबीए कर रहे थे, तब उन्होंने विशेष अनुमति लेकर डीएमडीके (DMDK) के संस्थापक और दिवंगत अभिनेता-राजनेता कैप्टन विजयकांत के साथ तीन महीने की इंटर्नशिप की थी। लोकसभा चुनाव के दौरान जमीनी स्तर पर काम करने के इसी अनुभव ने उनके भीतर सार्वजनिक सेवा और चुनावी राजनीति की समझ पैदा की, जिसे वे अब राज्य के युवाओं के साथ साझा करना चाहते हैं।

इस्तीफे में बयां किया राष्ट्रीय पार्टियों का दर्द

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन को भेजे अपने इस्तीफे में अन्नामलाई ने लिखा कि राष्ट्रीय दल कभी भी उस भाषा में बात नहीं कर पाए जिसे तमिलनाडु के आम लोग समझ सकें। उन्होंने इसी धारणा को बदलने की कोशिश की और कई अंदरूनी व बाहरी बाधाओं के बावजूद सफलता भी हासिल की। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे एक ऐसे राष्ट्रवादी हैं जो क्षेत्रीय आकांक्षाओं, तमिल भाषा और संस्कृति की समृद्ध विरासत पर बेहद गर्व करते हैं।

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Himanshu Jha

लेखक के बारे में

Himanshu Jha

बिहार के दरभंगा जिले से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु शेखर झा डिजिटल मीडिया जगत का एक जाना-माना नाम हैं। विज्ञान पृष्ठभूमि से होने के बावजूद (BCA और MCA), पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून के कारण उन्होंने IGNOU से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया और मीडिया को ही अपना कर्मक्षेत्र चुना।


एक दशक से भी अधिक समय का अनुभव रखने वाले हिमांशु ने देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों जैसे दैनिक भास्कर, न्यूज़-18 और ज़ी न्यूज़ में अपनी सेवाएं दी हैं। वर्तमान में, वे वर्ष 2019 से लाइव हिन्दुस्तान के साथ जुड़े हुए हैं।


हिमांशु की पहचान विशेष रूप से राजनीति के विश्लेषक के तौर पर होती है। उन्हें बिहार की क्षेत्रीय राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति की गहरी और बारीक समझ है। एक पत्रकार के रूप में उन्होंने 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों और कई विधानसभा चुनावों को बेहद करीब से कवर किया है, जो उनके वृहद अनुभव और राजनीतिक दृष्टि को दर्शाता है।


काम के इतर, हिमांशु को सिनेमा का विशेष शौक है। वे विशेष रूप से सियासी और क्राइम बेस्ड वेब सीरीज़ देखना पसंद करते हैं, जो कहीं न कहीं समाज और सत्ता के समीकरणों को समझने की उनकी जिज्ञासा को भी प्रदर्शित करता है।

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