
दहेज उत्पीड़न के केस में पड़ोसियों को नहीं घसीट सकते; कर्नाटक हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
दालत ने माना कि आरोपी पड़ोसी महिला आशा, धारा 498A के तहत आने वाली परिवार की कानूनी परिभाषा में नहीं आती है। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता का नाम शिकायत में कहीं नहीं था, सिवाय इस आरोप के कि उसने पति को पत्नी को टॉर्चर करने के लिए उकसाया।
कर्नाटक हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवादों और दहेज प्रताड़ना के मामलों को लेकर एक बहुत ही महत्वपूर्ण आदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पति-पत्नी के बीच के झगड़ों में पड़ोसियों को आपराधिक कार्यवाही में नहीं घसीटा जा सकता है। जस्टिस एम नागप्रसन्न की पीठ ने बेंगलुरु की एक महिला के खिलाफ चल रहे केस को रद्द करते हुए यह राहत प्रदान की है।
यह मामला 13 फरवरी 2021 को बेंगलुरु के महालक्ष्मी लेआउट थाने में दर्ज एक शिकायत से शुरू हुआ था। मुनिरत्नम्मा नामक महिला ने अपने पति मुथुराम, उनके परिवार और अपनी पड़ोसी आशा जी के खिलाफ क्रूरता और उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई थी। पुलिस ने आईपीसी की धारा 498A (दहेज प्रताड़ना), 504, 506 और 323 के तहत मामला दर्ज किया और चार्जशीट में पड़ोसी आशा को आरोपी नंबर 5 बनाया। आरोप था कि आशा ने पति को अपनी पत्नी को प्रताड़ित करने के लिए उकसाया था।
जस्टिस एम नागप्रसन्न ने कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा, "पति, पत्नी या परिवार के सदस्यों के बीच आईपीसी की धारा 498A के तहत होने वाले अपराधों की कार्यवाही में किसी अजनबी को शामिल नहीं किया जा सकता है।" अदालत ने माना कि आरोपी पड़ोसी महिला आशा, धारा 498A के तहत आने वाली परिवार की कानूनी परिभाषा में नहीं आती है। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता का नाम शिकायत में कहीं नहीं था, सिवाय इस आरोप के कि उसने पति को पत्नी को टॉर्चर करने के लिए उकसाया।
आशा जी ने अपनी याचिका में दलील दी थी कि उनका शिकायतकर्ता के वैवाहिक जीवन में कोई लेना-देना नहीं है और वह केवल एक पड़ोसी हैं। उन्होंने तर्क दिया कि उन्हें सिर्फ आपसी रंजिश निकालने के लिए इस मामले में घसीटा गया है, जबकि उकसाने का एक अकेला आरोप उन्हें दहेज प्रताड़ना जैसे गंभीर केस में आरोपी बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए माना कि पड़ोसियों को ऐसे मामलों में प्रतिवादी बनाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।





