कॉकरोच जनता पार्टी से दूर रहें मुस्लिम युवा; मस्जिदों से की जा रही अपील, शाहीन बाग से मिली सीख?
सावधानी का यह संदेश केवल सोशल मीडिया तक ही सीमित नहीं रहा। शुक्रवार को शाहीन बाग की एक मस्जिद में नमाज के बाद इमाम ने अपने संबोधन में युवा मुसलमानों से प्रदर्शनों में शामिल होने से पहले गंभीरता से सोचने का आग्रह किया।

करीब छह साल पहले दक्षिण-पूर्वी दिल्ली की एक सड़क पर बैठी मुस्लिम महिलाओं ने शाहीन बाग को विरोध-प्रदर्शन के एक वैश्विक प्रतीक के रूप में बदल दिया था। लेकिन आज स्थितियां पूरी तरह बदली हुई नजर आ रही हैं। शनिवार को होने वाले एक नए प्रदर्शन से पहले मुस्लिम समुदाय के भीतर व्हाट्सएप ग्रुपों, मस्जिदों के ग्रुपों, इंस्टाग्राम रील्स और एक्स पोस्ट के जरिए एक बिल्कुल अलग संदेश फैलाया गया। मुस्लिम युवाओं को कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन से दूर रहने की नसीहत दी जा रही है।
सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही पोस्टों में मुस्लिम युवाओं को आगाह किया गया कि विरोध-प्रदर्शन भले ही कुछ घंटों का हो, लेकिन इसके परिणाम उनके लिए सालों तक बने रह सकते हैं। एक पोस्च में मुस्लिम युवाओं को न केवल प्रदर्शन से बचने बल्कि उसके आस-पास के इलाके में भी न जाने की सलाह दी गई। पोस्ट में लिखा है, "हमेशा की तरह अगर कोई हिंसा या अशांति भड़कती है तो सबसे पहले मुस्लिम युवाओं को ही बलि का बकरा बनाया जाएगा। इसके बाद गिरफ्तारियां, लंबे समय तक जेल, मीडिया ट्रायल और देशविरोधी होने के आरोप लगने जैसी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।"
टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी एक रिपोर्ट में सरिता विहार के एक कॉलेज छात्र अशरफ मसूद के हवाले से कहा है कि उनके पिता ने भी उन्हें प्रदर्शन में जाने से साफ मना किया है। अशरफ ने कहा, "मेरे पिता ने मुझसे कहा कि पहले खुद को मजबूत बनाने और अपने करियर पर ध्यान केंद्रित करना अधिक समझदारी है। उसके बाद ही दूसरों की मदद करें। इस तरह हम खुद के लिए मुसीबत खड़ी नहीं करेंगे।"
मस्जिदों से भी अपील
सावधानी का यह संदेश केवल सोशल मीडिया तक ही सीमित नहीं रहा। शुक्रवार को शाहीन बाग की एक मस्जिद में नमाज के बाद इमाम ने अपने संबोधन में युवा मुसलमानों से प्रदर्शनों में शामिल होने से पहले गंभीरता से सोचने का आग्रह किया। इमाम ने कहा, "मुस्लिम युवाओं को याद रखना चाहिए कि एक्टिविज्म सिर्फ सड़कों पर उतरने का नाम नहीं है। वास्तविक बदलाव शिक्षा, आर्थिक प्रगति और सामुदायिक कार्यों के माध्यम से आता है। भावनाएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन फैसले बुद्धिमत्ता, हिकमत और जिम्मेदारी के साथ लिए जाने चाहिए।"
बटला हाउस स्थित मस्जिद शहाब के इमाम अहमद ने बताया, "इस्लाम हमें न्याय के लिए खड़े होना सिखाता है, लेकिन खुद को अनावश्यक नुकसान और अराजकता से बचाना भी सिखाता है। हर प्रदर्शन एक जैसा नहीं होता। किसी भी प्रदर्शन में भाग लेने से पहले युवाओं को खुद से पूछना चाहिए कि इसका उद्देश्य क्या है? इसे कौन आयोजित कर रहा है? क्या यह शांतिपूर्ण रहेगा या हिंसक हो जाएगा? क्या वहां जाने से कोई लाभ होगा या केवल नुकसान?"
मुस्लिम समुदाय के भीतर सभी लोग इस राय से पूरी तरह सहमत नहीं दिखे। इस बहस के बीच सोशल मीडिया पर एक यूजर ने टिप्पणी करते हुए लिखा, "शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन करना देश के प्रत्येक नागरिक का एक लोकतांत्रिक अधिकार है और इससे पूरी तरह पीछे नहीं हटा जा सकता।"
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लेखक के बारे में
Himanshu Jhaबिहार के दरभंगा जिले से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु शेखर झा डिजिटल मीडिया जगत का एक जाना-माना नाम हैं। विज्ञान पृष्ठभूमि से होने के बावजूद (BCA और MCA), पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून के कारण उन्होंने IGNOU से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया और मीडिया को ही अपना कर्मक्षेत्र चुना।
एक दशक से भी अधिक समय का अनुभव रखने वाले हिमांशु ने देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों जैसे दैनिक भास्कर, न्यूज़-18 और ज़ी न्यूज़ में अपनी सेवाएं दी हैं। वर्तमान में, वे वर्ष 2019 से लाइव हिन्दुस्तान के साथ जुड़े हुए हैं।
हिमांशु की पहचान विशेष रूप से राजनीति के विश्लेषक के तौर पर होती है। उन्हें बिहार की क्षेत्रीय राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति की गहरी और बारीक समझ है। एक पत्रकार के रूप में उन्होंने 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों और कई विधानसभा चुनावों को बेहद करीब से कवर किया है, जो उनके वृहद अनुभव और राजनीतिक दृष्टि को दर्शाता है।
काम के इतर, हिमांशु को सिनेमा का विशेष शौक है। वे विशेष रूप से सियासी और क्राइम बेस्ड वेब सीरीज़ देखना पसंद करते हैं, जो कहीं न कहीं समाज और सत्ता के समीकरणों को समझने की उनकी जिज्ञासा को भी प्रदर्शित करता है।
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