बारिश में डूबे रेगिस्तान, सूखे पड़े मैदान; मॉनसून की माया से किसान परेशान, एक्सपर्ट हैरान
जून में राजस्थान के कई क्षेत्रों में सामान्य से अधिक बारिश दर्ज हुई। जबकि महाराष्ट्र, जहां पर मॉनसून की अच्छी-खासी मेहरबानी रहती है, बरसात की कमी से जूझ रहा है। इसके चलते, किसान जहां परेशान हैं, वहीं, विशेषज्ञ भी हैरान हैं।

भारत इन दिनों मॉनसून के इंतजार में बेकरार है। इस बीच एक चौंकाने वाली असमानता दिख रही है। यह असमानता है देश के दो अलग हिस्सों में बारिश के पैटर्न की। एक तरफ राजस्थान है जो भारत का सबसे शुष्क प्रदेश है। यहां पर जून महीने में बारिश होना हैरान करने वाली बात है, लेकिन इस साल ऐसा हो रहा है। जून में राजस्थान के कई क्षेत्रों में सामान्य से अधिक बारिश दर्ज हुई। जबकि महाराष्ट्र, जहां पर मॉनसून की अच्छी-खासी मेहरबानी रहती है, बरसात की कमी से जूझ रहा है। इस विरोधाभास के चलते, किसान जहां परेशान हैं, वहीं, विशेषज्ञ भी हैरान हैं। हैरानी इस बात की है कि एक रेगिस्तानी प्रदेश में इतनी बरसात कैसे हो रही है, जबकि अरब सागर की मॉनसून शाखा पर निर्भर क्षेत्र सूखे रहते हैं? इसका जवाब जमीन से हजारों मीटर ऊपर चल रही एक जटिल वायुमंडलीय लड़ाई में छिपा है।
क्या पूरा मामला
सामान्य हालात में, जून के दौरान दक्षिण-पश्चिम मानसून तेजी से भारत के पश्चिमी तट पर बढ़ता है। अरब सागर से आती नमी भरी हवाएं केरल, कर्नाटक, गोवा और महाराष्ट्र को प्रभावित करती हैं। इसके बाद ये हवाएं केंद्रीय भारत की तरफ बढ़ती हैं। वहीं, व्यापक मॉनसूनी बारिश के लिए राजस्थान आमतौर पर जून के अंत या जुलाई की शुरुआत तक इंतजार करता है। लेकिन इस साल मॉनसून अपनी सामान्य लय खोता नजर आ रहा है।
जून की शुरुआत से ही उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ हिस्सों में बारिश ज्यादा हुई है जबकि महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और मध्य भारत के बड़े हिस्से काफी हद तक सूखे रहे हैं। मुंबई इस साल मॉनसून के अपने सबसे सूखे शुरुआत का सामना कर रहा है। वहीं, महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में जलाशयों के स्तर पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है। विशेषज्ञ इसके पीछे की वजह, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की शाखाओं को अलाइन न होना मानते हैं। मॉनसून का प्रवाह एक साथ होने की जगह, टुकड़ों में बंटा हुआ है। इसके चलते पश्चिमी हवाएं अभी भी जून के दूसरे हिस्से में भी कई क्षेत्रों में हावी हैं, जो काफी असामान्य है।
वेस्टर्न डिस्टर्बेंस का असर
इसके अलावा मौसम वैज्ञानिक इसके लिए पश्चिमी विक्षोभ को वजह मानते हैं। यह मौसम प्रणाली, भूमध्यसागरीय क्षेत्र से शुरू होकर भारत की तरफ पूरब की ओर जाती है। यह आमतौर पर उत्तर भारत और हिमालय में सर्दियों की बारिश और बर्फबारी से जुड़ी होती हैं। लेकिन इस साल, बार-बार आने वाले पश्चिमी विक्षोभ ने जून तक मौसम के पैटर्न को प्रभावित करना जारी रखा है। जैसे ही यह सिस्टम उत्तर भारत की तरफ बढ़ा, अरब सागर से नमी के संपर्क में आया। इसके बाद इसने राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और आस-पास के इलाकों में गरज-चमक के साथ बारिश को बढ़ावा दिया। इसके चलते उत्तर भारत में बारिश होने की जगह, इसका रुख उत्तर की तरफ हो गया। इसके चलते ही रजस्थान के विभिन्न हिस्सों में असामान्य रूप से अधिक बारिश हो रहा है।
अरब सागर में कमजोरी
इसके साथ ही साथ मॉनसून की अरब सागर शाखा बहुत कमजोर रही है। दक्षिण-पश्चिम मॉनसून शक्तिशाली भूमध्यरेखीय हवाओं पर निर्भर करता है जो दक्षिणी हिंद महासागर से नमी लेकर अरब सागर और वहां से भारतीय तट की ओर ले जाती हैं। ये हवाएं आमतौर पर सोमाली जेट से मजबूत होती हैं। यह एक शक्तिशाली निम्न-स्तरीय धारा है जो भारत की ओर नमी ले जाने वाले कन्वेयर बेल्ट की तरह काम करती है। इस साल वह कन्वेयेर बेल्ट पूरी ताकत से पहुंचने में संघर्ष कर रही है।
क्या कहती हैं सैटेलाइट तस्वीरें
सैटेलाइट से मिली तस्वीरों में नजर आ रहा है कि पूरे जून में पश्चिमी तट के बड़े हिस्सों में लगातार गहरे बादलों का विकास नहीं हुआ। हालांकि बारिश के अलग-अलग दौर हुए, लेकिन वे व्यवस्थित बादल की पट्टियां जो आमतौर पर महाराष्ट्र में व्यापक मॉनसूनी बारिश लाती हैं, बड़ी हद तक गायब रही। मजबूत नमी के बिना, प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में बारिश सामान्य से कम रही। एक और महत्वपूर्ण कारक मॉनसून ट्रॉफ की जगह है। मॉनसून ट्रॉफ उत्तर भारत में फैला हुआ एक लंबा कम दबाव वाला क्षेत्र है। यह ऐसे काम करता है जैसे रेल की पटरियां, जो बारिश लाने वाली परिस्थितियों को पूरे उपमहाद्वीप में मार्गदर्शन देती हैं। सक्रिय मानसून के समय, यह ट्रॉफ आम तौर पर मध्य भारत के करीब रहता है, जिससे महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पूर्वी भारत में बारिश वितरित करने में मदद मिलती है।
हालांकि इस साल, पश्चिमी विक्षोभों के प्रभाव के चलते यह ट्राफ उत्तर की ओर चला गया है। जब ट्राफ उत्तर की ओर बढ़ता है, तो बारिश भी उत्तर की ओर चली जाती है। हिमालय की पहाड़ियों, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में भारी बारिश होती है। जबकि मध्य भारत में बारिश लाने वाला सिस्टम कमजोर हो जाता है।


