मिडिल ईस्ट में तनाव से आपका फ्लाइट टिकट हो गया महंगा, सफर भी 2 घंटे लंबा हुआ
हवाई रास्तों के लंबे होने का असर सीधा एयरलाइंस कंपनियों की जेब पर पड़ रहा है। किसी भी विमान कंपनी के कुल ऑपरेटिंग खर्च का करीब 40 फीसदी हिस्सा सिर्फ जेट फ्यूल यानी विमान ईंधन पर खर्च होता है।

पश्चिम एशिया यानी मिडल ईस्ट में गहराते भू-राजनीतिक तनाव ने दुनिया भर के हवाई रास्तों को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। इस संकट का सबसे सीधा और बड़ा झटका भारतीय एयरलाइंस कंपनियों को लगा है, जो इस समय भारी ऑपरेशनल दिक्कतों और वित्तीय घाटे से जूझ रही हैं। अंतरराष्ट्रीय रेगुलेटर्स, खासकर यूरोपीय संघ विमानन सुरक्षा एजेंसी (EASA) के कड़े निर्देशों के बाद कमर्शियल उड़ानों के लिए ईरान और इराक के एयरस्पेस को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है। भारत से यूरोप, ब्रिटेन और उत्तरी अमेरिका जाने वाली लंबी दूरी की उड़ानों के लिए यह रास्ता बंद होना किसी बड़े झटके से कम नहीं है, क्योंकि अब उनके सीधे और सबसे छोटे रूट खत्म हो गए हैं।
लंबे चक्कर लगाने को मजबूर विमान, 2 घंटे तक बढ़ा समय
ईरान और इराक का आसमान बंद होने के बाद अब एयरलाइंस कंपनियों के पास इस युद्ध क्षेत्र से बचने के लिए केवल दो ही सुरक्षित रास्ते बचे हैं। लेकिन परेशानी यह है कि ये दोनों ही रास्ते सफर की दूरी को बहुत ज्यादा बढ़ा देते हैं:
- उत्तरी रास्ता: यूक्रेन के पहले से बंद आसमान के ठीक नीचे से होते हुए मध्य एशिया और काकेशस के रास्ते उत्तर की ओर से उड़ान भरना।
- दक्षिणी रास्ता: अरब सागर, ओमान, सऊदी अरब और मिस्र के ऊपर से होते हुए दक्षिण की तरफ से चक्कर लगाकर जाना।
पूरी दुनिया की कमर्शियल फ्लाइट अब इन्हीं चुनिंदा सुरक्षित हवाई पट्टियों से गुजर रही हैं, जिससे इन रास्तों पर भारी ट्रैफिक होने लगा है। एयर इंडिया जैसी भारतीय कंपनियों की बात करें, तो इन लंबे चक्करों के कारण एक तरफ की उड़ान का समय 90 से 120 मिनट (डेढ़ से दो घंटे) तक बढ़ गया है। दिल्ली और मुंबई से लंदन, फ्रैंकफर्ट और पेरिस जाने वाली उड़ानें सबसे ज्यादा प्रभावित हुई हैं, जिससे एयरलाइंस का पूरा शेड्यूल और कनेक्टिंग उड़ानों का गणित बिगड़ गया है।
ईंधन का खर्च और इंश्योरेंस प्रीमियम बढ़ा, वित्तीय संकट में कंपनियां
हवाई रास्तों के लंबे होने का असर सीधा एयरलाइंस कंपनियों की जेब पर पड़ रहा है। किसी भी विमान कंपनी के कुल ऑपरेटिंग खर्च का करीब 40 फीसदी हिस्सा सिर्फ जेट फ्यूल यानी विमान ईंधन पर खर्च होता है। ऐसे में उड़ान का समय बढ़ने से उनका मुनाफा पूरी तरह खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है।
एक अनुमान के मुताबिक, एक बड़े विमान का रास्ता बदलने से हर उड़ान में लगभग 5,000 से 6,000 गैलन अतिरिक्त ईंधन की खपत हो रही है। इससे हर एक फेरे पर कंपनियों का खर्च हजारों डॉलर बढ़ जाता है। इस ईंधन संकट के साथ-साथ एक और मुसीबत अनिवार्य इंश्योरेंस प्रीमियम की दरों में हुई बढ़ोतरी है। तनावग्रस्त इलाकों के पास से गुजरने वाली उड़ानों के लिए 'वॉर-रिस्क इंश्योरेंस' का प्रीमियम काफी महंगा हो गया है, जिससे कंपनियों पर ऐसा अतिरिक्त बोझ पड़ा है जिसका बजट में कोई प्रावधान नहीं था।
यात्रियों पर क्या होगा असर? जेब होगी और ढीली
लंबे रास्तों और आसमान छूते बीमा खर्च के इस दोहरे हमले से निपटने के लिए भारतीय एयरलाइंस ने अब अपने नेटवर्क और किराए में बदलाव करना शुरू कर दिया है:
- उड़ानों में कटौती: कुछ एयरलाइंस ने चुनिंदा अंतरराष्ट्रीय रूटों पर अपनी उड़ानों की संख्या (फ्रीक्वेंसी) कम कर दी है ताकि संसाधनों को सही तरीके से मैनेज किया जा सके।
- महंगा हुआ सफर: भारत और यूरोप के बीच हवाई टिकटों के दाम 5 से लेकर 30 फीसदी तक बढ़ गए हैं। वहीं, पश्चिम एशिया के कुछ हिस्सों के लिए क्षेत्रीय उड़ानों के किराए में अस्थायी रूप से इससे भी तेज उछाल देखा गया है।
- शेड्यूल में गड़बड़ी: उड़ानों के समय में आ रहे इस अप्रत्याशित बदलाव के कारण यात्रियों को एयरपोर्ट पर लंबी देरी, कनेक्टिंग फ्लाइट छूटने और लंबे ले-ओवर का सामना करना पड़ रहा है।
सुरक्षा से जुड़े ये कड़े नियम फिलहाल लंबे समय तक लागू रहने वाले हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय सफर करने वाले मुसाफिरों को आने वाले दिनों में महंगे टिकटों और लंबे सफर के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना होगा, क्योंकि भारतीय विमानन क्षेत्र इस समय हाल के सालों के सबसे बड़े भू-राजनीतिक संकट से रास्ता तलाश रहा है।
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