शादी के 28 साल बाद गूंजी किलकारी, IVF के जरिये असंभव को संभव बना रहीं डॉ. स्मृति स्पर्श
साल 2017 में उन्होंने बोरिंग रोड क्षेत्र में काम शुरू किया, जबकि दानापुर-खगौल में अस्पताल तैयार हो रहा था। मेहनत और मरीजों के भरोसे का असर यह रहा कि 2018 तक उनके यहां 25 से 30 सफल डिलिवरी हो चुकी थीं।

निमिषा (काल्पनिक नाम) के घर इन दिनों खुशियों का ऐसा उजाला है, जिसकी कल्पना उन्होंने शायद खुद भी छोड़ दी थी। दरवाजे पर बधाइयां देनेवालों की कतार है, गोद में नन्हा सा बेटा और आंखों में आंसुओं के साथ मुस्कान। कल तक जिन लोगों के सवाल और ताने दिल को छलनी कर देते थे, आज वही लोग बेटे को आशीर्वाद देते नहीं थक रहे हैं। निमिषा और राजेश (काल्पनिक नाम) की शादी को पूरे 28 साल हो चुके थे। साल दर साल बीतते गए, लेकिन संतान का सपना अधूरा ही रहा। समाज के दबाव, रिश्तेदारों की फुसफुसाहट और भीतर ही भीतर टूटती उम्मीद—यह सब उनकी जिंदगी का हिस्सा बन चुका था। एक समय ऐसा भी आया, जब दोनों ने मान लिया कि शायद अब माता-पिता बनना उनकी किस्मत में नहीं है।
थके-हारे और टूटी उम्मीदों के साथ वे दरभंगा स्थित स्मृति आईवीएफ एंड फर्टिलिटी सेंटर पहुंचे। यहीं उनकी मुलाकात हुई डॉ. स्मृति स्पर्श से। निमिषा बताती हैं कि डॉक्टर ने सबसे पहले उनका इलाज नहीं, बल्कि उनका दर्द सुना। लंबी काउंसलिंग के दौरान उन्होंने दोनों को समझाया कि बांझपन कोई अभिशाप नहीं, बल्कि एक चिकित्सकीय स्थिति है, जिसका इलाज संभव है। आईवीएफ प्रक्रिया के तहत एक-एक कदम सावधानी और भरोसे के साथ उठाया गया। हर जांच, हर रिपोर्ट के साथ उम्मीद और डर साथ-साथ चलते रहे। लेकिन अंततः वह दिन आया, जब डॉक्टर ने खुशखबरी दी- आईवीएफ सफल रहा।
आज उसी संघर्ष का नतीजा है कि निमिषा-राजेश के घर किलकारी गूंज रही है। निमिषा की आंखें भर आती हैं, जब वह कहती हैं, “डॉ. स्मृति मेरे लिए भगवान से कम नहीं हैं। उन्होंने मुझे मां बनाया, मुझे एक नई पहचान दी।” निमिषा की कहानी अकेली नहीं है। समाज में आज भी ऐसी अनगिनत महिलाएं हैं, जो बांझपन (इन्फर्टिलिटी) की समस्या से जूझ रही हैं। इस दर्द को अक्सर चुपचाप सहा जाता है, क्योंकि बोलने पर सवाल उठते हैं।

लाइव हिन्दुस्तान से बातचीत में डॉ. स्मृति स्पर्श बताती हैं कि इन्फर्टिलिटी सिर्फ एक मेडिकल कंडीशन है। सही समय पर सही सलाह और इलाज मिल जाए, तो मातृत्व का सपना पूरा किया जा सकता है। डॉ. स्मृति स्पर्श ने अपनी मेडिकल प्रैक्टिस की शुरुआत पटना के महावीर कैंसर संस्थान से की थी। उस दौर में वह सर्जरी विभाग से जुड़ी हुई थीं। यहीं से उन्हें यह एहसास हुआ कि गायनिक फील्ड में इन्फर्टिलिटी ऐसा क्षेत्र है, जहां असंभव को संभव किया जा सकता है। इसी सोच ने उन्हें आईवीएफ की ओर मोड़ा।

साल 2017 में उन्होंने बोरिंग रोड क्षेत्र में काम शुरू किया, जबकि दानापुर-खगौल में अस्पताल तैयार हो रहा था। मेहनत और मरीजों के भरोसे का असर यह रहा कि 2018 तक उनके यहां 25 से 30 सफल डिलिवरी हो चुकी थीं। इसके बाद उन्होंने तय कर लिया कि वह पूरी तरह आईवीएफ पर ही काम करेंगी। वर्ष 2021 से डॉ. स्मृति स्पर्श फुलटाइम आईवीएफ विशेषज्ञ के रूप में सेवाएं दे रही हैं।
डॉ. स्मृति बताती हैं कि उनके लिए यह सिर्फ एक मेडिकल प्रोफेशन नहीं, बल्कि भावनात्मक जिम्मेदारी भी है। पटना से लेकर दरभंगा तक के मरीज उनसे इलाज के लिए संपर्क करते हैं। कई बार लोग लंबी यात्रा कर के आते हैं और उन्हें इंतजार भी करना पड़ता है, क्योंकि वे उनसे बड़ी उम्मीदें लेकर आते हैं। ऐसे में मरीजों को मोटिवेट करना और उन्हें भरोसा दिलाना भी इलाज का अहम हिस्सा है।
आईवीएफ को लेकर समाज में फैली भ्रांतियों पर डॉ. स्मृति साफ शब्दों में कहती हैं कि आईवीएफ कोई “दूसरा” बच्चा नहीं होता। यह सिर्फ एक प्रक्रिया है। अंडा महिला का होता है और शुक्राणु पुरुष का। डॉक्टर केवल उपचार और प्रक्रिया में मदद करता है। यहां तक कि स्पर्म डोनर की प्रक्रिया में भी बच्चा उसी महिला के गर्भ में विकसित होता है, बशर्ते महिला की फर्टिलिटी बनी हुई हो।
डॉ. स्मृति बताती हैं कि जो महिला मां नहीं बन पा रही हैं और उनका गर्भ मौजूद है तो उनके लिए गोद लेना ही आखिरी विकल्प नहीं है। उन्हें आईवीएफ की प्रक्रिया पर विचार करना चाहिए। गोद लेने का विकल्प तो उन महिलाओं के लिए होना चाहिए जिनके पास गर्भ नहीं है।

फर्टिलिटी को लेकर जागरूकता पर जोर देते हुए डॉ. स्मृति कहती हैं कि एक महिला के जन्म के समय उसके शरीर में लगभग 20 लाख अंडे होते हैं। पीरियड शुरू होने तक यह संख्या घटकर 4–5 लाख रह जाती है। मेनोपॉज तक आते-आते केवल 400–500 अंडे ही शेष रहते हैं। हर महीने औसतन 20–30 अंडे नष्ट हो जाते हैं। ऐसे में अगर कोई महिला पांच साल तक सिर्फ इंतजार करती रहे, तो करीब 60 हजार अंडे नष्ट हो सकते हैं।
उनका कहना है कि अगर शरीर में एक भी अंडा फूटता हुआ दिख रहा है, तो महिला मां बन सकती है। आईवीएफ एक जाना-माना और प्रभावी समाधान है, जिसके जरिए दंपति अपने ही अंडाणु और शुक्राणु से बच्चे को जन्म दे सकते हैं। लेकिन इसके लिए समय पर विशेषज्ञ के पास पहुंचना बेहद जरूरी है।
डॉ. स्मृति सलाह देती हैं कि शादी के एक साल बाद भी अगर संतान नहीं हो रही है, तो बिना संकोच इलाज के लिए आना चाहिए। देर से शादी और बहुत ज्यादा प्लानिंग करके बच्चे करने की सोच का सीधा असर फर्टिलिटी पर पड़ता है। उम्र के साथ अंडों की क्वालिटी घटती जाती है, जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता।
वह बताती हैं कि हर मरीज के साथ पहले सामान्य तरीके से इलाज की कोशिश की जाती है। जब अन्य विकल्प नहीं बचते, तभी आईवीएफ की सलाह दी जाती है। आमतौर पर 50 साल तक महिलाओं और 55 साल तक पुरुषों में आईवीएफ की संभावना देखी जाती है।
डॉ. स्मृति स्पर्श नेपाल के बी.पी. कोईराला इंस्टीट्यूट से पोस्ट ग्रैजुएट हैं और अहमदाबाद से आईवीएफ से जुड़ा विशेष प्रशिक्षण प्राप्त कर चुकी हैं। वह एआरटी और सरोगेसी बोर्ड की सदस्य भी हैं, जिसके अध्यक्ष स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय हैं। यह बोर्ड आईवीएफ और सरोगेसी की पूरी प्रक्रिया की निगरानी करता है।
डॉ. स्मृति का मानना है कि आईवीएफ को लेकर सही जानकारी और जागरूकता ही सबसे बड़ा इलाज है। जो लोग समझते हैं, वही सही समय पर इलाज करवा पाते हैं और माता-पिता बनने का सपना साकार कर पाते हैं।

लेखक के बारे में
Himanshu Jhaबिहार के दरभंगा जिले से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु शेखर झा डिजिटल मीडिया जगत का एक जाना-माना नाम हैं। विज्ञान पृष्ठभूमि से होने के बावजूद (BCA और MCA), पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून के कारण उन्होंने IGNOU से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया और मीडिया को ही अपना कर्मक्षेत्र चुना।
एक दशक से भी अधिक समय का अनुभव रखने वाले हिमांशु ने देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों जैसे दैनिक भास्कर, न्यूज़-18 और ज़ी न्यूज़ में अपनी सेवाएं दी हैं। वर्तमान में, वे वर्ष 2019 से लाइव हिन्दुस्तान के साथ जुड़े हुए हैं।
हिमांशु की पहचान विशेष रूप से राजनीति के विश्लेषक के तौर पर होती है। उन्हें बिहार की क्षेत्रीय राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति की गहरी और बारीक समझ है। एक पत्रकार के रूप में उन्होंने 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों और कई विधानसभा चुनावों को बेहद करीब से कवर किया है, जो उनके वृहद अनुभव और राजनीतिक दृष्टि को दर्शाता है।
काम के इतर, हिमांशु को सिनेमा का विशेष शौक है। वे विशेष रूप से सियासी और क्राइम बेस्ड वेब सीरीज़ देखना पसंद करते हैं, जो कहीं न कहीं समाज और सत्ता के समीकरणों को समझने की उनकी जिज्ञासा को भी प्रदर्शित करता है।
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