फडणवीस सरकार के एक फैसले से अब मुंबई में संग्राम; विरोध में कांदिवली लिंक रोड जाम, भारी पुलिस बल तैनात
कांदिवली लिंक रोड पर लालजीपाड़ा के पास सुबह करीब 9 बजे दर्जनों चालकों ने 'रास्ता-रोको' प्रदर्शन किया, जिससे व्यस्त समय के दौरान यातायात पूरी तरह ठप हो गया और सुरक्षा के लिए भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा।

महाराष्ट्र की राजधानी और देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में गैर-मराठी भाषी ऑटो और टैक्सी चालकों ने राज्य की देवेंद्र फडणवीस सरकार के अनिवार्य मराठी नियम के विरोध में सोमवार से तीन दिवसीय हड़ताल की शुरुआत कर दी है। उनका आरोप है कि जब से यह नियम लागू हुआ है, तब से ड्राइवर समुदाय के ही कुछ लोग उन्हें परेशान" कर रहे हैं और धमकी दे रहे हैं। मुंबई में सोमवार को कई जगहों पर ऑटो-रिक्शा चालकों ने मराठी भाषा में पर्याप्त दक्षता न दिखा पाने के कारण कथित उत्पीड़न और कार्रवाई के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।
कांदिवली लिंक रोड पर लालजीपाड़ा के पास सुबह करीब 9 बजे दर्जनों चालकों ने 'रास्ता-रोको' प्रदर्शन किया, जिससे व्यस्त समय (peak hours) के दौरान यातायात पूरी तरह ठप हो गया और सुरक्षा के लिए भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा। रिपोर्टों के अनुसार, शहर के उपनगर कांदिवली के लोखंडवाला और दहानुकरवाड़ी जैसे उपनगरीय इलाकों में भी चालकों ने काम रोककर विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया और साथी चालकों से विरोध में शामिल होने की अपील की। उन्होंने परिवहन अधिकारियों द्वारा भाषा की जांच के तरीकों पर नाराजगी जताई। विरोध कर रहे हिंदी भाषी चालकों ने कहा कि उनमें से कई दशकों से मुंबई में रह रहे हैं और काम कर रहे हैं। उन्होंने मराठी का सीमित ज्ञान होने पर सजा दिए जाने के तर्क पर सवाल उठाया।
भाषा के नाम पर हमें क्यों परेशान किया जा रहा
इन चालकों का कहना है, "हम दशकों से मुंबई में रह रहे हैं और ऑटो-रिक्शा चला रहे हैं। हम मराठी समझते हैं और कुछ हद तक बोल भी सकते हैं। भाषा के नाम पर हमें क्यों परेशान किया जा रहा है?" यह विरोध महाराष्ट्र सरकार के उस फैसले के बाद हो रहा है जिसमें ऑटो-रिक्शा और टैक्सी परमिट धारकों के लिए मराठी का बुनियादी ज्ञान अनिवार्य कर दिया गया था। परिवहन मंत्री प्रताप सरनाइक ने घोषणा की थी कि परमिट केवल उन्हीं आवेदकों को जारी किए जाएंगे जो मराठी पढ़ और बोल सकते हैं। सरकार का कहना है कि इस कदम का मकसद राज्य की आधिकारिक भाषा को बढ़ावा देना और उसकी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखना है। हालांकि, ऑटो-रिक्शा यूनियनों ने इस कदम का विरोध किया है। उनका तर्क है कि भाषा की सख्त शर्तों से गैर-मराठी भाषी समुदायों के हजारों ड्राइवरों की आजीविका पर बुरा असर पड़ सकता है।
8,217 ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों की जांच
अगस्त में क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (आरटीओ) द्वारा सत्यापन अभियान फिर से शुरू करने के बाद यह मुद्दा फिर से चर्चा में आ गया। ऑटो चालकों का आरोप है कि नई जांच, नोटिस और संभावित जुर्माने ने उन लोगों के बीच डर पैदा कर दिया है जो बातचीत के लिए जरूरी स्तर की मराठी नहीं बोल पाते हैं। अधिकारियों के अनुसार आरटीओ ने अब तक पूरे राज्य में 8,217 ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों की जांच की है और मराठी का पर्याप्त ज्ञान न होने के आरोप में 1,268 लोगों को नोटिस जारी किए हैं। हाल के चरण में जिन चालकों की जांच की गई, उनमें से 3,995 की जांच हुई। इनमें से 604 चालकों में मराठी में बातचीत की पर्याप्त दक्षता नहीं पाई गई और उन्हें नोटिस जारी किए गए। दूसरे ज़िलों में 4,222 चालकों की जांच की गई और 664 को नोटिस जारी किए गए, जिससे कुल नोटिसों की संख्या 1,268 हो गई।
'पढ़े-लिखे होते तो दफ्तर में होते'
प्रदर्शनकारी चालकों का कहना है कि वे दशकों से मुंबई में रहकर ऑटो चला रहे हैं। इस नए नियम के लागू होने के बाद से उन्हें कथित उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। गैर-मराठी चालकों का आरोप है कि उन्हें स्थानीय मराठी भाषी चालकों द्वारा लगातार चेतावनियाँ दी जा रही हैं और जबरन भाषा सीखने के लिए दबाव बनाया जा रहा है।प्रदर्शन के दौरान एक बुजुर्ग चालक (उम्र 55-60 वर्ष) ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा, "हम 55-60 साल के बुजुर्ग हैं, जो कभी स्कूल नहीं गए। हम मराठी कैसे बोल सकते हैं? अगर हम पढ़े-लिखे होते, तो किसी दफ्तर में बैठकर काम कर रहे होते।" चालकों ने यह भी आरोप लगाया कि जो लोग "टूटी-फूटी मराठी" बोलकर काम चलाने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें समय देने के बजाय सीधे दंडित किया जा रहा है।


