
मेनका गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बताया इम्प्रैक्टिल, कहा- जानवरों के प्रति दया-भावना जरूरी
संक्षेप: पशु अधिकारों की पैरोकार और पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने गुरुवार को आवारा पशुओं को हटाकर आश्रय गृहों में स्थानांतरित करने के सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देश को अव्यावहारिक करार देते हुए कहा कि भारत में पशुओं के प्रति हमारा नजरिया दया-भावना पर टिका होना चाहिए।
पशु अधिकारों की पैरोकार और पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने गुरुवार को आवारा पशुओं को हटाकर आश्रय गृहों में स्थानांतरित करने के सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देश को 'अव्यावहारिक' करार देते हुए कहा कि भारत में पशुओं के प्रति हमारा नजरिया दया-भावना पर टिका होना चाहिए। कोर्ट ने हाल ही में अपने फैसले में स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों और अन्य भवनों से आवारा कुत्तों को हटाने, उनकी नसबंदी व टीकाकरण कराकर शेल्टर होम में रखने का आदेश जारी किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने 7 नवंबर को शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों जैसे सार्वजनिक स्थलों पर कुत्तों के काटने की घटनाओं में 'खतरनाक वृद्धि' पर ध्यान देते हुए अधिकारियों को ऐसे पशुओं को निर्धारित आश्रयों में भेजने का निर्देश दिया। साथ ही, शीर्ष अदालत ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) समेत संबंधित एजेंसियों को राजमार्गों व एक्सप्रेस-वे से आवारा पशुओं और मवेशियों को हटाने के निर्देश दिए हैं।
एक कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर पूछे गए सवाल के जवाब में मेनका गांधी ने कहा कि कोर्ट ने निर्देश दिया है कि कुत्तों को हटाओ, बिल्लियों को हटाओ, बंदरों को हटाओ, उन्हें शेल्टर में डालो, नसबंदी करो, लेकिन हकीकत में कोई भी ऐसा नहीं कर पाएगा... यह पूरी तरह अव्यावहारिक है। उन्होंने स्थानीय निकायों के बीच तालमेल की कमी पर भी चिंता जताई और जोर दिया कि पशुओं के साथ भारत का व्यवहार नियंत्रण की बजाय दया और सहानुभूति से निर्देशित होना चाहिए।
पूर्व सांसद ने ये टिप्पणियां 'सिनेकाइंड' पहल के शुभारंभ के मौके पर कीं। यह अभियान 'फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया' (एफएफआई) द्वारा मेनका के संगठन 'पीपुल फॉर एनिमल्स' (पीएफए) के सहयोग से शुरू किया गया है। इसका लक्ष्य सिनेमा जगत में पशु-प्रकृति के प्रति सहानुभूति को कमजोरी के बजाय ताकत के रूप में चित्रित करने के लिए प्रोत्साहित करना है।





