माता-पिता हिंदू, बच्चा मुसलमान; गोदनामा पर बढ़ा विवाद, हाई कोर्ट ने क्या कहा?
मद्रास हाई कोर्ट ने एक गोदनामा विवाद मामले में फैसला सुनाते हुए मुस्लिम घर में पैदा हुए बच्चे का गोदनामा हिंदू दंपति को दिया है। कोर्ट की तरफ से कहा गया कि दंपति बच्चे को वास्तव में अपने बच्चे की तरह मानता है। ऐसे में उन्हें कानूनन अभिभावक नियुक्त करने में कोई दिक्कत नहीं है।

आम तौर पर किसी एक सही दंपति का किसी भी बच्चे या बच्ची को गोद लेने पर ज्यादा परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता है। लेकिन कई बार मामला ऐसा फंस जाता है कि बात कानूनी लड़ाई तक पहुंच जाती है। ऐसा ही एक मामला तमिलनाडु से सामने आया है। यहां पर एक हिंदू दंपत्ति अपनी पड़ोसी की बेटी को गोद लेने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन दोनों के धर्म में अंतर की वजह से मामला फंसा हुआ था। अब मद्रास हाई कोर्ट ने इस मामले पर फैसला सुनाते हुए धार्मिक बाधाओं से आगे बढ़कर बच्चे के हित को आगे रखा है।
हिंदू दंपत्ति की अपील पर सुनवाई करते हुए मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस एन आनंद वेंकटेश और जस्टिस के के रामकृष्णन की पीठ ने किसी भी निर्णय पर पहुंचने से पहले बच्ची की जैविक मां और उसके बाकी परिवार को बुलाया। कोर्ट के सामने बच्ची की जैविक मां ने भी इस बात पर सहमति जताई की उसने अपनी मर्जी से बच्ची को हिंदू दंपत्ति को गोद दिया था। उन्हीं ने बचपन से उसकी देखभाल की है। बच्ची हिंदू दंपत्ति को ही माता-पिता के रूप में पहचानती है, जबकि अपनी जैविक मां को आंटी कहकर संबोधित करती है।
इस मामले को पूरी तरह से समझने के बाद मद्रास हाई कोर्ट की पीठ ने बच्ची के लिए हिंदू दंपति का गोदनामा स्वीकार किया। अदालत ने फैसला सुनाने से पहले टिप्पणी करते हुए कहा, "हम इस बात से पूरी तरह से संतुष्ट हैं कि अपीलकर्ता और उसकी पत्नी वास्तव में बच्ची को अपनी संतान की तरह पाल रहे हैं। इसके अलावा बच्ची भी उन्हें अपने माता पिता के रूप में पहचानती है। जैविक मां को भी इससे कोई परेशानी नहीं है, उसने अपनी तीसरी बेटी स्वैच्छा से गोद दी है। ऐसे में बच्ची के अभिभावक के रूप में हिंदू दंपत्ति को स्वीकार किया जा सकता है।
कोर्ट ने गार्जियन्स एंड वार्ड्स एक्ट का हवाला देते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति या दंपत्ति किसी नाबालिग का अभिभावक बनना चाहता है, आवेदन कर सकता है। इसमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बच्चे के कल्याण को दिया जाना चाहिए। इसमें धर्म कोई बाधा नहीं है। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बच्चा ही है।
क्या है मामला?
यह पूरा मामला गोदनामे से जुड़ा हुआ है। 2012 में अपीलकर्ता दंपत्ति की शादी हुई थी, लेकिन इसके बाद उन्हें कोई संतान नहीं हुई। लगातार प्रयास करने के बाद भी जब उन्हें सफलता नहीं मिली, तो उन्होंने अपने पड़ोस में रहने वाले मुस्लिम परिवार की एक नवजात बच्ची को गोद ले लिया। मुस्लिम महिला, जो दिहाड़ी मजदूरी का काम करती है और उसके पति की मृत्यु हो चुकी है। पहले से ही और बच्चे होने की स्थिति में वह सभी का पालन-पोषण करने मं संघर्ष कर रही थी। इसलिए उसने अपनी मर्जी से 2023 में पैदा हुई तीसरी संतान बेटी को हिंदू दंपत्ति को गोद दे दिया।
इसके बाद गोदनामा का प्रक्रिया को कानूनी रूप देने के लिए अपीलकर्ता ने फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लेकिन यहां पर आकर मामला उलझ गया। कोर्ट ने उनकी याचिका को यह कहकर खारिज कर दिया कि वह बच्ची के लिए पूरी तरह से अजनबी हैं। फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए दंपत्ति ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की, जहां पर उन्हें बच्ची के कानूनी अभिभावक का दर्जा मिल गया।
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लेखक के बारे में
Upendra Thapakउपेंद्र ने डिजिटल पत्रकारिता की शुरुआत लाइव हिन्दुस्तान से की है। पिछले एक साल से वे होम टीम में कंटेंट प्रोड्यूसर के तौर पर कार्यरत हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव 2024, ऑपरेशन सिंदूर और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की कवरेज की है। पत्रकारिता की पढ़ाई भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली (बैच 2023-24) से पूरी करने वाले उपेंद्र को इतिहास, अंतर्राष्ट्रीय संबंध, राजनीति, खेल, विज्ञान और समसामयिक घटनाओं से जुड़े विषयों में गहरी रुचि है। स्नातक स्तर पर बायोटेक्नोलॉजी की पढ़ाई करने के कारण उन्हें मेडिकल और वैज्ञानिक विषयों की भाषा की भी अच्छी समझ है। वे मूल रूप से मध्यप्रदेश के भिंड जिले के निवासी हैं।
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