
शादी में क्यों आ रहीं समस्याएं और किन सुधारों की जरूरत, अदालत ने सब बता दिया
अदालत की ओर से कहा गया, ‘इस मामले में पीड़िता उस पीढ़ी की भारतीय महिलाओं का प्रतीक हैं जिन्होंने लगातार मानसिक और भावनात्मक क्रूरता को सहन किया। यह आशा करते हुए कि सहनशीलता उनका गुण और कर्तव्य है।’
मद्रास हाई कोर्ट ने देश में विवाह को लेकर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि भारतीय विवाह व्यवस्था को पुरुष प्रधानता की छाया से निकलना होगा। इसे समानता और आपसी सम्मान की रोशनी में विकसित होना चाहिए। जज एल विक्टोरिया गौरी ने कहा कि खराब विवाहों में महिलाओं का सहन करना गलत है। यह पीढ़ियों से पुरुषों को महिलाओं को नियंत्रित और दबाने के लिए प्रोत्साहित करता रहा है। न्यायाधीश ने यह टिप्पणी 1965 में विवाह करने वाले बुजुर्ग दंपति के वैवाहिक विवाद से संबंधित फैसले में की।

अदालत की ओर से कहा गया, 'इस मामले में पीड़िता उस पीढ़ी की भारतीय महिलाओं का प्रतीक है जिन्होंने लगातार मानसिक और भावनात्मक क्रूरता को सहन किया। यह आशा करते हुए कि सहनशीलता उनका गुण और कर्तव्य है। ऐसी गलत सहनशीलता को अक्सर सामाजिक कथाओं में महिमामंडित किया जाता है। इसने पीढ़ियों के पुरुषों को पितृसत्तात्मक विशेषाधिकार के नाम पर नियंत्रण, प्रभुत्व और उपेक्षा करने के लिए प्रोत्साहित किया है।'
अदालत ने किन बातों पर दिया जोर
हाई कोर्ट ने जोर दिया कि पुरुषों को यह विरासत में मिली धारणा छोड़नी होगी कि विवाह उन्हें निर्विवाद अधिकार देता है। उन्हें यह समझना शुरू करना होगा कि उनकी पत्नियों की सुविधा, सुरक्षा, जरूरतें और गरिमा कर्तव्य नहीं, बल्कि वैवाहिक बंधन के मूल दायित्व हैं। खासकर उनके जीवन के अंतिम वर्षों में। पत्नियों के खिलाफ घरेलू हिंसा के कानून पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा कि जब भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498-A महिलाओं को अपनी सुरक्षा प्रदान करती है, तो वह ऐसा केवल सजा देने के लिए नहीं बल्कि सामाजिक चेतना जगाने के लिए करती है। हालांकि, अदालतें पारिवारिक विवादों के अत्यधिक आपराधिकरण को लेकर सतर्क रहती हैं। लेकिन, घरेलू क्रूरता को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं।





