वैवाहिक विवादों में वकीलों, न्यायाधीशों को लीक से हटकर सोचने की जरूरत : जस्टिस उपाध्याय
न्यायमूर्ति उपाध्याय ने कहा कि अगर कोई अभिभावक बच्चे की अभिरक्षा चाहता है, तो वह मुकदमा कहां दायर करेगा? वह कानूनी कार्रवाई कहां से शुरू करेगा, और क्या भारत या विदेश में किसी अदालत द्वारा दिया गया कोई कानूनी फैसला दूसरे देश में मान्य होगा या नहीं।

दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने रविवार को कहा कि वैवाहिक विवादों के कई मामलों में न्याय की तलाश कानून की चारदीवारी के भीतर समाप्त नहीं होती है, क्योंकि ये मामले कानूनी समस्या से कहीं अधिक सामाजिक समस्या से संबंधित होते हैं, और ऐसे मामलों में वकीलों और न्यायाधीशों द्वारा लीक से हटकर सोचने की आवश्यकता होती है।
वह यहां चल रहे 'इंडिया इंटरनेशनल डिस्प्यूट्स वीक 2026' में मुख्य भाषण दे रहे थे। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वकीलों और अदालत के पीठासीन अधिकारियों को वैवाहिक विवाद के ऐसे मामलों को संवेदनशीलता से निपटना चाहिए। उन्होंने कहा, "यह कानूनी समस्या से कहीं अधिक सामाजिक समस्या है; इस बात को ध्यान में रखना होगा। क्योंकि कई बार न्याय की तलाश कानून की चारदीवारी के भीतर समाप्त नहीं होती। इसमें पक्षों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों और न्यायाधीशों दोनों को ही लीक से हटकर सोचने की आवश्यकता होती है।"
उन्होंने कहा, "यदि आप किसी कानून की परिभाषित सीमाओं के भीतर समाधान खोजने का प्रयास करते हैं, तो शायद आप ऐसे विवादों में शामिल पक्ष को न्याय दिलाने में सक्षम नहीं होंगे।" न्यायमूर्ति उपाध्याय ने सीमा पार वैवाहिक विवादों से उत्पन्न चुनौतियों पर भी विस्तार से चर्चा की और कहा कि इनमें सबसे अहम चुनौती बच्चों की अभिरक्षा से जुड़े मामले हैं। उन्होंने कहा कि इस समस्या के समाधान के लिए भारत में केवल घरेलू कानून ही पर्याप्त नहीं हैं।
उन्होंने कहा, "भारत के विधि आयोग द्वारा की गई सिफारिशों के बावजूद, हम अभी तक कुछ अंतरराष्ट्रीय संधियों के हस्ताक्षरकर्ता नहीं हैं।" उन्होंने कहा कि भारत के अंतरराष्ट्रीय संधियों पर हस्ताक्षर करने के लिए सभी तरफ से मांग उठ रही है। उन्होंने कहा कि इसके अभाव में घरेलू अदालतों का काम बेहद मुश्किल हो जाता है। न्यायमूर्ति उपाध्याय ने कहा, "अगर कोई अभिभावक बच्चे की अभिरक्षा चाहता है, तो वह मुकदमा कहां दायर करेगा? वह कानूनी कार्रवाई कहां से शुरू करेगा, और क्या भारत या विदेश में किसी अदालत द्वारा दिया गया कोई कानूनी फैसला दूसरे देश में मान्य होगा या नहीं।"
उन्होंने कहा, "ये कुछ ऐसी कठिन समस्याएं हैं जिनका हम सामना कर रहे हैं।" उन्होंने आगे कहा कि सौभाग्यवश, भारत में संवैधानिक अदालतों - सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों - ने किसी संधि के अभाव में कुछ कानूनी मिसालें विकसित की हैं। उन्होंने कहा, "भारत में अदालतों ने बहुत अच्छा काम किया है और ऐसे माता-पिता को राहत दी है जहां बच्चे की अभिरक्षा की मांग की गई है।"
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