देश के किसानों पर आफत, पहले जैसी नहीं होगी मॉनसूनी बारिश; अब क्या करें?

लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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बदलते मॉनसून और महंगे डीजल ने देश के किसानों की चिंता बढ़ा दी है। इस दोहरी आफत से निपटने के लिए किसान कौन सी आधुनिक तकनीक और सरकारी योजनाएं अपनाएं? जानिए विस्तार से।

India 2026 monsoon rains

भारत सरकार ने इस साल के मॉनसून को लेकर अपना अनुमान कम कर दिया है। यह खबर देश भर के किसानों के लिए एक बड़ा झटका है, जो पहले से ही मध्य पूर्व में चल रही जंग के कारण खेती की बढ़ती लागत से जूझ रहे हैं। पिछले तीन सालों में यह पहली बार है जब मॉनसून के इतना कमजोर रहने का अनुमान लगाया गया है। इस खबर ने कृषि उत्पादन और देश के आर्थिक विकास को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं, खासकर ऐसे समय में जब भारत पहले से ही ईरान युद्ध के कारण उत्पन्न हुई महंगाई से जूझ रहा है।

मॉनसून एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत की जीवन रेखा है। देश के खेतों की सिंचाई, जलाशयों और भूजल को भरने के लिए जरूरी पानी का लगभग 70% हिस्सा मॉनसूनी बारिश से ही आता है। एक तरफ जहां आसमान से बरसने वाली राहत की बूंदों का पैटर्न बिगड़ गया है, वहीं दूसरी तरफ महंगाई और विशेषकर महंगे होते डीजल ने किसानों की कमर तोड़ कर रख दी है। यह दोहरी मार देश के अन्नदाताओं के लिए एक बड़े संकट का संकेत दे रही है।

कितनी होगी बारिश?

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम. रविचंद्रन ने शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि जून से सितंबर के दौरान कुल बारिश लंबी अवधि के औसत का 90% रहने की संभावना है। इसमें 4% ऊपर या नीचे होने की गुंजाइश रखी गई है।

पहले क्या था अनुमान? कारण क्या है?

मौसम विभाग ने इससे पहले अप्रैल में मॉनसूनी बारिश के 92% रहने का अनुमान लगाया था, जिसे अब घटा दिया गया है। बारिश में इस कमी की मुख्य वजह अल-नीनो को माना जा रहा है। यह मौसम का एक ऐसा पैटर्न है जिसके कारण आमतौर पर बारिश कम होती है।

'सामान्य बारिश' किसे कहते हैं?

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, बारिश को मापने का एक तय पैमाना है। पिछले 50 सालों में मानसूनी सीजन के दौरान देश में औसतन 87 सेंटीमीटर (35 इंच) बारिश होती आई है। जब भी कुल बारिश इस 50 साल के औसत के 96% से 104% के बीच होती है, तो उसे 'सामान्य बारिश' माना जाता है। चूंकि इस साल यह आंकड़ा केवल 90% रहने का अनुमान है, इसलिए इसे 'सामान्य से कम' की श्रेणी में रखा गया है।

खेती और किसानों पर इसका असर

भारत में मॉनसून आमतौर पर 1 जून के आसपास देश के दक्षिणी हिस्से (केरल) में पहुंचता है और अगले चार से छह हफ्तों में पूरे देश को कवर कर लेता है। भारत दुनिया में चावल, चीनी और कपास के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है। यहां के करोड़ों किसान अपने खेतों की सिंचाई के लिए पूरी तरह से इन्हीं मौसमी बारिशों पर निर्भर हैं।

बारिश का यह चार महीने का सीजन भारत की कुल सालाना बारिश का सबसे बड़ा हिस्सा लेकर आता है। यह न सिर्फ कृषि गतिविधियों के लिए जरूरी है, बल्कि जमीन के अंदर के पानी (ग्राउंडवॉटर) के स्तर को बनाए रखने के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। फसलों की बुवाई का समय अभी बस शुरू ही हुआ है, ऐसे में कम बारिश बड़ी चिंता का विषय है।

महंगाई और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

जब भी देश में बारिश औसत से कम होती है, तो सरकार देशवासियों के लिए खाने-पीने की कमी न हो, इसे सुनिश्चित करने के लिए कई कृषि उत्पादों के निर्यात (विदेश भेजने) पर रोक लगा देती है। उदाहरण के लिए, सरकार ने इसी महीने 30 सितंबर तक चीनी के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है।

डीजल और कच्चे तेल का संकट

बारिश कम होने का सीधा मतलब है कि किसानों को अपने खेतों की सिंचाई के लिए डीजल से चलने वाले पंपों का ज्यादा इस्तेमाल करना पड़ेगा। इससे देश में ईंधन (फ्यूल) की मांग तेजी से बढ़ेगी। दूसरी तरफ, मध्य पूर्व में चल रहे तनाव और ईरान युद्ध के कारण ऊर्जा की सप्लाई पहले ही प्रभावित है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जो मध्य पूर्व से तेल व्यापार का एक प्रमुख रास्ता है, वहां से सप्लाई बाधित होने के कारण कच्चे तेल के दाम काफी बढ़ गए हैं। घरेलू तेल कंपनियों ने इसी दबाव के कारण इस महीने पेट्रोल और डीजल की कीमतें भी बढ़ा दी हैं।

भारत पर इसका पिछला असर

इतिहास गवाह है कि भारत में जब भी अल नीनो का साल रहा है, देश में ज्यादातर समय सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है। कई बार तो इसके कारण इतने गंभीर सूखे पड़े हैं कि बड़े पैमाने पर फसलें बर्बाद हो गईं और सरकार को देश में अनाज की कमी रोकने के लिए अनाज के निर्यात (एक्सपोर्ट) पर सख्त पाबंदियां लगानी पड़ी थीं।

संकट से निपटने के उपाय: अब क्या करें किसान?

इस दोहरी चुनौती से निपटने के लिए किसानों को पारंपरिक खेती के तरीकों में बदलाव करना होगा। कुछ कारगर और आधुनिक उपाय इस प्रकार हैं:

फसल विविधीकरण

धान और गन्ने जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसलों के बजाय कम पानी में तैयार होने वाली फसलों (जैसे- मोटे अनाज/Millets, दालें, मक्का और तिलहन) की खेती पर जोर दें। इससे न केवल पानी और डीजल की बचत होगी, बल्कि इन फसलों की बाजार में मांग भी अच्छी है।

उन्नत सिंचाई तकनीकें अपनाएं

ड्रिप और स्प्रिंकलर (टपक और फव्वारा सिंचाई): पारंपरिक रूप से पूरे खेत में पानी भरने के बजाय सूक्ष्म सिंचाई अपनाएं। इससे 50-70% तक पानी की बचत होती है।

सरकार की पीएम कुसुम योजना (PM-KUSUM) के तहत सोलर पंप पर भारी सब्सिडी मिल रही है। डीजल पंप को सोलर पंप से बदलकर सिंचाई की लागत को लगभग शून्य किया जा सकता है।

कम अवधि वाली और सूखा प्रतिरोधी किस्में

कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा विकसित बीजों की ऐसी किस्मों का चयन करें जो कम समय में पककर तैयार हो जाती हैं और सूखे की स्थिति को बर्दाश्त कर सकती हैं।

सरकारी योजनाओं और तकनीक का लाभ

मेघदूत और दामिनी जैसे ऐप्स का इस्तेमाल करें ताकि बारिश की सटीक जानकारी पहले से मिल सके और उसी अनुसार बुवाई या सिंचाई की जा सके।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY): मौसम की अनिश्चितता को देखते हुए अपनी फसल का बीमा अवश्य कराएं, ताकि सूखे या बाढ़ की स्थिति में आर्थिक नुकसान की भरपाई हो सके।

Amit Kumar

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अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।

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