अवैध संबंध से मां बनी पत्नी, फिर पहुंची कोर्ट; मी लॉर्ड बोले- मर्दों की भी गरिमा होती है
केरल हाईकोर्ट ने जन्म प्रमाण पत्र पर कानूनी पति की जगह पत्नी के प्रेमी का नाम दर्ज करने की अनुमति दी। कोर्ट ने कहा कि पुरुषों की भी गरिमा और आत्मसम्मान होता है, पत्नी के धोखे के मामलों में समाज को उनके साथ भी खड़ा होना चाहिए।

पुरुषों के अधिकारों की पैरवी करते हुए केरल हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि पुरुषों की भी अपनी गरिमा, गर्व, आत्मसम्मान और एक सामाजिक पहचान होती है। अदालत ने यह टिप्पणी एक विवाहित महिला और उसके प्रेमी को उनके रिश्ते से पैदा हुई बच्ची के जन्म प्रमाण पत्र में पिता का नाम बदलने की अनुमति देते हुए की। कोर्ट ने बच्ची के जैविक पिता (प्रेमी) का नाम, महिला के कानूनी पति के नाम की जगह दर्ज करने का आदेश दिया है।
कोर्ट की बेबाक राय और पुरुषों का समर्थन
जस्टिस पीवी कुन्हीकृष्णन की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए इसे एक दुर्भाग्यपूर्ण व्यक्ति की दुखद कहानी बताया, जिसकी पत्नी ने शादी के अस्तित्व में रहते हुए किसी अन्य पुरुष के साथ संबंध बनाए और एक बच्ची को जन्म दिया। कोर्ट ने समाज के दोहरे रवैये पर टिप्पणी करते हुए कहा- आमतौर पर अगर किसी पति के किसी अन्य महिला के साथ अवैध संबंध होते हैं, तो यह एक बड़ा मुद्दा बन जाता है और पत्नी तथा उसके रिश्तेदारों द्वारा उस व्यक्ति को हर संभव तरीके से अपमानित किया जाता है। बेशक, ऐसे मामलों में पत्नी की शिकायतें जायज हो सकती हैं और पति इसका हकदार भी हो सकता है। लेकिन मेरी राय है कि ऐसी स्थिति में (जब पत्नी गलत हो), तो समाज को पुरुषों के साथ भी खड़ा होना चाहिए, क्योंकि उनकी भी गरिमा, गर्व, आत्मसम्मान और सामाजिक पहचान होती है।
जज ने आगे कहा कि हमारी संस्कृति में वैवाहिक निष्ठा का बहुत महत्व है। ऐसे में, जब कोई पत्नी ऐसा कदम उठाती है, तो पति सार्वजनिक रूप से खुद को अपमानित महसूस कर सकता है, मानो उसके पौरुष और प्रतिष्ठा का मज़ाक उड़ाया गया हो।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता महिला की पहली शादी से एक बेटा है। उसका कानूनी पति बेंगलुरु में एकाउंटेंट का काम करता था। पत्नी का आरोप था कि पति परिवार की ठीक से देखभाल नहीं कर रहा था और उसकी जरूरतें पूरी नहीं कर रहा था।
अवैध संबंध और बच्ची का जन्म
शादी बरकरार रहने के दौरान ही महिला ने एक अन्य पुरुष के साथ संबंध बनाए, जिससे एक बच्ची का जन्म हुआ। हालांकि, बच्ची के जन्म प्रमाण पत्र पर कानूनी पति का नाम ही पिता के तौर पर दर्ज किया गया और बच्ची उसी के साथ रहने लगी।
जब सच्चाई सामने आई और पति ने बच्ची के जैविक पिता होने से इनकार किया, तो घर में तीखी बहस और झगड़े शुरू हो गए। इसके बाद महिला घर छोड़कर चली गई और बाद में पति-पत्नी ने आपसी सहमति से तलाक ले लिया।
कानूनी लड़ाई
तलाक के बाद, मां और उसका प्रेमी त्रिशूर नगर निगम गए ताकि बच्ची के जन्म प्रमाण पत्र पर असली पिता (प्रेमी) का नाम दर्ज कराया जा सके। लेकिन संबंधित प्राधिकरण ने उनका अनुरोध खारिज कर दिया। इसके बाद मां, उसके प्रेमी और नाबालिग बच्ची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पहले पति के 'सज्जन व्यवहार' की तारीफ
अदालत ने इस बात पर विशेष गौर किया कि यह जानने के बावजूद कि बच्ची किसी और पुरुष की है, पहले पति ने कभी जन्म प्रमाण पत्र से अपना नाम हटाने के लिए कोई याचिका दायर नहीं की। कोर्ट ने इसे पहले पति का 'सज्जनतापूर्ण व्यवहार' और बच्ची के प्रति उसका गहरा लगाव बताया। बच्ची तब तक उसी के साथ रहती थी जब तक कि पत्नी उसे लेकर अपने प्रेमी के पास नहीं चली गई।
कोर्ट का अंतिम फैसला
अदालत ने कहा कि वह नाबालिग बच्ची के भविष्य को देखते हुए इस याचिका को खारिज नहीं कर सकती। कोर्ट नहीं चाहता कि बालिग होने पर बच्ची को किसी तरह की कानूनी या सामाजिक शर्मिंदगी का सामना करना पड़े क्योंकि रजिस्टर में पिता का नाम सही दर्ज नहीं है। इसलिए, बच्ची के कल्याण और पहले पति के 'सज्जन रवैये' को ध्यान में रखते हुए, अदालत ने जन्म प्रमाण पत्र में सुधार की अनुमति दे दी।
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