बाहर से ज्यादा अंदर कमा रहे; कैदियों की मजदूरी बढ़ाने के खिलाफ PIL, HC क्या बोला?
केरल हाई कोर्ट ने उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें जेल में बंद कैदियों की मजदूरी बढ़ाने के फैसले को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि कैदियों को जो मजदूरी बढ़ाकर दी जा रही है, वह कई आजाद नागरिकों से कहीं ज्यादा है।

जेल में बंद कैदियों को उनके काम के बदले कितनी मजदूरी मिलनी चाहिए? इस सवाल के सिलसिले में लगी जनहित याचिका को केरल हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया है। दरअसल केरल राज्य सरकार ने कुछ दिन पहले कैदियों की दैनिक मजदूरी में वृद्धि की थी, सरकार के इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी, जिसे हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और न्यायमूर्ति श्याम कुमार वीएम की खंडपीठ ने मजदूरी बढ़ाने संबंधी सरकारी अधिसूचना में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए याचिका को खारिज कर दिया।
यह पूरा मामला राज्य सरकार द्वारा जेल में बंद कैदियों की मजदूरी बढ़ाने के बाद शुरू हुआ। राज्य सरकार की तरफ से जारी अधिसूचना के मुताबिक जेल में बंद कुशल श्रमिकों को एक दिन की मजदूरी के बदले 620 रुपए, अर्ध कुशल को 560 रुपए और अकुशल मजदूरों को 530 रुपए मिलेंगे। गौरतलब है कि इससे पहले कैदियों को 63 रुपए से लेकर 168 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से मजदूरी मिलती थी।
सरकार द्वारा 9 जनवरी की जारी की गई इस अधिसूचना के खिलाफ केरल हाई कोर्ट में वकील अजीश कलाथिल गोपी ने याचिका दायर की। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि जेल में बंद कैदियों की मजदूरी में बढ़ोतरी से उनकी आय करीब 15 हजार से 18 हजार रुपए प्रतिमाह हो जाएगी, जो कि बाहर काम करने वाले लोगों से ज्यादा है। वह भी ऐसी स्थिति में जब जेल के अंदर प्रशासन इनके भोजन, आवास, कपड़ों और बुनियादी जरूरतों का पूरा ध्यान रखता है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि इतना सब कुछ होने से कैदियों को आजाद नागरिकों से ज्यादा लाभ मिल रहा है।
याचिका में कैदियों की मजदूरी की वृद्धि की तुलना मनरेगा मजदूरों, आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और यहां तक कि निजी क्षेत्र में प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ की आय से की गई, जिनमें से कई की कमाई इससे कम है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करती है। याचिका में यह भी कहा गया कि मजदूरी में यह बढ़ोतरी एक तरह की ‘आर्थिक उलटबासी’पैदा करती है, यानी ऐसी स्थिति जहां जेल में रहना ईमानदार रोजगार की तुलना में अधिक आर्थिक रूप से लाभकारी हो जाता है।
हालांकि हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता के इन तर्कों सो अनसुना करके याचिका को खारिज कर दिया। इससे पहले मौखिक टिप्पणी करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "जेल उन्हें विभिन्न कार्यों में लगाती है और वे इसके बदले पारिश्रमिक कमाते हैं। अन्य लोगों की तरह उन्हें घूमने-फिरने की स्वतंत्रता नहीं होती। वे जेल से बाहर नहीं जा सकते। इन्हीं कारणों से यह व्यवस्था है। हमें इसमें हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखता। यह एक नीतिगत निर्णय है।
इस पर याचिकाकर्ता ने जवाब दिया कि भले ही नीतिगत निर्णय न्यायिक समीक्षा से परे हों, लेकिन जेल श्रम का उद्देश्य सुधारात्मक होना चाहिए, न कि पारंपरिक अर्थों में रोजगार। कैदियों को दी जाने वाली मजदूरी उन्हें कानून का पालन करने वाले नागरिकों के बराबर या उनसे ऊपर आर्थिक स्थिति में नहीं रखनी चाहिए। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “उन्हें यह फ्री में नहीं मिल रहा है। वे जेल के भीतर काम कर रहे हैं और उसी के तहत उन्हें मजदूरी मिल रही है। यह योजना इसलिए है ताकि रिहाई के बाद उनका पुनर्वास हो सके।”
इसके बाद हाई कोर्ट ने साफ किया कि वह सरकार के इस फैसले में हस्तक्षेप नहीं करेगा और याचिका को खारिज कर दिया।
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Upendra Thapakउपेंद्र ने डिजिटल पत्रकारिता की शुरुआत लाइव हिन्दुस्तान से की है। पिछले एक साल से वे होम टीम में कंटेंट प्रोड्यूसर के तौर पर कार्यरत हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव 2024, ऑपरेशन सिंदूर और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की कवरेज की है। पत्रकारिता की पढ़ाई भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली (बैच 2023-24) से पूरी करने वाले उपेंद्र को इतिहास, अंतर्राष्ट्रीय संबंध, राजनीति, खेल, विज्ञान और समसामयिक घटनाओं से जुड़े विषयों में गहरी रुचि है। स्नातक स्तर पर बायोटेक्नोलॉजी की पढ़ाई करने के कारण उन्हें मेडिकल और वैज्ञानिक विषयों की भाषा की भी अच्छी समझ है। वे मूल रूप से मध्यप्रदेश के भिंड जिले के निवासी हैं।
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