केजरीवाल ने जिसे दी राघव चड्ढा को रोकने की जिम्मेदारी वही बागी निकला, 23 अप्रैल की रात को क्या हुआ

Himanshu Jha लाइव हिन्दुस्तान
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संदीप पाठक का AAP में उदय किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएचडी और IIT-दिल्ली में असिस्टेंट प्रोफेसर रह चुके पाठक करीब एक दशक पहले राजनीति में आए थे।

केजरीवाल ने जिसे दी राघव चड्ढा को रोकने की जिम्मेदारी वही बागी निकला, 23 अप्रैल की रात को क्या हुआ

कभी अरविंद केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद और पर्दे के पीछे रहकर रणनीति बनाने वाले संदीप पाठक अब सुर्खियों में हैं। जिस संदीप पाठक पर केजरीवाल आंख मूंदकर भरोसा करते थे, उन्होंने न केवल पार्टी छोड़ी बल्कि अपने साथ 7 राज्यसभा सांसदों को लेकर भाजपा का दामन थाम लिया। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस बगावत के ऐलान से ठीक एक शाम पहले अरविंद केजरीवाल और संदीप पाठक के बीच दो घंटे लंबी बैठक हुई थी। केजरीवाल को खबर मिली थी कि पार्टी में कुछ सांसद बगावत कर सकते हैं। उन्होंने पाठक को इसी बगावत को शांत करने की जिम्मेदारी सौंपी थी।

संदीप पाठक अब तक लाइमलाइट से दूर रहकर पर्दे के पीछे काम करना पसंद करते थे, अचानक चर्चा के केंद्र में हैं। उनकी बगावत का दर्द केजरीवाल के लिए कितना गहरा है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पंजाब की AAP सरकार द्वारा पाठक के खिलाफ दो एफआईआर (FIR) दर्ज किए जाने की खबरें सामने आ रही हैं।

भरोसे की वो आखिरी रात

इस पूरी कहानी का सबसे चौंकाने वाला पहलू वह मुलाकात है, जो बगावत के सार्वजनिक होने से ठीक एक शाम पहले हुई थी। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 23 अप्रैल की शाम अरविंद केजरीवाल अपने फिरोजशाह रोड स्थित आवास पर संदीप पाठक के साथ दो घंटे तक लंबी बैठक कर रहे थे। विडंबना यह है कि उस बैठक का एजेंडा ही यह था कि पार्टी में पनप रही बगावत को कैसे रोका जाए।

केजरीवाल ने संगठन महासचिव होने के नाते संदीप पाठक को यह जिम्मेदारी सौंपी थी कि वे उन नेताओं को मनाएं जो बीजेपी जाने की सोच रहे हैं। पाठक अपने साथ डेटा, सर्वे की लिस्ट और पार्टी पदाधिकारियों के संपर्क विवरण लेकर आए थे। उन्हें यह काम दिया गया था कि वे बागी राज्यसभा सांसदों को पार्टी में बने रहने के लिए राजी करें। लेकिन केजरीवाल को जरा भी भनक नहीं थी कि जिसे वे आग बुझाने की जिम्मेदारी दे रहे हैं, वह खुद पाला बदलने की तैयारी कर चुका है। अगले ही दिन जब पाठक, राघव चड्ढा और अशोक मित्तल जैसे दिग्गजों के साथ बीजेपी में शामिल होने के लिए मंच पर खड़े हुए केजरीवाल दंग रह गए।

IIT प्रोफेसर से राजनीति के चाणक्य तक का सफर

संदीप पाठक का AAP में उदय किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएचडी और IIT-दिल्ली में असिस्टेंट प्रोफेसर रह चुके पाठक करीब एक दशक पहले राजनीति में आए थे। 2015 में जब केजरीवाल दिल्ली में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आए, तब एक प्रभावशाली नेता ने पाठक का परिचय उनसे कराया था। धुंधले बाल, चश्मा और सफेद शर्ट पसंद करने वाले पाठक अपनी बातों में आंकड़ों और डेटा को प्राथमिकता देते थे। केजरीवाल को उनका यह अंदाज बेहद पसंद आया। जल्द ही पाठक ने केजरीवाल के दिल और दिमाग में अपनी जगह बना ली। उन्हें AAP का पहला राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बनाया गया।

पंजाब की जीत और नंबर गेम के माहिर

संदीप पाठक की सबसे बड़ी उपलब्धि पंजाब चुनाव रही। उन्होंने केजरीवाल से इच्छा जताई थी कि वे पंजाब में जमीनी स्तर पर सर्वे करना चाहते हैं। उनके डेटा और विश्लेषण का ही नतीजा था कि AAP ने पंजाब में ऐतिहासिक जीत दर्ज की। इसके बाद 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी उनके आंकड़ों ने पार्टी की रणनीति बनाने में मदद की। इनाम के तौर पर केजरीवाल ने उन्हें 2022 में राज्यसभा भेजा।

क्यों आई रिश्तों में खटास?

हर कामयाबी के साथ नाकामयाबी भी जुड़ी होती है। जब तक जीत मिलती रही, पाठक पार्टी की आंख के तारे बने रहे। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में दिल्ली में पार्टी की करारी हार और फिर 2023 के MCD चुनाव व 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में हार का ठीकरा पाठक के सिर ही फूटा। पार्टी के भीतर यह सवाल उठने लगे थे कि लगातार हार के बावजूद पाठक अपने पद पर क्यों बने हुए हैं? कार्यकर्ताओं का उन पर से भरोसा कम होने लगा था। सूत्रों की मानें तो पाठक को भी आभास हो गया था कि अब पार्टी में उनके दिन गिने-चुने बचे हैं। इसके साथ ही केंद्रीय एजेंसियों के डर और छत्तीसगढ़ में उनके परिवार के पुराने बीजेपी कनेक्शन ने भी इस बगावत में ईंधन का काम किया।

एक दिलचस्प और कड़वा संयोग

केजरीवाल के लिए यह बगावत निजी तौर पर भी बहुत कड़वी रही है। जिस फिरोजशाह रोड वाले घर में केजरीवाल और पाठक की आखिरी बैठक हुई थी, वह घर दरअसल बागी सांसद अशोक मित्तल के नाम पर आवंटित था। मित्तल ने केजरीवाल को वहां रहने की जगह तब दी थी जब सत्ता से बाहर होने के बाद वे घर ढूंढ रहे थे। जिस दिन केजरीवाल अपने नए घर में शिफ्ट हो रहे थे, ठीक उसी दिन उनके सबसे खास साथियों ने उन्हें छोड़ दिया।

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Himanshu Jha

लेखक के बारे में

Himanshu Jha

बिहार के दरभंगा जिले से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु शेखर झा डिजिटल मीडिया जगत का एक जाना-माना नाम हैं। विज्ञान पृष्ठभूमि से होने के बावजूद (BCA और MCA), पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून के कारण उन्होंने IGNOU से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया और मीडिया को ही अपना कर्मक्षेत्र चुना।


एक दशक से भी अधिक समय का अनुभव रखने वाले हिमांशु ने देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों जैसे दैनिक भास्कर, न्यूज़-18 और ज़ी न्यूज़ में अपनी सेवाएं दी हैं। वर्तमान में, वे वर्ष 2019 से लाइव हिन्दुस्तान के साथ जुड़े हुए हैं।


हिमांशु की पहचान विशेष रूप से राजनीति के विश्लेषक के तौर पर होती है। उन्हें बिहार की क्षेत्रीय राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति की गहरी और बारीक समझ है। एक पत्रकार के रूप में उन्होंने 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों और कई विधानसभा चुनावों को बेहद करीब से कवर किया है, जो उनके वृहद अनुभव और राजनीतिक दृष्टि को दर्शाता है।


काम के इतर, हिमांशु को सिनेमा का विशेष शौक है। वे विशेष रूप से सियासी और क्राइम बेस्ड वेब सीरीज़ देखना पसंद करते हैं, जो कहीं न कहीं समाज और सत्ता के समीकरणों को समझने की उनकी जिज्ञासा को भी प्रदर्शित करता है।

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