महाभियोग का खौफ! जस्टिस वर्मा से पहले केवल इन 2 जजों ने दिया था इस्तीफा, मिलता है फायदा
जस्टिस यशवंत वर्मा ने संसद में महाभियोग की प्रक्रिया पूरी होने से ठीक पहले इस्तीफा दे दिया है। भारत के न्यायिक इतिहास में ऐसा करने वाले वे तीसरे हाई कोर्ट जज हैं। जानिए 15 करोड़ कैश मिलने से लेकर इस्तीफे तक का पूरा मामला।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन पर 'महाभियोग' चलने वाला था। यानी संसद द्वारा जज को पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू होने वाली थी। 9 अप्रैल जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपना इस्तीफा सीधे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपा। इस इस्तीफे के साथ ही उन पर संसद में चल रही महाभियोग की कार्यवाही भी बीच में ही रुक गई है। भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में यह केवल तीसरी बार है जब किसी सिटिंग जज ने महाभियोग की प्रक्रिया पूरी होने से ठीक पहले इस्तीफा दिया है।
पहले भी हो चुके हैं ऐसे मामले
भारतीय संविधान में किसी भी जज को हटाना एक बेहद जटिल प्रक्रिया है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव का पास होना जरूरी है। आज तक भारत में किसी भी जज को सफलतापूर्वक महाभियोग के जरिए नहीं हटाया जा सका है। जस्टिस वर्मा से पहले केवल दो जजों के मामले में यह प्रक्रिया इतने आगे तक बढ़ी थी।
जस्टिस सौमित्र सेन (कलकत्ता हाई कोर्ट): 2011 में उन पर फंड की हेराफेरी के आरोप लगे थे। जांच में दोषी पाए जाने के बाद राज्यसभा ने उन्हें हटाने का प्रस्ताव भारी बहुमत से पास कर दिया था। लेकिन लोकसभा में वोटिंग से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
जस्टिस पी.डी. दिनाकरन (सिक्किम हाई कोर्ट): 2011 में उन पर भी कदाचार के आरोप लगे थे। संसद द्वारा उनके खिलाफ जांच समिति बनाई गई थी। हालांकि, समिति की कार्रवाई ठीक से शुरू होने से पहले ही उन्होंने जांच प्रक्रिया पर अविश्वास जताते हुए इस्तीफा दे दिया था।
मिलता है फायदा
इस्तीफा देने से महाभियोग की प्रक्रिया वहीं रद्द हो जाती है। चूंकि कानून में ऐसा कोई नियम नहीं है कि महाभियोग से पहले इस्तीफा देने वाले जज के रिटायरमेंट बेनिफिट्स (पेंशन आदि) रोक दिए जाएं, इसलिए उन्हें यह सुविधाएं मिलती रहती हैं। यानी इस्तीफा देने के बाद उन्हें सारे लाभ मिलते हैं जो एक रिटायर जज को मिलने चाहिए।
जस्टिस यशवंत वर्मा का पूरा मामला क्या है?
यह विवाद मार्च 2025 का है, जब जस्टिस यशवंत वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट में जज थे। उनके दिल्ली स्थित सरकारी बंगले के एक स्टोररूम में अचानक आग लग गई थी। आग बुझाने के दौरान पुलिस और फायर ब्रिगेड को वहां से भारी मात्रा में जला और अधजला कैश (लगभग 15 करोड़ रुपये) मिला था।
जस्टिस वर्मा ने हमेशा से इस बात से इनकार किया कि वह पैसा उनका था। उन्होंने तर्क दिया कि घटना के समय वह शहर से बाहर एक दूरदराज इलाके में छुट्टियां मना रहे थे और कोई भी व्यक्ति अपना कैश किसी ऐसे स्टोररूम में नहीं रखेगा जहां किसी की भी पहुंच हो।
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की एक 'इन-हाउस कमेटी' ने इसकी जांच की। जांच के बाद अप्रैल 2025 में उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट ट्रांसफर कर दिया गया और उनसे न्यायिक काम (मुकदमे सुनने का अधिकार) वापस ले लिया गया।
जुलाई 2025 में लोकसभा के 100 से ज्यादा सांसदों ने उन्हें पद से हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव पेश किया। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) ने आरोपों की जांच के लिए जजों की एक तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया।
जांच समिति अपनी रिपोर्ट पूरी करने ही वाली थी कि जस्टिस वर्मा ने 13 पन्नों का एक विस्तृत पत्र लिखकर समिति से खुद को अलग कर लिया। उनका आरोप था कि यह पूरी जांच प्रक्रिया 'अनुचित' और 'पूर्वाग्रह से ग्रसित' है, जिसमें उन्हें बिना किसी ठोस सबूत के सिर्फ शक के आधार पर फंसाया जा रहा है और अपना बचाव करने का सही मौका नहीं दिया गया।
अब आगे क्या होगा?
कानूनी और संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक, जब कोई जज महाभियोग की प्रक्रिया पूरी होने से पहले इस्तीफा दे देता है, तो उसे हटाने की संसदीय प्रक्रिया स्वतः ही निरस्त मान ली जाती है। इसका सबसे बड़ा परिणाम यह होता है कि जज को रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले सभी लाभ (जैसे पेंशन आदि) मिलते रहते हैं, क्योंकि वर्तमान कानून में इस्तीफे के बाद इन सुविधाओं को रोकने का कोई सीधा प्रावधान नहीं है। जस्टिस वर्मा के मामले में भी यह जांच अब यहीं समाप्त हो जाएगी।
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