
अंतिम पंक्ति में खड़े लोगों तक सबसे पहले पहुंचे न्याय; CJI बनने से पहले जस्टिस सूर्यकांत ने कही बड़ी बात
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि कहानी अभी पूरी नहीं हुई है। जैसे-जैसे डिजिटल बहिष्कार, विस्थापन, जलवायु परिवर्तन और अंतरराष्ट्रीय प्रवास जैसी नयी चुनौतियां सामने आ रही हैं, हमें काम और पहुंच को आधुनिक बनाना होगा और समावेशन करना होगा।
देश के अगले मुख्य न्यायाधीश (Next CJI) बनने जा रहे जस्टिस सूर्यकांत ने दो टूक कहा है कि समाज में सबसे अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सबसे पहले न्याय पहुँचना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसे सुनिश्चित करने में कानूनी सहायता बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने आगे कहा कि भारत में कानूनी सहायता प्राधिकरण मदद माँगे जाने का इंतज़ार करने के बजाय, जरूरतमंदों तक न्याय पहुँचाने के लिए सक्रिय कदम उठाते हैं।

पड़ोसी देश श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में कॉमनवेल्थ लीगल एजुकेशन एसोसिएशन (CLEA) के सहयोग से बार एसोसिएशन ऑफ़ श्रीलंका (BASL) द्वारा आयोजित मानवाधिकार व्याख्यान के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए जस्टिस सूर्यकांत ने गुरुवार को कहा कि राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) और राज्य, जिला तथा तालुका विधिक सेवा प्राधिकरणों के अपने त्रि-स्तरीय नेटवर्क के माध्यम से, भारत ने दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे समावेशी कानूनी सहायता प्रणालियों में से एक का निर्माण किया है। जस्टिस सूर्यकांत राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) के कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं।
…तो संविधान का वादा फिर से जीवंत हो उठता है
उन्होंने कहा, “न्याय सबसे पहले अंतिम व्यक्ति तक पहुँचना चाहिए। हर बार जब कोई कैदी कानूनी सहायता याचिका के माध्यम से आज़ाद होता है, हर बार जब कोई विधवा वर्षों की उपेक्षा के बाद अपनी पेंशन प्राप्त करती है, और हर बार जब कानून का उल्लंघन करने वाले किसी बच्चे को दंड के बजाय सुधार की ओर निर्देशित किया जाता है - तो संविधान का वादा फिर से जीवंत हो उठता है।”
न्याय को वास्तविक बनाया जा सकता है
“हाशिये पर पड़े लोगों और अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों की प्राप्ति के लिए कानूनी सहायता प्रणाली को मजबूत करना: भारतीय केस स्टडी” विषय पर बोलते हुए, जस्टिस सूर्यकांत ने न्याय के प्राचीन सिद्धांतों से लेकर आधुनिक संस्थागत ढांचे तक भारत के कानूनी दर्शन पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, ‘‘भारत के कानूनी सहायता आंदोलन की कहानी, अपने मूल में, एक लोकतंत्र की अंतरात्मा की कहानी है। यह इस बात का प्रमाण है कि एक व्यापक और जटिल समाज में भी, जब दूरदर्शिता के साथ संस्थागत इच्छाशक्ति का मेल हो, तो न्याय को वास्तविक बनाया जा सकता है।’’
यह कहानी अभी पूरी नहीं हुई
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, ‘‘फिर भी, यह कहानी अभी पूरी नहीं हुई है। जैसे-जैसे डिजिटल बहिष्कार, विस्थापन, जलवायु परिवर्तन और अंतरराष्ट्रीय प्रवास जैसी नयी चुनौतियां सामने आ रही हैं, हमारा काम और अधिक नवाचार करना, पहुंच को आधुनिक बनाना और समावेशन को गहरा करना होगा। न्याय को समाज के साथ विकसित होना होगा, अन्यथा उसे अपनी ही छाया तले दब जाने का खतरा होगा।’’
भारत का अनुभव अनुकरणीय मॉडल
उन्होंने कहा कि ‘‘धर्म’’ के प्राचीन सिद्धांतों से लेकर नालसा की आधुनिक वास्तुकला तक, भारत की यात्रा मानव गरिमा में स्थायी विश्वास और इस विचार के प्रति अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाती है कि न्याय सबसे पहले अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि श्रीलंका और पूरे राष्ट्रमंडल के लिए भारत का अनुभव अनुकरणीय मॉडल नहीं, बल्कि प्रेरणादायी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश ने कहा, ‘‘जब न्याय सचमुच सुलभ हो जाएगा - जब हर नागरिक, चाहे उसके पास कोई साधन न हो, कानून के समक्ष मजबूती से खड़ा हो सकेगा - और केवल तभी, हम कह सकते हैं कि स्वतंत्रता ने अपना वास्तविक उद्देश्य पूरा कर लिया है।’’ (भाषा इनपुट्स के साथ)





