ग्लोबल इकोनॉमी के लिए जहर है टैरिफ, फ्री ट्रेड से ही बचेगी दुनिया; जर्मनी के निशाने पर कौन?
वैश्विक व्यापार तनाव और टैरिफ युद्ध के बीच जर्मनी के पर्यावरण, जलवायु कार्रवाई एवं प्रकृति संरक्षण मंत्रालय के राज्य सचिव जोचेन फ्लासबार्थ ने बड़ा बयान दिया है। भारत की अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने कहा कि बढ़ते टैरिफ विश्व अर्थव्यवस्था को जहर दे रहे हैं,

वैश्विक व्यापार तनाव और टैरिफ युद्ध के बीच जर्मनी के पर्यावरण, जलवायु कार्रवाई एवं प्रकृति संरक्षण मंत्रालय के राज्य सचिव जोचेन फ्लासबार्थ ने बड़ा बयान दिया है। भारत की अपनी यात्रा के दौरान न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि बढ़ते टैरिफ विश्व अर्थव्यवस्था को जहर दे रहे हैं, जबकि मुक्त व्यापार ही जलवायु परिवर्तन से निपटने और सतत विकास की असली कुंजी है। युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव और व्यापार प्रतिबंधों से ध्यान जलवायु संकट से हट रहा है, और ऐसे में भारत-जर्मनी जैसे देशों के बीच मजबूत सहयोग जरूरी है। वहीं, फ्लासबार्थ से जब पूछा गया कि अमेरिका जैसे कुछ देशों द्वारा लगाए गए टैरिफ और व्यापार नीतियां वैश्विक जलवायु सहयोग तथा हरित आपूर्ति श्रृंखला को कैसे प्रभावित कर रही हैं? इस पर उन्होंने कहा कि यह सब भयावह है। युद्ध भयावह होते हैं। वे वैश्विक परिवर्तन, जलवायु और जैव विविधता से ध्यान हटाकर सैन्य क्षेत्र की ओर ले जा रहे हैं। और टैरिफ हमारी विश्व अर्थव्यवस्था को जहर दे रहे हैं।
बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अपने व्यापक टैरिफ को रद्द करने वाले अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अपनाए गए कड़े रुख के संदर्भ में फ्लासबार्थ की ओर से यह बयान सामने आया है। गौरतलब है कि एससी के फैसले के कुछ दिनों बाद ट्रंप ने वैश्विक टैरिफ को 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया, जबकि दुनिया भर के व्यवसायों और सरकारों ने वाशिंगटन द्वारा पहले से एकत्र किए गए अनुमानित 133 बिलियन अमेरिकी डॉलर की वापसी की मांग की है।
भारत और जर्मनी जैसे देशों के बीच सहयोग महत्वपूर्ण
इस दौरान फ्लासबार्थ ने कहा कि जलवायु संबंधी महत्वाकांक्षाओं को सही दिशा में बनाए रखने के लिए भारत और जर्मनी जैसे देशों के बीच सहयोग बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने आगे कहा कि मेरा मानना है कि भारत और जर्मनी के बीच शांतिपूर्वक बैठकर सहयोग के अवसरों का अवलोकन करना महत्वपूर्ण है। इसलिए टैरिफ बाधाएं बुरी हैं, और मुक्त व्यापार तथा सतत विकास, यानी आर्थिक विकास, एक साथ मिलकर एक प्रमुख समाधान हैं। फ्लासबार्थ ने कहा कि भारत की उनकी वर्तमान यात्रा का उद्देश्य द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करना है, खासकर ऐसे समय में जब उनके अनुसार, "अमेरिका बहुपक्षीय परिदृश्य से गायब हो रहा है"। उन्होंने जोर दिया कि हालांकि इस यात्रा के दौरान किसी विशिष्ट समझौते की उम्मीद नहीं है, लेकिन निरंतर बातचीत बहुत महत्वपूर्ण है।
मुक्त व्यापार समझौते से होगा फायदा
उन्होंने भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते और इसके पर्यावरणीय महत्व को लेकर नए सिरे से गति मिलने की ओर इशारा किया। जलवायु सहयोग के विषय पर, फ्लासबार्थ ने 2022 में शुरू की गई भारत-जर्मनी हरित और सतत विकास साझेदारी (जीएसडीपी) के तहत हुई प्रगति पर संतोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस साझेदारी ने सहयोग के विभिन्न पहलुओं (स्थिरता, जलवायु और पर्यावरण ) को एक ही छत्र के नीचे समेकित किया है। उन्होंने कहा कि नवीकरणीय ऊर्जा, जलवायु अनुकूलन, जैव विविधता, प्रकृति-आधारित समाधान, कृषि और शहरी विकास के क्षेत्र में बहुत कुछ हुआ है। साथ ही यह भी कहा कि दोनों पक्ष इस साझेदारी को सकारात्मक रूप से देखते हैं।
हालांकि, उन्होंने स्वीकार किया कि अभी और भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है, विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन को कम करने, अनुकूलन और जैव विविधता के लक्ष्यों को एकीकृत करने के क्षेत्र में। प्रकृति-आधारित समाधानों को एक प्रमुख क्षेत्र बताते हुए, उन्होंने दलदली भूमि को फिर से नम करने और वन-संबंधी पहलों में सहयोग का उल्लेख किया, लेकिन साथ ही कहा कि हम अभी भी उस स्तर से बहुत दूर हैं जहां हमें होना चाहिए।
एआई को लेकर चिंतिच दिखे फ्लासबार्थ
जलवायु वित्त पर एक प्रश्न के उत्तर में ( जो विकसित और विकासशील देशों के बीच निरंतर तनाव का विषय है ) फ्लासबार्थ ने कहा कि जर्मनी ने अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा किया है, और दक्षिण अफ्रीका तथा ब्राजील के साथ-साथ भारत को वैश्विक दक्षिण में अपने तीन प्रमुख भागीदारों में से एक के रूप में पहचाना है। उन्होंने कहा कि हमें बहुत खुशी है कि हम भारत का समर्थन करने में सक्षम हैं। लेकिन यह एकतरफा नहीं है। यह धीरे-धीरे एक वास्तविक साझेदारी में तब्दील हो रहा है। उन्होंने जोर दिया कि जलवायु परिवर्तन को कम करने और अनुकूलन के प्रयासों को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए निजी क्षेत्र का निवेश महत्वपूर्ण होगा, और कहा कि वास्तव में बड़ी धनराशि वहीं मौजूद है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता की पर्यावरणीय लागत के विषय पर (जो भारत के हाल ही में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट के दौरान चर्चित रहा) फ्लासबार्थ ने ऊर्जा खपत और विकिरण को लेकर चिंताओं को स्वीकार किया, लेकिन कहा कि दृष्टिकोण विकसित हुए हैं। उन्होंने कहा कि कुछ साल पहले की बात करें तो, डिजिटलीकरण और एआई के पर्यावरणीय पहलुओं को लेकर चिंता का विषय था क्योंकि इनमें ऊर्जा की खपत बहुत अधिक होती है। लेकिन अब स्थिति काफी बदल गई है। एआई का बुद्धिमानी से उपयोग करने के कई अवसर हैं। उन्होंने ऊर्जा खपत को व्यापक लाभों की तुलना में 'प्रबंधनीय' बताया। उन्होंने हरित डेटा अवसंरचना और ऊर्जा-कुशल एआई प्रणालियों पर भारत और जर्मनी के बीच सहयोग की संभावनाओं का भी संकेत दिया।
लेखक के बारे में
Devendra Kasyapदेवेन्द्र कश्यप पिछले 13 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अगस्त 2025 से वह लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं। संस्थान की होम टीम का वह एक अहम हिस्सा हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर उनकी पैनी नजर रहती है। वायरल कंटेंट के साथ-साथ लीक से हटकर और प्रभावशाली खबरों में उनकी विशेष रुचि है।
देवेन्द्र ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत वर्ष 2013 में महुआ न्यूज से की। करियर के शुरुआती दौर में उन्होंने बिहार की राजधानी पटना में रिपोर्टिंग की। इस दौरान राजनीति के साथ-साथ क्राइम और शिक्षा बीट पर भी काम किया। इसके बाद उन्होंने जी न्यूज (बिहार-झारखंड) में अपनी सेवाएं दीं। वर्ष 2015 में ईनाडु इंडिया के साथ डिजिटल मीडिया में कदम रखा। इसके बाद राजस्थान पत्रिका, ईटीवी भारत और नवभारत टाइम्स ऑनलाइन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में कार्य किया।
मूल रूप से बिहार के भोजपुरी बेल्ट रोहतास जिले के रहने वाले देवेन्द्र कश्यप ने अपनी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा पटना से प्राप्त की। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की और MCU भोपाल से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में प्रवास कर रहे हैं।
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