Explainer: जाते-जाते सिद्धारमैया ने मार दी सियासी लंघी; जाति वाले दांव से कांग्रेस और DK शिवकुमार दोनों को कैसे दे गए टेंशन?

लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
Follow us on Google News
share

Siddaramaiah Caste Move: बड़े कैनवास पर देखें तो सिद्धारमैया का यह कदम कांग्रेस की वैचारिक रणनीति के लिए एक पक्का खाका है क्योंकि  पार्टी आलाकमान लंबे समय से देशव्यापी जाति जनगणना का समर्थन करते रहे हैं।

जाते-जाते सिद्धारमैया ने मार दी सियासी लंघी; जाति वाले दांव से कांग्रेस और DK शिवकुमार दोनों को कैसे दे गए टेंशन?

Siddaramaiah Caste Move: कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने पद से आज (गुरुवार, 28 मई को) इस्तीफा दे दिया है। इसके साथ ही उन्होंने राज्य में नए मुख्यमंत्री के लिए राह आसान कर दी है। माना जा रहा है कि उनके डिप्टी रहे डीके शिवकुमार की इस पद पर ताजपोशी हो सकती है लेकिन जाते-जाते सिद्धारमैया ने जाति पर एक बड़ा दांव चल दिया है। 'अहिंदा' (कर्नाटक में अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और दलितों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला संक्षिप्त नाम) की बात करने वाले समाजवादी विचारधारा के सिद्धारमैया ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा तैयार की गई बहुप्रतीक्षित सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक सर्वेक्षण (जाति जनगणना) रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है।

उनके इस कदम को उनके राजनीतिक करियर का एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है, क्योंकि उनका 'अहिंदा' (अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित) राजनीति को मजबूत करने का पुराना लक्ष्य रहा है। इस रिपोर्ट में राज्य में पिछड़ों के कोटे को 32 फीसदी से बढ़ाकर 51 फीसदी तक करने का सुझाव दिया गया है। इस रिपोर्ट को स्वीकार करने के बाद यह रिपोर्ट अब सरकारी दस्तावेज बन चुकी है। ऐसे में आने वाले मुख्यमंत्री के लिए उसे नजरअंदाज करना मुश्किल हो सकता है क्योंकि ऐसा करने से राज्य की आबादी का एक बड़ा तबका नाराज हो सकता है। यही बात कांग्रेस और सिद्धा के उत्तराधिकारी के लिए टेंशन देने वाली है।

चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है

इतना ही नहीं, पद छोड़ने से ठीक पहले इस अत्यंत संवेदनशील दस्तावेज को औपचारिक रूप से स्वीकार करके, सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले सिद्धारमैया ने राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को मौलिक रूप से बदल दिया है। इस सर्वेक्षण रिपोर्ट में राज्य के हर समुदाय की सटीक जनसांख्यिकीय और आर्थिक स्थिति का खाका खींचा गया है। ताकि वह सरकारी रिकॉर्ड में मजबूती से दर्ज रह सके। लिहाजा, आने वाले कई वर्षों तक यह रिपोर्ट राज्य की नीतिगत रूपरेखा और चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।

आरक्षण की आग भड़क सकती है

इस सर्वेक्षण रिपोर्ट को अपने कार्यकाल के अंतिम दिन और अंतिम क्षण में स्वीकार कर सिद्धारमैया ने पिछड़े वर्गों और वंचित समूहों के मसीहा के रूप में अपनी राजनीतिक विरासत को और भी मज़बूत कर लिया है। इसके अलावा उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया है कि उनका उत्तराधिकारी इस दस्तावेज़ को आसानी से नज़रअंदाज़ न कर सके, क्योंकि अब यह एक आधिकारिक सरकारी संपत्ति बन चुका है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), दलित और अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी, पहले के अनुमानों की तुलना में कहीं अधिक है। ऐसे में राज्य की योजनाओं, सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक सीटों पर आरक्षण में आनुपातिक कोटा देने की ज़ोरदार मांग उठ सकती है, जिसका समाधान करना अगली सरकार के लिए एक दुरूह कार्य हो सकता है।

दूसरी जातियों की मांग तेज हो सकती है

अगली सरकार के लिए मुश्किल यह है कि इस रिपोर्ट में जिस जनसांख्यिकी बदलाव का उल्लेख किया गया है, वह राज्य में संभावित बदलाव के लिए उस पर दबाव पैदा कर सकता है और सरकार और प्रशासन को एक अत्यंत नाज़ुक नीतिगत संतुलन साधने की स्थिति में ला खड़ा कर सकता है। सर्वे रिपोर्ट की सिफारिशों को लागू करने के किसी भी कोशिश को प्रभावशाली समूहों की ओर से कड़ी कानूनी चुनौतियों का सामना भी करना पड़ सकता है और सरकार को इसी बहाने राजनीतिक विरोध का सामना भी करना पड़ सकता है। अब तक राज्य की राजनीति में लिंगायत और वोक्कालिगा जैसी प्रभावशाली जातियों का वर्चस्व माना जाता रहा है लेकिन इस रिपोर्ट के बाद दूसरी जातियों की मांग तेज हो सकती है।

राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा असर

कांग्रेस नेतृत्व के सामने एक बड़ी मुश्किल यह भी है कि जिस अहिंदा की बात सिद्धारमैया करते रहे हैं, उसी की बात राहुल गांधी से लेकर मल्लिकार्जुन खरगे तक भी दोहराते रहे हैं और जाति गणना से लेकर आरक्षण की सीमा बढ़ाने, आबादी के हिसाब से उन्हें आरक्षण देने और दलितों-अल्पसंख्यकों के कल्याण की बात करते रहे हैं। ऐसे में अगर कर्नाटक की अगली कांग्रेस सरकार ने इस रिपोर्ट की सिफारिशें मानने में आनाकानी की तो वह न सिर्फ राज्य सरकार के लिए बल्कि कांग्रेस नेतृत्व के लिए भी नुकसानदेह साबित हो सकता है।

डीके शिवकुमार के लिए भी टेंशन

अब सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा नए मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के लिए हो सकती है । वोक्कालिगा समुदाय से आने वाले शिवकुमार के लिए यह मुद्दा बेहद संवेदनशील माना जा रहा है, क्योंकि उनकी अपनी सामाजिक आधारभूमि इस सर्वे के कई पहलुओं पर सवाल उठाती रही है। ऐसे में उन्हें एक तरफ पार्टी की “सामाजिक न्याय” वाली लाइन को बनाए रखना होगा, तो दूसरी तरफ प्रभावशाली समुदायों की नाराज़गी भी संभालनी होगी।

इस खबर पर आपकी क्या राय है?

Pramod Praveen

लेखक के बारे में

Pramod Praveen

प्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।

अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।

और पढ़ें