स्कूलों में पढ़ाया जा रहा था अलगाववाद? जम्मू-कश्मीर में सरकार के एक आदेश से मंचा हड़कंप
जम्मू-कश्मीर सरकार ने स्कूलों व कोचिंग सेंटरों में किताबों की स्क्रीनिंग का आदेश दिया है। 'देशविरोधी' व आपत्तिजनक कंटेंट पर LG सख्त हैं, वहीं विपक्ष ने इसे इतिहास मिटाने की साजिश बताया है।

जम्मू-कश्मीर सरकार ने स्कूलों और कोचिंग सेंटरों में मौजूद किताबों को लेकर एक बड़ा और सख्त कदम उठाया है। प्रशासन ने कश्मीर और जम्मू डिविजन के सभी सरकारी व निजी स्कूलों के साथ-साथ कोचिंग संस्थानों को अपनी लाइब्रेरी और क्लासरूम में मौजूद सभी किताबों की गहन जांच करने का आदेश दिया है। इस आदेश का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी किताब में 'देशविरोधी', आपत्तिजनक या अलगाववाद को बढ़ावा देने वाली सामग्री ना हो। वहीं, इस फैसले पर राजनीतिक घमासान भी शुरू हो गया है और विपक्षी दलों ने इसे 'इतिहास मिटाने की साजिश' करार दिया है।
बड़ी बातें:
7 दिन का अल्टीमेटम: सभी स्कूल और कोचिंग संस्थानों के प्रमुखों को 7 दिन के भीतर चेकिंग पूरी करके एक सर्टिफिकेट देना होगा कि उनके परिसर में कोई भी आपत्तिजनक किताब नहीं है।
LG का कड़ा एक्शन: हाल ही में दो विवादित किताबों का मामला सामने आने के बाद उपराज्यपाल (LG) मनोज सिन्हा ने 8 शिक्षा अधिकारियों को निलंबित कर दिया है।
विवादित कंटेंट: जिन किताबों पर बवाल हुआ, उनमें जम्मू-कश्मीर को "भारत के कब्जे वाला कश्मीर (IOK)" बताया गया था और अलगाववादी मकबूल भट जैसे लोगों को महिमामंडित किया गया था।
UAPA के तहत केस: विवादित किताबों के प्रकाशकों और लेखकों को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है। पुलिस की काउंटर-इंटेलिजेंस विंग ने UAPA के तहत FIR दर्ज कर जम्मू में प्रकाशक के ठिकानों पर छापेमारी भी की है।
क्या है सरकार का आदेश?
स्कूल शिक्षा निदेशालय की ओर से जारी नए आदेश के मुताबिक, सभी संस्थानों के प्रमुखों (HOI) को अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाली लाइब्रेरी, स्टाफ रूम, क्लासरूम और दफ्तरों में रखी नई-पुरानी सभी किताबों की चेकिंग करनी होगी। आदेश में साफ कहा गया है कि कोई भी ऐसा कंटेंट नहीं होना चाहिए जो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाए, छात्रों के लिए अनुचित हो या जिससे राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचने की आशंका हो। साथ ही सभी सामग्री को नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के दिशा-निर्देशों के अनुरूप होना चाहिए।
अगर चेकिंग के दौरान कोई आपत्तिजनक किताब मिलती है, तो स्कूल प्रमुखों को किताब का शीर्षक, लेखक, पब्लिशर, छपने का साल और किताबों की संख्या की पूरी डिटेल बनाकर शीर्ष अधिकारियों को सौंपनी होगी। लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।
आखिर क्यों उठा यह कदम?
यह पूरा विवाद 'समग्र शिक्षा अभियान' के तहत स्कूलों में बांटी गई दो किताबों के सामने आने के बाद शुरू हुआ। ये किताबें हैं- पर्सनैलिटीज एंड लीजेंड्स ऑफ J&K (हिलाल अहमद और संतोष मीणा) और ग्रेट पर्सनैलिटीज ऑफ जम्मू एंड कश्मीर (डॉ. सुशांत गिरि)। इन किताबों में अलगाववादी नेताओं को सकारात्मक रूप से पेश किया गया था। बीजेपी ने इसके खिलाफ जोरदार प्रदर्शन करते हुए इसे 'एकेडमिक जिहाद' करार दिया था।
इसके बाद सरकार ने तुरंत एक्शन लेते हुए न सिर्फ इन दोनों किताबों को वापस मंगाया, बल्कि उपराज्यपाल ने पूरे केंद्र शासित प्रदेश के शिक्षण संस्थानों में ऑडिट के आदेश दे दिए। शिक्षा मंत्री सकीना इत्तू ने भी इस मामले को एक 'बड़ी साजिश' बताते हुए कहा था कि स्कूलों में ऐसी किताबें सप्लाई करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
विपक्ष ने आदेश को बताया 'खतरनाक'
किताबों की स्क्रीनिंग के इस आदेश पर विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के सांसद आगा सैयद रूहुल्लाह मेहदी ने इसे बेहद चिंताजनक बताते हुए कहा, "लाइब्रेरी का काम ज्ञान को सहेजना है, न कि राजनीतिक नैरेटिव सेट करना। किताबों को मिटाने से इतिहास नहीं मिटता, यह सिर्फ स्कॉलरशिप को गरीब बनाता है। वैचारिक नियंत्रण के चक्कर में अकादमिक स्वतंत्रता की बलि नहीं दी जानी चाहिए।"
वहीं, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) के नेता वहीद उर रहमान पारा ने इसे सामूहिक यादों को मिटाने की कोशिश बताया। उन्होंने कहा, "यह पाठ्यक्रम से हमारे इतिहास को मिटाने की एक साजिश है। यह भविष्य की पीढ़ियों से सवाल पूछने और अपने अतीत को समझने की क्षमता छीनने जैसा है।"
बाल अधिकार आयोग (NCPCR) तक पहुंचा मामला
इस बीच, लीगल रिसर्च और पब्लिक पॉलिसी के क्षेत्र में काम करने वाले संगठन 'रिसर्च एंड एडवोकेसी ग्रुप' (RAAG) ने नई दिल्ली में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) का दरवाजा खटखटाया है। संगठन का तर्क है कि सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी में आतंकियों या अलगाववादियों का महिमामंडन करने वाली किताबें बच्चों को पढ़ाना सिर्फ कोई प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि उनके अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। यह शिक्षा के अधिकार (RTE) कानून और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के भी खिलाफ है।
लेखक के बारे में
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अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।
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