ISI की बेहद खतरनाक साजिश, आतंकियों को भारत की पॉलिटिक्स में आने का मिला टास्क

Nisarg Dixit भाषा
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केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों के अनुसार, श्रीनगर पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए आतंकी समर्थकों से हुई पूछताछ में पता चला है कि उनमें से कुछ मुख्यधारा की राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों से जुड़े हुए थे।

ISI की बेहद खतरनाक साजिश, आतंकियों को भारत की पॉलिटिक्स में आने का मिला टास्क

भारत में अशांति फैलाने के मकसद से पाकिस्तान की तरफ से फिर नापाक कोशिशें की जा रही हैं। खबर हैं कि खुफिया एजेंसी आईएसआई ने अपने स्थापित ओवर ग्राउंड वर्कर्स (OGW) नेटवर्क को मुख्यधारा की राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों में घुसपैठ करने के निर्देश दिए हैं। अधिकारियों ने रविवार को यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है, ताकि सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई और आतंकी घटनाओं की जांच से बचा जा सके।

फिर आतंकवाद बढ़ाने की कोशिश

उन्होंने बताया कि आईएसआई अपनी रणनीति को फिर से व्यवस्थित करने की कोशिश कर रही है और 1990 के दशक की शुरुआत में स्थापित आतंकी संगठनों को सक्रिय करने के लिए प्रयास कर रही है ताकि आतंकवादी हिंसा को 'स्थानीय स्वरूप' दिया जा सके और उसमें पाकिस्तान की प्रत्यक्ष भूमिका को छिपाया जा सके। यह तरीका ऐसे समय आजमाया जा रहा है जब पाकिस्तान पर धन शोधन और आतंकवाद के वित्तपोषण के लिए वैश्विक संस्था वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (FATF) की लगातार निगरानी बनी हुई है।

राजनीतिक दलों से जुड़े थे

केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों के अनुसार, श्रीनगर पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए आतंकी समर्थकों से हुई पूछताछ में पता चला है कि उनमें से कुछ मुख्यधारा की राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों से जुड़े हुए थे। अधिकारियों के अनुसार, आतंकी संगठनों को महत्वपूर्ण रसद सहायता, भर्ती और वित्तीय मदद उपलब्ध कराने वाले आतंक समर्थकों को वैध राजनीतिक ढांचे में घुसपैठ कराकर आईएसआई अपने नेटवर्क और सहयोगियों को सुरक्षा बलों के जारी अभियानों से बचाने की कोशिश कर रही है।

क्या है वजह

पहचान उजागर नहीं करने की शर्त पर बात करने वाले अधिकारियों ने कहा कि यह रणनीति हताशा की स्थिति से उपजी है। उनका कहना था कि सुरक्षा बलों के लगातार दबाव के कारण आईएसआई का पारंपरिक नेटवर्क बुरी तरह घिरा हुआ है। जबकि नए छद्म आतंकी संगठनों के लिए स्थानीय समर्थन आधार भी काफी हद तक सीमित हो गया है। इसलिए आईएसआई के पास विकल्प लगातार कम होते जा रहे हैं।

अधिकारियों के अनुसार, पुराने संगठनों को फिर से सक्रिय करने और उनके कार्यकर्ताओं को मुख्यधारा की राजनीति में शामिल करने के प्रयास के जरिए वे युवाओं की नई पीढ़ी को लुभाने के लिए ऐतिहासिक विमर्श का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं। साथ ही अपने नेटवर्क से जुड़े लोगों के लिए राजनीतिक संरक्षण और सुरक्षा भी हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं।

अधिकारियों के अनुसार, जब घेराबंदी और तलाशी अभियानों के दौरान किसी आतंकी समर्थक पर शिकंजा कसता है, तो वह कई बार बच निकलने की नाकाम कोशिश में राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का सदस्यता कार्ड दिखाने का सहारा लेता है।

1990 का है तरीका

सुरक्षा अधिकारियों ने बताया कि यह तरीका कई दशकों में विकसित हुआ है। 1990 के दशक के उत्तरार्ध में संदिग्ध लोग पुलिस कार्रवाई से बचने के लिए मतदाता पहचान पत्र का सहारा लेते थे। जबकि बाद के वर्षों में उन्होंने गहन जांच से बचने के लिए आधार कार्ड का इस्तेमाल करने की कोशिश की। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में किसी भी राजनीतिक दल के नेतृत्व ने कभी हस्तक्षेप कर संबंधित व्यक्तियों को बचाने की कोशिश नहीं की है।

एक संबंधित घटनाक्रम में, ऐसे तत्वों की गतिविधियां उन आतंकी संगठनों को फिर से सक्रिय करने में देखी गई हैं, जो 1993 के बाद काफी हद तक निष्क्रिय हो चुके थे।

सुरक्षा एजेंसियां ​​अब उन आतंकी समूहों के नामों के फिर से सामने आने पर कड़ी नजर रख रही हैं, जिन्होंने 1990 के दशक और 2000 के दशक के शुरुआती दौर में जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के शुरुआती और खूनी दौर को परिभाषित किया था। इनमें अल-उमर मुजाहिदीन, अल बदर और तहरीक-उल-मुजाहिदीन जैसे संगठन शामिल हैं।

अधिकारियों के अनुसार, इन पुराने और स्थानीय स्तर पर स्थापित संगठनों को फिर से सक्रिय करने की कोशिश के जरिए आईएसआई यह दिखाना चाहती है कि जम्मू-कश्मीर में आतंकी हिंसा कोई सीमा पार से संचालित छद्म युद्ध नहीं, बल्कि आंतरिक और स्थानीय स्तर पर निर्देशित है।

इन कोशिशों में जुटे

अधिकारियों ने बताया कि इन आतंकी संगठनों का शीर्ष नेतृत्व पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में सुरक्षित ठिकानों पर मौजूद है, जबकि उनका जमीनी स्तर का नेटवर्क प्रचार, धन जुटाने और कट्टरपंथ फैलाने की गतिविधियों को फिर से तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं।

अधिकारियों ने बताया कि केंद्रीय खुफिया एजेंसियां इन घटनाक्रम पर कड़ी नजर बनाए हुए हैं और दोबारा सक्रिय हो रहे आतंकी समर्थकों द्वारा खड़े किए जा रहे रसद एवं सहायता नेटवर्क को निष्क्रिय करने के लिए लगातार कार्रवाई कर रही हैं। अधिकारियों ने कहा कि इसके साथ ही सुरक्षा एजेंसियां आतंक समर्थकों द्वारा युवाओं को वैचारिक रूप से गुमराह करने और कट्टरपंथ की ओर धकेलने की कोशिशों का भी आक्रामक तरीके से मुकाबला कर रही हैं, क्योंकि क्षेत्र में कठिन प्रयासों से हासिल की गई शांति और स्थिरता को बनाए रखने के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण है।

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Nisarg Dixit

लेखक के बारे में

Nisarg Dixit

निसर्ग दीक्षित न्यूजरूम में करीब एक दशक का अनुभव लिए निसर्ग दीक्षित शोर से ज़्यादा सार पर भरोसा करते हैं। पिछले 4 साल से वह लाइव हिनुस्तान में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं, जहां खबरों की योजना, लेखन, सत्यापन और प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं। इससे पहले दैनिक भास्कर और न्यूज़18 जैसे बड़े मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क तक की भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की, जिसने उनके काम करने के तरीके को व्यावहारिक और तथ्य आधारित बनाया। निसर्ग की खास रुचि खोजी रिपोर्टिंग, ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ स्टोरीज़ में है। वे जटिल मुद्दों को सरल भाषा और स्पष्ट तथ्यों के साथ प्रस्तुत करने में विश्वास रखते हैं। राजनीति और जांच पड़ताल से जुड़े विषयों पर उनकी मजबूत पकड़ है। निसर्ग लोकसभा चुनावों, कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और अहम घटनाओं को कवर कर चुके हैं। साथ ही संसदीय कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों को नियमित रूप से कवर करते हैं। गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी निसर्ग योगदान देते हैं।

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