फ्रीबीज की वजह से रुका देश का विकास? SBI ने जताई चिंता, रोजगार देने की दी सलाह
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव से ठीक पहले अलग-अलग राज्य सरकारों द्वारा मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त उपहार (फ्रीबीज), खासकर बैंक खातों में नकद दिए जाने की आलोचना की थी। शीर्ष अदालत ने इस पर रोक लगाने को जरूरी बताया।

चुनाव में मतदाताओं को लुभाने के लिए राज्यों द्वारा मुफ्त उपहार (फ्रीबीज), खासकर बैंक खातों में नकद दिए जाने से सरकारी खजाने पर राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का 2.7 फीसदी तक बोझ पड़ता है, जिससे कई बार जरूरी कल्याणकारी योजनाएं प्रभावित होती हैं। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की एक रिपोर्ट में फ्रीबीज पर चिंता जताते हुए मुफ्त उपहार और बैंक खातों में नकदी जैसी फ्रीबीज योजनाएं लागू करने पर खर्च की सीमा जीएसडीपी का फीसदी तक सीमित करने की सिफारिश की है ताकि सरकार की जरूरी व कल्याणकारी योजनाएं प्रभावित नहीं हो।
विधानसभा चुनाव के दौरान जनता को नकद और मुफ्त उपहार देने से राज्यों के खर्च और बजट विश्लेषण को लेकर एसबीआई की शोध रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आएं हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि यदि हम हम राज्यों के बजट देखें, तो विधानसभा चुनावों में किए गए वादे अलग-अलग राज्यों के लिए जीएसडीपी का का 0.1 - 2.7 फीसदी जो कि राज्यों के अपने कुल राजस्व वसूली का लगभग 5 से 10 फीसदी खर्च होते हैं। कुल राजस्व का एक फीसदी सीमा तय हो ।
मुफ्त उपहार देने के बजाए रोजगार सृजित करें सरकार
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव से ठीक पहले अलग-अलग राज्य सरकारों द्वारा मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त उपहार (फ्रीबीज), खासकर बैंक खातों में नकद दिए जाने की आलोचना की थी। शीर्ष अदालत ने इस पर रोक लगाने को जरूरी बताया। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में राज्य सरकारों द्वारा नकद भुगतान की नीति पर भी चिंता जताते हुए कहा कि सरकारों को लोगों मुफ्त उपहार या नकद देने के बजाए, रोजगार के रास्ते बनाने चाहिए ताकि वे कमा सकें और अपनी इज्जत और आत्म-सम्मान बनाए रख सकें।
सक्षम और हाशिए पर रहने वालों में अंतर करना चाहिए
शीर्ष अदालत ने कहा था कि आखिर हम किस तरह की संस्कृति विकसित कर रहे हैं? हमें उन लोगों के बीच अंतर करना चाहिए जो सक्षम हैं और जो हाशिए पर हैं? एक कल्याणकारी राज्य के रूप में, सरकार हाशिए पर रहने वालों को राहत प्रदान करना चाहिए लेकिन जो लोग खर्च कर सकते हैं और जो नहीं कर सकते हैं, उनके बीच अंतर किए बिना, यदि आप मुफ्त में देना शुरू करते हैं, तो क्या यह एक तरह की तुष्टिकरण नीति नहीं होगी?’ सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अब समय आ गया है कि सभी राजनीतिक दलों, राजनेताओं और सभी सोशल इंजीनियरों को हर चीज पर दाोबारा से सोचना चाहिए। अगर हम इस तरह से उदारता दिखाते रहे तो हम देश के विकास में बाधा उत्पन्न होगा।’
महिलाएं मतदान में आगे
एसबीआई की रिपोर्ट के अनुसार एक से अधिक महिला केंद्रित योजना वाले राज्यों में मतदान में महिलाएं आगे हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि आंकड़ों के विश्लेषण से हम यह नतीजा निकाल सकते हैं कि जिन राज्यों में एक या अधिक महिला-केंद्रित योजनाएं शुरू की गई हैं, उनमें यानी 19 राज्यों में 2024 में औसत महिला वोटर टर्नआउट 7.8 लाख (कुल मिलाकर: 1.5 करोड़) बढ़ोतरी हुई, जबकि जिन राज्यों में 2019 के बाद ऐसी कोई योजनाएं शुरू नहीं की गई, उनमें सिर्फ 2.5 लाख (कुल मिलाकर: 0.3 करोड़) मतदान में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी।
लेखक के बारे में
Himanshu Jhaबिहार के दरभंगा जिले से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु शेखर झा डिजिटल मीडिया जगत का एक जाना-माना नाम हैं। विज्ञान पृष्ठभूमि से होने के बावजूद (BCA और MCA), पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून के कारण उन्होंने IGNOU से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया और मीडिया को ही अपना कर्मक्षेत्र चुना।
एक दशक से भी अधिक समय का अनुभव रखने वाले हिमांशु ने देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों जैसे दैनिक भास्कर, न्यूज़-18 और ज़ी न्यूज़ में अपनी सेवाएं दी हैं। वर्तमान में, वे वर्ष 2019 से लाइव हिन्दुस्तान के साथ जुड़े हुए हैं।
हिमांशु की पहचान विशेष रूप से राजनीति के विश्लेषक के तौर पर होती है। उन्हें बिहार की क्षेत्रीय राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति की गहरी और बारीक समझ है। एक पत्रकार के रूप में उन्होंने 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों और कई विधानसभा चुनावों को बेहद करीब से कवर किया है, जो उनके वृहद अनुभव और राजनीतिक दृष्टि को दर्शाता है।
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